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कविता

तुम्हारे न रहने पर
नरेश अग्रवाल


थोड़ा-थोड़ा करके
सचमुच हमने पूरा खो दिया तुम्हें
पछतावा है हमें
तुम्हें खोते देखकर भी
कुछ भी नहीं कर पाए हम,
अब हमारी आँखें सूनी हैं,
जिन्हें नहीं भर सकतीं
असंख्य तारों की रोशनी भी
और न ही है कोई हवा
मौजूद इस दुनिया में
जो महसूस करा सके
उपस्थिति तुम्हारी,
एक भार जो दबाए रखता था
हर पल हमारे प्रेम के अंग
उठ गया है, तुम्हारे न रहने से
अब कितने हल्के हो गए हैं हम
तिनके की तरह पानी में बहते हुए।


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