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कविता

मैं मजदूर
शंकरानंद


अपने जीवन में एक घर नहीं बना सका छत का
जो भी बहाया पसीना
उसके बदले जमीन खरीदा
और फूस लिया पेट काट कर

जैसे-तैसे गुजर रहा जीवन
इसी से दाल के दाने चुनता हूँ
ईंट के चूल्हे पर पकाता हूँ रोटियाँ
अपने घर से हजारों कोस दूर

दूर देश में जहाँ पाँच हाथ जमीन है मेरे नाम
उस पर भी सबकी नजर लगी हुई है

वर्शों बेघर रहने के बाद अब सोचता हूँ कि
फूस का ही घर बना लूँ

लेकिन डर लगता है कि
कहीं कोई उसमें भी रातों-रात तीली न लगा दे।


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हिंदी समय में शंकरानंद की रचनाएँ