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विमर्श

नवजागरण के दलित प्रश्न : ज्योतिबा फुले और प्रेमचंद की दृष्टि
अजमेर सिंह काजल


शोषण और अन्याय पर आधारित वर्ण व्यवस्था की अनैतिक संस्कृति के विरुद्ध बौद्धिकता और सामाजिक न्याय की विचारधारा ने उन्नीसवीं शताब्दी में नवजागरण को जन्म दिया। ये मूल्य किसी धर्म, संप्रदाय, जाति एवं क्षेत्र तक सीमित नहीं थे, इनका विस्तार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक था, लेकिन क्षेत्रीय प्रभाव के कारण इनकी गति एक समान नहीं थी। नवजागरण के मौलिक चिंतन में सांस्कृतिक परंपरा का मूल्यांकन, साम्राज्यवाद, सांमतवाद का विरोध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पक्षधरता, सत्ता के लोकतंत्रीकरण के प्रश्न, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और स्त्रियों के हक में अधिकार चेतना और उनमें शिक्षा का प्रसार, मानवीय गरिमा को महत्व, अंधविश्वासों के विरुद्ध लोकजागरण इत्यादि महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल थे। भेदभाव हिंदुत्वी विचारधारा की मूलभूत विशेषता है। हम एक तरफ वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था मानते हैं, इनके प्रतिमानों के अनुसार जीवनयापन करते हैं तो दूसरी तरफ नवजागरण के अग्रदूत भी बनने का नाटक करते हैं। भारतीय नवजागरण में अँग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी ज्ञान का महत्वपूर्ण योगदान है। देशी ज्ञान से नवजागरण की परिस्थितियाँ नहीं बनीं, यदि ऐसा होना होता तो पहले ही हो गया होता। दूसरों के उजले कपड़ों को देखकर अपने कपड़े गंदे लगने लगते हैं और दूसरों के ज्ञान और विचार को बेहतर स्थिति में पाकर ईर्ष्या करना कमजोरी का प्रतीक है। यदि हमारे पास पश्चिम से बेहतर ज्ञान था तो फिर उसे प्रमाणित करना चाहिए था। नवजागरण का जन्म अँग्रेजी शिक्षा, वैज्ञानिक ज्ञान, औद्योगिकरण, सामाजिक नैतिकता, बौद्धिकता, मानवीय समता, स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय, प्रतिनिधित्व जैसे प्रश्नों पर सम्यक दृष्टि से हुआ है।

सांस्कृतिक कूपमंडूकता, अशिक्षा, अन्याय, सामंती शोषण, देवालयों के व्याभिचार इत्यादि हिंदुत्व के सनातनी मूल्य हैं। अन्याय पर आधारित स्थापित व्यवस्था ने नवजागरण के नाम पर धर्म-संस्कृति के जागरण पर अधिक जोर दिया है और समाज को अपने नियंत्रण में रखने के लिए इसकी अनेक व्याख्याएँ की हैं। उन्हें भय था कहीं वंचित समुदायों के लोग धर्मांतरण न कर लें। चाहे ब्रह्म समाज हो, आर्य समाज या इसी तरह के अन्य शुद्धतावादी आंदोलन, इन सबकी निगाह में सदियों से बैल बनाकर रखे गए वे शूद्र-अतिशूद्र थे जिन्हें सदियों से वैचारिक और शारीरिक रूप से पीट-पीटकर अधमरा किया हुआ था। इसी दौरान ज्योतिबा फुले ने उच्च जातीय हिंदुओं द्वारा शूद्रों-अतिशूद्रों के शास्त्र आधारित शोषण पर सवाल उठाते हुए ऐतिहासिक अन्याय का हिसाब माँगा जिससे सांस्कृतिक संघर्ष का जन्म हुआ। यहाँ ज्योतिबा फुले एक तरफ व्यवस्था परिवर्तन की माँग के साथ 'सत्याशोधक समाज' का आंदोलन चलाते हैं तो तो दूसरी तरफ स्वामी दयानंद यथास्थिति के समर्थन में कुछ सुधार के साथ आर्य समाज के माध्यम से सामने आते हैं। इन दोनों दृष्टियों में दिन-रात का अंतर है। हिंदी साहित्य में भारतीय नवजागरण के प्रथम रचनाकार के रूप में भारतेंदु हरिचंद्र को याद किया जाता है। देखने की बात यह है कि भारतेंदु के लिए हिंदू जागरण ही नवजागरण है और इसे ही वे राष्ट्रीय जागरण कह रहे हैं। अन्य वंचित तबकों में उठ रही चेतना से उनका कोई लेना-देना नहीं था। यदि वे मानवीय शोषण को देखने की कोशिश करते तो निश्चित रूप से वे हिंदू जागरण से आगे बढ़ते और धर्म, अंधविश्वास और अन्याय के विरुद्ध सवाल उठाते, जैसा उनके समकालीन ज्योतिबा फुले धड़ल्ले से कर रहे थे। भारत का वर्तमान राजनीतिक स्वरूप ब्रिटिश सत्ता ने निर्मित किया था। भारत किसी एक धर्म, जाति, भाषा का नहीं, अपितु यहाँ कई धर्मों, जातियों, भाषाओं के लोग रहते हैं। बहुलता ही इसकी पहचान है।

डॉ. विमल कीर्ति के अनुसार नवजागरण आंदोलन का सूत्रपात बंगाल में सन 1828 में राजा राममोहन राय द्वारा 'ब्रह्म समाज' की स्थापना से हुआ। पंजाब और उत्तरी भारत में स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज का आंदोलन चलाया, लेकिन उनकी सोच ज्योतिराव फुले की तरह बुनियादी समाज परिर्वतनकारी नहीं थी। वे व्यवस्था परिवर्तन नहीं चाहते थे बल्कि हिंदू धर्म और समाज में कुछ सुधार की बात करते थे। इनके सोच और कार्य की कई मर्यादाएँ थीं। राजा राममोहन राय भी अपने को सती प्रथा आदि पारिवारिक सवालों से आगे नहीं ले जा सके। उनका समाज सुधार का आंदोलन सामान्य-जनों, किसानों, आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों की मुक्ति का आंदोलन कभी नहीं बन पाया। वह केवल शहरी लोगों, खासतौर पर उच्चवर्णीय लोगों तक ही सीमित रहा। लेकिन जब हम ज्योतिबा फुले के बारे में सोचते हैं, तो हमें उनका कार्य और चिंतनधारा इन सबसे अलग दिखाई देती है। उन्होंने अपने कार्य और चिंतन की शुरुआत ही धर्मसंस्था की आलोचना से शुरू की और फिर इसके खिलाफ व्यापक नवजागरण अभियान चलाया।''1 रामविलास शर्मा नवजागरण को राष्ट्रीय आवयकता मानते हुए कहते हैं -''वैज्ञानिक शिक्षा से भारत तभी लाभ उठा सकता है जब वह अपनी पुरानी समाज व्यवस्था बदले, अपने अंधविश्वासों और रूढ़ियों से स्वयं को मुक्त करे। जब तक भारतीय समाज में पुरानी वर्ण-व्यवस्था, जाति बिरादरी का भेदभाव, छुआछूत आदि कुरीतियाँ बनी हुई हैं, तब तक भारत प्रगतिशील आधुनिक राष्ट्र नहीं बन सकता। वैज्ञानिक शिक्षा राष्ट्रीय आवयकता है; समाज की व्यवस्था बदलना, अंधविश्वास और रूढ़ियों को समाप्त करना यह भी राष्ट्रीय आवयकता है।''2 वे पुनः कहते हैं - ''किसी देश या उसके प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन को हम नव-जागरण कहते हैं। इसमें सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के प्रयत्न शामिल हैं। शूद्रों और स्त्रियों की स्थिति को बदलने के प्रयत्न नवजागरण के अंग हैं। धार्मिक सुधार, अंधविश्वासों के विरुद्ध प्रचार नवजागरण के अतंर्गत हैं ही। ...किसी संप्रदाय तक नवजागरण को सीमित किया जाए तो वह जातीय गठन और विकास में बाधक होगा। राजा राममोहन राय और सर सैयद अहमद खाँ के नवजागरण हिंदुओं और मुसलमानों तक सीमित थे, इस हद तक वे बंगाली और हिंदी जातियों के विकास में बाधक थे।'3 रोहिणी अग्रवाल नवजागरण की दृष्टि पर लिखती हैं - ''हिंदी, हिंद, हिंदू धर्म, हिंदू स्त्री पर केंद्रित हिंदी नवजागरण तमाम स्खलनों एवं अंतर्विरोधों के बावजूद दो दृष्टियों से खासा महत्वपूर्ण है। एक, हिंदुत्व की प्रतिष्ठा के नाम पर वह सांप्रदायिक ताकतों को उभारने वाली असहिष्णु हिंसक मनोवृत्ति का पोषण करता है। दूसरे, चूँकि इस काल का समाज सुधारक, लेखक, बुद्धिजीवी स्वयं कुलीन परिवार अथवा मध्यवर्ग से संबद्ध रहा है, अतः वह मध्यवर्गीय स्त्री को ही आदर्श स्त्री की रूढ़ छवि में बांधता है। उसके वैचारिक परिदृश्य में रोज कुआँ खोद कर प्यास बुझाने वाली निम्नवर्गीय स्त्री का कोई अस्तित्व नहीं।''4

हालाँकि बात पेचीदा है, मगर यह सत्य है कि दलितों और स्त्रियों के लिए मुक्तिमार्ग पहले व्यापार ने और फिर अँग्रेजों ने ही खोले। ...बहरहाल डॉ. अंबेडकर के इस कथन में एक पीड़ादायक सच्चाई है कि 'अँग्रेज देर से आए और जल्दी चले गए।' सच्चाई इसमें भी है कि सारा स्वतंत्रता संग्राम या राष्ट्रीयता सिर्फ ऊँचे वर्गों और वर्णों का अपना मामला था - यह न स्त्रियों को मुक्त करता है, न दलितों को... उन्हें सिर्फ आश्वासन देता है कि पहले देश स्वतंत्र हो जाए फिर तुम्हारी भी सुनेंगे।''5 इसी जमाने में स्वामी अछूतानंद उत्तर प्रदेश में जनजागरण कर रहे थे तो मंगूराम पंजाब में आदि हिंदू आंदोलन चलाकर अछूतों को अपनी ऐतिहासिक पहचान के साथ संगठित करने और वर्णवाद, जातिवाद, अंधविश्वासों के विरुद्ध सामाजिक न्याय और चेतना के हक में अभियान चला रहे थे। हिंदू कॉफ्रेंस में स्वामी अछूतानंद अपने भाषण की शुरुआत निम्नलिखित पंक्तियों से करते हैं -

''शूद्रो गुलाम रहते, सदियाँ गुजर गई हैं। जुल्मों सितम को सहते, सदियाँ गुजर गई हैं। अब तो जरा विचारो, सदियाँ गुजर गई हैं। अपनी दशा सुधारो, सदियाँ गुजर गई हैं।''6

ज्योतिबा फुले (1827-1890) ने तत्कालीन समाज में व्याप्त मानवीय भेदभाव और अज्ञानता के विरुद्ध विशेषकर महाराष्ट्र में शिक्षा के माध्यम से अनेक कार्य किए हैं। इनकी चार प्रमुख रचनाओं में उनमें 'तृतीय रत्न'-1855, 'ब्राह्मणों की चालाकी'-1869 'गुलामगिरी'-1873, और 'अछूतों की कैफियत' को लिया जा सकता है। ज्योतिबा फुले ने कुरीतियों और धर्मांधता पर पर कड़े प्रहार किए। वे कहते हैं कि स्त्री और पुरुष में किसी भी प्रकार का भेदभाव किए बिना सबको समान शिक्षा का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। वे साफ शब्दों में कहते हैं कि जो वेदों की प्रशंसा करते हैं, उनको बुद्धिहीन पशुओं में भेज देना चाहिए।'7 उनके लेखन में न्याय-अन्याय की धाराओं पर लंबी बहसें और कारण स्पष्ट रूप से उभर कर आते हैं। वे धर्म के नाम पर कायम जड़ताओं और विचारहीनता पर प्रहार करते हैं। ब्राह्मणशाही की स्थापना करने वाली सांस्कृतिक विरासत में मौजूद अन्याय को मिटाने हेतु वे अँग्रेजी ज्ञान की शरण में जाने का आह्वान करते हैं। 'ब्राह्मणों की चालाकी' नामक रचना की प्रस्तावना में ज्योतिबा फुले लिखते हैं - ''हमारी जाग्रत अँग्रेज सरकार को अपनी सारी प्रजा के इस बहुत ही उपेक्षित वर्ग को शिक्षित करना चाहिए और उनकी आँखों की नींद समाप्त कर देनी चाहिए। उनको ब्राह्मण-पुरोहितशाही की दासता से मुक्त करना चाहिए।''8 इसी रचना में एक अभंग में वे कहते हैं - ''ज्ञानहीन शूद्र लज्जाहीन हुआ, जूते उठाए ब्राह्मणों के।''9

'गुलामगीरी' ज्योतिबा फुले की एक सशक्त रचना है। इसमें 16 परिच्छेद हैं और यहाँ ऐतिहासिक-सांस्कृतिक, आर्थिक और ज्ञान संबंधी मसलों पर घोंडीराव और जोतिराव का संवाद चलता है। यह पुस्तक अफ्रीकी मूल के अमेरिकी लोगों की गुलामी को समाप्त करने का आंदोलन चलाने वाले लोगों को समर्पित है। फुले चाहते थे कि भारतीय समाज के शूद्र-अतिशूद्र (बहुजन) लोगों की ऐतिहासिक गुलामी का अंत करने के लिए सभी न्यायप्रिय लोगों को सामने आना होगा, धर्म के बंधन और जड़ताओं को खंडित करना होगा। वे हिंदू धर्म के गुलामों की आजादी का मसला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाते हैं। अमेरिकी गुलाम अपने मालिक का स्पर्श पा सकते थे, लेकिन भारतीय गुलामों का मालिक यदि इनका स्पर्श भी कर लेता था तो उसे शुद्धिकरण की निश्चित प्रक्रिया से गुजरता होता था। 'गुलामगीरी' की प्रस्तावना में वे लिखते हैं - ''आज के शुद्रादि-अतिशूद्रों के दिल और दिमाग अपने पूर्वजों की दास्तानें सुनकर पीड़ित होते होंगे, इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि हम जिनके वंश में पैदा हुए हैं, जिनसे हमारा खून का रिश्ता है, उनकी पीड़ा से पीड़ित होना स्वाभाविक है। किसी समय ब्राह्मणों की राजसत्ता में हमारे पूर्वजों पर जो भी कुछ ज्यादतियाँ हुईं, उनकी याद आते ही हमारा मन घबराकर थरथराते लगता है।''10 यहाँ व्यक्तियों की महिमा उनके अच्छे कार्यों से नहीं, बल्कि जातीय पहचान से होती रही है जिससे नवजागरण की आवाज पर भी स्थापित सामाजिक व्यवस्था ने कब्जा कर लिया।

ज्योतिबा फुले ब्राह्मणशाही के जाल में फँसे समाज में चेतना का प्रवाह करने का प्रयास करते हैं। इस चेतना के लिए वे अँग्रेजी राजसत्ता का शुक्रिया अदा करते हुए कहते हैं - ''ये लोग अँग्रेजों के इन उपकारों को कभी भूलेंगे नहीं। उन्होंने इन्हें आज सैंकड़ों साल से चली आ रही ब्राह्मणशाही की गुलामी की फौलादी जंजीरों को तोड़ करके मुक्ति की राह दिखाई है। उन्होंने इनके बीवी बच्चों को सुख के दिन दिखाए हैं। यदि वे यहाँ न आते तो ब्राह्मणों ने, ब्राह्मणशाही ने इन्हें कभी सम्मान और स्वतंत्रता की जिंदगी न गुजारने दी होती।''11 वे मानते हैं कि वैदिक और बौद्ध धम्म के मध्य चले लंबे वैचारिक संघर्ष का स्वरूप बदलकर हिंसक हो गया था। बुद्ध ने व्यक्ति और समाज के विकास के लिए बौद्धिकता और भौतिकता का जो ज्ञान दिया था उसे खारिज और बेदखल करने के लिए अनेक षड्यंत्र किए गए।

सांस्कृतिक पांखडों से आमजन को चेतन करते हुए शिक्षा, अधिकार और अवसर की सुगमता के लिए सरकार को गंभीरता से सोचना और बंदोबस्त करने की माँग करते हैं। फुले सामाजिक अन्याय पर रोक लगाने के लिए सरकार को कड़े निर्णय करने की आवश्यकता याद दिलाते हुए सभी समुदायों को नौकरियों में प्रतिनिधित्व देने के प्रश्न उठाते हुए कहते हैं - ''जब तक उन अँग्रेज लोगों की सत्ता इस देश में हैं, तब तक हम सभी शूद्र लोगों को कितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी ब्राह्मण-पंडित-पुरोहितों की परंपरागत 'धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक' गुलामी से मुक्त होना चाहिए और इसी में हम सभी की बुद्धिमानी है।''12 वे 19 अक्तूबर 1882 को हंटर शिक्षा कमीशन के सामने लड़कियों की प्राथमिक शिक्षा का विस्तार करने के लिए अधिक उदारवादी तौर-तरीकों से मदद करने का निवेदन करते हैं।''13 वे पुरुष-स्त्री के मध्य लैंगिक भेदभाव, जातीय भेदभाव और गुलामी के व्यवहारों का खंडन करते हैं 'धर्मशास्त्रों की वजह से सभी अछूतों को छूना पाप समझा गया। इसकी वजह से स्वाभाविक रूप से उन बेचारों को शूद्र सदस्यों की तरह सभी लोगों में मिल जुलकर अमीर होने की सुविधा कहाँ उपलब्ध हो सकती है। उनको आज भी गधों पर बोझ लादकर अपना अपने परिवार को पालना पड़ रहा है।''14 यह कितना बड़ा आश्चर्य और अन्याय है कि सरकार को गर्भपात और भ्रूणहत्या करने वाली ब्राह्मण विधवा स्त्रियों की अपेक्षा चोरी-डकैती करने वाले मातंग-महार लोग ज्यादा दोषी दिखाई देते हैं। दूसरी बात यह है कि ब्राह्मणों की काम कम और बकवास ज्यादा रहती है।''15 ज्ञान सत्ता से अन्य सत्ताएँ हासिल की जा सकती हैं। इतिहास बताता है कि दलित-बहुजन ज्ञान सत्ता से दूर रखे गए इसलिए वे किसी भी क्षेत्र में अपना प्रतिनिधित्व नहीं ले पाए। ब्रिटिश शासन काल में स्कूलों के दरवाजे सभी के लिए खोल दिए गए। ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले ने लड़कियों और दलितों के लिए पाठशालाएँ चलाईं जिससे ज्ञान सत्ता पर कायम विशेषाधिकार टूटने प्रारंभ हुए। वे कहते हैं -

''मनु जलकर खाक हो गया जब अँग्रेज आया। ज्ञान रूपी माँ ने, हमको दूध पिलाया।। अब तो तुम भी पीछे न आओ। भाइयो, पूरी तरह जला के खाक कर दो। मनुवाद को।। हम शिक्षा पाते ही पाएँगे वह सुख। पढ़ लो मेरा लेख... जोती कहे।।''16

पाखंडवाद ने सामाजिक सांस्कृतिक विकास पर गंभीर चोट की है। यहाँ शातिर किस्म के बहुत थोड़े लोगों ने अधिक लोगों को मूर्ख बनाकर उन्हें, भाग्य, भगवान, भविष्य, जन्मफल, कर्मफल, जप, पूजा-भेंट के चक्कर में डालकर अपना स्वार्थ सिद्ध किया। संस्कृति के नाम पर समाज को नए-नए पाखंडों और धोखेबाजियों के जो वस्त्र पहनाए जाते रहे हैं जिन्हें समझना सरल नहीं। शिक्षा के अभाव में अज्ञानता का ढेर बढ़ता चला गया। शूद्र किसानों की स्थिति तो पशुओं से भी बदतर थी। बहुजन समाज की दुर्गति के लिए विद्याहीनता को जिम्मेदार मानते हुए वे कहते हैं -

''विद्या बिन मति, मति बिन नीति गई, नीति बिन गति गई, गति बिन धन गया,

धन बिन शूद्र दलित हुए, इतना घोर अनर्थ अविद्या से हुआ।''17

सामाजिक वर्चस्व का एक बड़ा कारण विद्या पर एक वर्ण और जाति का एकाधिकार होना था और इसी एकाधिकार से इन्हें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आवश्यकता से अधिक प्रतिनिधित्व मिला, जिससे अन्य समुदाय, जातियाँ पिछडती चली गईं। वे कहते है - ''मुझे मेरे स्वाभाविक और सही मानवी अधिकार समझ में आते ही मैंने उस जेलखाने के नकली मुख्य ब्रह्म दरवाजे के किवाड़ों को लात मारी और उस जेलखाने से बाहर निकल आया... वे चार प्रतिज्ञाएँ करते है। एक, धर्मग्रंथों का निषेध। दो, व्यक्ति को नीच समझने वालों को नीच आचरण का मौका ही न देना। तीन, गुलामी का जीवन त्यागने वालों के साथ अपने परिवार की तरह व्यवहार करना चाहे वे किसी भी देश के हों। चार, वे ब्राह्मणों की गुलामी से मुक्ति चाहने वाले लोगों का आह्वान करते हैं कि वे अपना नाम, पता, पत्र के द्वारा भेज दें, मुझे ताकत मिलेगी और शुक्रगुजार रहूँगा।'' 18

'तृतीय रत्न' नामक नाटक में फुले ने जोशी के पाखंडी आचरण को खोलकर दिखाया है। जो एक बहुजन दंपति को उसकी अजन्मी संतान के भविष्य को लेकर पाखंडों में फँसाकर उसका शोषण करते हैं। 'अछूतों की कैफियत' नामक रचना में अछूतों की सामाजिक सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों पर विमर्श है। इनकी ऐसी हालत क्यों हुई? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? इनको व्यक्ति की पहचान कैसे मिलेगी इत्यादि पक्षों पर बातचीत है। भयंकर सामाजिक सांस्कृतिक उत्पीड़न और आर्थिक प्रतिबंधों ने इन्हें दयनीय स्थिति में पहुँचा दिया था कि मेहनताना प्राप्त करने के लिए भीख माँगने जैसी तकलीफ उठानी पड़ती हैं। दलितों की हालत पर दलित पात्रों की टिप्पणी देखिए - ''जितने भी गंदे और बुरे काम हैं, वे सभी हमारे हिस्से में आ गए। कहा गया हम लोगों को शूद्रों के काम से कुछ सहायता करनी चाहिए। इमें गाँव-मोहल्लों की गलियाँ, पाखाने और लोगों के बरामदे, सायबान आदि बुहार करके साफ रखना चाहिए।''19

दलित हिंदुओं के अंग नहीं, इनकी स्वतंत्र पहचान है, लेकिन ऐतिहासिक घालमेल की प्रक्रिया में इन्हें हिंदुओं का हिस्सा बनाकर पेश किया गया। आक्रमणकारी और सत्ता स्थापित करने वाले इन्हें हिंदू जानते रहे, पर हिंदू इन्हें अपने से दूर रखते रहे। मुस्लिम शासकों ने हिंदुओं के भेदभावी रिवाजों पर चुप्पी बनाए रखी। अछूत अछूत ही क्यों रहें? इन्हें इस कलंक से मुक्ति कौन और कैसे देगा? इन प्रश्नों पर विचार करते हुए 'महार और मातंग' पात्र अपनी मानवीय पहचान, समान हक और ज्ञान हासिल करने संबंधी बाधाओं पर सवाल उठाते हैं। मुस्लिम और मराठा राज की तुलना करते हुए वे कहते है -''मुस्लिम राज में हमारी स्थिति का जो स्वरूप था उससे भी भयंकर और दुर्बल स्थिति मराठा लोगों के राज्य में थी, यह कहने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए।''20 अपनी स्थिति को अभिव्यक्त करते हुए महार या मातंग पुनः कहते हैं - ''गाँव के बाहर झोपड़ी बनाकर रहना और सरकारी बोझ-बेगार ले जाने का काम भी हमारे जिम्मे था। अहाहा! क्या थी हमारी हालत! एक तरह से हम लोग पशु ही थे। हम लोगों को गाँव के अंदर रहने की इजाजत नहीं थी।''21 एक वर्ग ओर जाति के लोग बिना कार्य किए सम्मान पाते हैं और उन्हें भीख माँगने पर सम्मान के साथ दान-दक्षिणा देकर भोजन करवाया जाता है। एक से बेगारी और दूसरे को काम किए बिना सम्मान क्यों? उन्होंने माना है कि ज्ञानहीनता, प्रशासनिक निर्णयों संबंधी अज्ञानता और राजनीतिक दखल के अभाव में कमजोर वर्ग की सुनने वाले कोई नहीं हैं। इसलिए वे ज्ञान चेतना के निर्माण हेतु अधिक से अधिक विद्यालय खोलने की माँग करते हैं। संस्कृति के नाम पर एक जाति के वर्चस्व का विरोध करते हुए बेगारी समाप्त करने और अपनी मनमर्जी के काम-धंधे अपनाने पर लगी रोक हटाने की माँग करते हैं। वे धार्मिक जड़ताओं को न्याय और समता के रास्ते में बड़ी बाधाओं के रूप में देखते हैं। उनके लेखन और आंदोलन का अंतिम लक्ष्य भारतीय समाज और प्रशासन को न्यायपरक और भेदभावमुक्त बनाने के लिए जन जागरण करना था जिसमें वे सफल रहे।

ब्रिटिश सत्ता की प्रतिनिधि रानी साहिबा द्वारा अछूतों से उनके धर्म के बारे में पूछने पर 'महार या मातंग' उन्हें अन्याय से बचाने का निवेदन कहते है - ''हम लोगों को हिंदू की संज्ञा दी गई और हम लोग हिंदू धर्म के अनुसार बर्ताव करते है... लेकिन हम लोगों को अन्य हिंदुओं के साथ किसी के प्रकार के संबंध स्थापित करने की इजाजत नहीं है। मतलब हम लोगों को अन्य हिंदुओं जैसे कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। फिर हम हिंदू कैसे हो सकते हैं? ...यहाँ जब से आपकी न्यायपूर्ण राजसत्ता कायम हुई तब से हम लोगों को धर्म के संबंध में और अपने व्यवहार-बर्ताव में हिंदू धर्म में रहने की वजह से जिस प्रकार की मुसीबतें बर्दाश्त करनी पड़ती थीं यदि आगे भी हम लोग हिंदू धर्म में रहें तो लगता है फिर से वही स्थिति आने की संभावना है।''22 ज्योतिबा फुले ब्रिटिश सत्ता द्वारा दलित-पिछड़े लोगों के हितार्थ किए गए कार्यों को याद करते हुए कहते है - ''हम लोगों को अहसानमंद होकर यह कबूल करना चाहिए कि अँग्रेज सरकार की वजह से ही आज हम लोग पेशवाओं की गुलामी से मुक्त हुए हैं और मराठाओं के राज्य में हमारी जो स्थिति थी उससे आज हमारी स्थिति अच्छी है। ...धर्मांधता की वजह से, धर्म के पागलपन से तो हमारा पूरा सत्यानाश ही हुआ है। हम लोगों को हमारे भाइयों से कोई सहायता नहीं मिलती, इसके पीछे का कारण धर्म का पागलपन है। अन्य देश भाइयों को एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए, यह उनका धर्म है। लेकिन हम लोगों को उनकी कोई सहायता नहीं मिलती, बल्कि वे लोग हमारे नुकसान का और दुख का कारण बनते हैं।''23 साहूकारों के आर्थिक शोषण की मार वंचित समुदायों पर अधिक पड़ती है। साहूकार के शोषण का एक उदाहरण देखिए - ''बारह आना उधार लेने पर एक रुपया कागज में लिखा जाता है। उस एक रुपये की प्रतिमास चार आना ब्याज दर होगी, यह लिख करके देना पड़ता है।''24

विद्यालय प्रवेश के राजकीय आदेश के बावजूद पंडित दलित बच्चों को अलग बैठाते हैं, दंडित करते हैं जिससे अधिकतर विद्यार्थी स्कूल जाना बंद कर देते हैं। इसके लिए हिंदुओं की धार्मिकता जिम्मेदार है। ''क्या इसी को हम लोग भाईचारा कह सकते हैं? इससे हमारे बच्चों की पढ़ाई नहीं होगी बल्कि उनका और हमारा बहुत बड़ा नुकसान होगा। ...हमारे काम को नीच समझा गया। हम लोग दूसरा धंधा कर नहीं सकते। जिस तरह हमारे अन्य कामों में धर्म पत्थर की तरह रुकावट बना हुआ है, उसी तरह वह हमारे धंधे में भी रोड़ा बनकर खड़ा है। यदि हम लोग किसी के पास कुछ काम सीखने की इच्छा लेकर गए भी तो बताया जाता है कि 'तू महार या मातंग (अछूत) है, तुझे कौन सिखाएगा? तुम लोग अपना जातीय धंधा करके ही पेट पालो। धंधा-रोजगार की यही स्थिति है।''25 ज्ञानहीनता के कारण इन्हें चारों और अपमान, हिंसा का सामना करना पड़ा है। प्रशासनिक निर्णयों संबंधी अज्ञानता पर वे रानी साहिबा से कहते हैं - ''हम लोगों को राजनीतिक बातों का ज्ञान नहीं है और राजनीति में हमारा कोई दखल नहीं है। इतना ही नहीं, राजनीतिक बातों के संबंध में छोटी-बड़ी बातें भी मालूम नहीं हैं।''26

ज्योतिबा फुले ने नवजागरण की दृष्टि से अनेक प्रश्न उठाए हैं। वे समाज को खंड-खंड करने वाली वर्ण-धर्म और जातिवाद संबंधी शोषण के लिए हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहराते हैं। फुले दलितों, पिछड़ों और स्त्रियों कीशिक्षा के लिए अभियान चलाते हैं और सामाजिक और सरकारी सहयोग से अनेक विद्यालयों की स्थापना करने और करवाने में सफल रहते हैं। वे ब्राह्मणवाद की विचारधारा को सामाजिक विकास, समता, बंधुता, न्याय और बौद्धिकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा के रूप में देखते हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि भाग्य, भगवान और भविष्य की मानसिकता ने समाज को बहुत अधिक नुकसान किया है, इसलिए अब अँग्रेजी शिक्षा व्यवस्था को अपनाकर समाज को ज्ञानसत्ता से जोड़ने का सुनहरा अवसर आया है। उनकी दृष्टि में वेद-शास्त्रों में ज्ञान होना तो दूर ये इसके निकट भी नहीं हैं। फुले चाहते हैं कि भारतीय समाज पश्चिमी ज्ञान और बंधुता पर आधारित समतामूलक आचरण को अपनाकर सभ्य बने। कुल मिलाकर कहें तो इनके पास दलितों, बहुजनों, स्त्रियों सहित समाज के विकास के अनेक फार्मूले हैं। यहाँ देख रहे हैं कि फुले जिस बेबाकी से समाज, धर्म और भेदभावों को प्रश्रय देने वाली मनु व्यवस्था पर अपने विचार रखते हैं, दलित-बहुजन के प्रति वैसे विचार उनके समकालीनों के अगल-बगल भी नहीं हैं। वे 'तृतीय रत्न', 'ब्राह्मणों की चालाकी' 'गुलामगिरी' और 'अछूतों की कैफियत' नामक महत्वपूर्ण रचनाएँ लिखकर देश-दुनिया के सामने सार्वभौमिक न्याय के प्रश्न खड़े करते हैं, जिनसे हमें मालूम होता है कि वे नवजागरण के मुद्दों से गहरे तक जुड़े हुए थे।

मुंशी प्रेमचंद (30 जुलाई 1880-8 अक्तूबर 1936) प्रमुख हिंदी कथाकार के रूप में जाने जाते हैं। हंसराज रहबर के अनुसार प्रेमचंद ने बीसवीं सदी के शुरू में लिखना शुरू किया और जीवनपर्यंत लिखते रहे। अपने छत्तीस वर्ष के साहित्यिक जीवन में उन्होंने एक दर्जन उपन्यास और तीन सौ के लगभग कहानियाँ लिखीं। ...निस्संदेह प्रेमचंद पहले लेखक थे जिन्होंने इस उद्देश्य से अपने साहित्य की रचना की कि उसे पढ़कर देश की जनता गुलामी से नफरत करना सीखे और ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध अपनी आजादी की लड़ाई को तेज करें।''27 यह ऐसा दौर था जब स्वतंत्रता आंदोलन के समानांतर मानवीय गरिमा, सामाजिक न्याय और भागीदारी संबंधी बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर का आंदोलन सामने आ चुका था। इन प्रारंभिक आंदोलनों में सार्वजनिक वस्तुओं के सामूहिक प्रयोग पर उच्च जातीय हिंदुओं के एकाधिकार का विरोध था, जिसमें बाद में राजनीतिक प्रतिनिधित्व की माँग भी जुड़ गई थी। इन आंदोलनों का मकसद मंदिर प्रवेश या पानी की प्राप्ति तक सीमित नहीं था, अपितु भेदभाव के विरुद्ध न्याय की माँग और मानवाधिकारों को प्रतिष्ठित करना था। दलितों के मानवीय अधिकारों के लिए उठे आंदोलनों से हिंदी पट्टी के अधिकतर रचनाकार या तो इनसे अनजान थे या इस प्रभाव से बचकर निकल जाते हैं। उन्होंने जड़ संस्कृति के अन्यायों के विरुद्ध चेतना पैदा करने हेतु अपना फर्ज अदा नहीं किया। यदि कहीं लिखा भी तो इस दृष्टि में यथास्थितिवाद या सहानुभूति ही देखने को मिली।

यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो फिर इस दर्पण में दलित समाज में चेतना हेतु चल रहे आंदोलनों की अभिव्यक्ति क्यों नहीं हुई? यहाँ तक कि प्रेमचंद की कहानियों में चेतना के ऐसे स्वर नदारद हैं। दलितों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर डॉ. अंबेडकर और गांधी जी के मध्य 1932 में हुआ विवाद, 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट से रूप में सुलझा था। इससे पूर्व गांधी जी जहाँ दलितों को हिंदू बनाकर रखने का अभियान चलाते हैं तो डॉ. अंबेडकर उन्हें हिंदुओं से भिन्न समुदाय के रूप में चिह्नित करते हुए उनके अलग अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं और उन्हें प्राप्त करते हैं। गांधी जी इसके विरुद्ध आमरण अनशन करते हैं और दलित की स्वतंत्र पहचान को खंडित करने की योजना में सफल होते हैं। हिंदी क्षेत्र के प्रमुख रचनाकार प्रेमचंद अंबेडकर के न्यायपूर्ण संघर्ष के पक्ष में एक शब्द नहीं लिखते, लेकिन गांधी जी के समर्थन में कलम तोड़ देते हैं। वे अंबेडकर के अभियान को सांप्रदायिक कहते हैं। 26 अक्तूबर 1932 के जागरण में वे लिखते है - ''शत्रु ने लक्ष्य भी उसी स्थान पर किया जो सबसे कमजोर है, लेकिन गांधी की तपस्या ने पासा पलट दिया और न जाने कितनी दैवी शक्ति सामने आ खड़ी हुई। देखते-देखते हवा बदल गई और शत्रुओं से घिरी हुई राष्ट्रीयता अपने मोर्चे से निकलकर सांप्रदायिकता का संहार कर रही है। पूना में उसने पहली विजय पाई।''28

प्रेमचंद गांधी भक्ति में इतने लीन हो गए थे कि उन्हें दलितों का ऐतिहासिक शोषण भी दिखाई नहीं दिया। यदि कहीं दिखाई दिया तो उसको सामाजिक न्याय के संघर्ष के रूप में अभिव्यक्त करने की अपेक्षा कहानियों के अधिकतर चरित्रों को बेहद अपमानजनक ढंग से पेश किया। माना कि उनकी पहचान को गरियाना तत्कालीन समाज में प्रचलित था, लेकिन इनके पात्रों में इस घृणा के विरुद्ध संघर्ष की हिम्मत पैदा न होना बड़ी कमजोरी का प्रतीक है। प्रेमचंद जुलाई 1933 में 'तुलसी स्मृति तिथि कैसे मनाएँ' नामक लेख में कहते हैं कि उन्होंने हिंदू सभ्यता और संस्कृति की बड़ी रक्षा की है। हिंदू धर्म और हिंदू समाज उनके उपकार भार से कभी मुक्त नहीं हो सकता। इसलिए हिंदू जाति का प्रतिनिधित्व करने वाली हिंदू महासभा का भी कर्तव्य है कि वह इस दिशा में अपनी कुछ शक्ति लगावे।''29 यहाँ यह तो मालूम हो रहा है कि प्रेमचंद हिंदू धर्म और संस्कृति की रक्षा में स्वयं तो लगे ही हैं, धर्म-प्रचारक की भाँति हिंदुओं की संस्थाओं को भी कर्तव्य याद दिलाने की चूक नहीं करते।

मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में नवजागरण के प्रश्नों को तलाश करने के लिए उनकी उन पाँच कहानियों का उल्लेख लिया जा रहा है जो हिंदी के विभिन्न पाठ्यक्रमों का हिस्सा रही हैं। इन कहानियों के नाम हैं - 'मंदिर' (1927), 'सद्गति' (1931), 'ठाकुर का कुआँ' (1932) 'दूध का दाम' (1934) और 'कफन' (1936)। इन कहानियों में भारतीय नवजागरण के उन मूल्यों के प्रति राय तलाशने का प्रयास किया गया है जिनसे समाज में वर्ण-धर्म की जकड़न, धांधलियों और जातिवाद के विरुद्ध मानवीय गरिमा और न्याय के स्वर प्रस्फुटित हुए।

'मंदिर' कहानी की मुख्य पात्र सुखिया दलित विधवा है। उसके जीवन का सहारा उसका बेटा जियावन है, जो बीमार पड़ा है। वह उसे साथ लिए-लिए घास खोदती, घास बेचने बाजार जाती। आर्थिक अभाव तो जैसे-तैसे काट लिए जाते हैं, लेकिन संतान और परिवार का दुख काटते नहीं कटता और समाज का दुख तो किसी-किसी को लगता है। कहानी अंधविश्वास पर प्रहार करने की अपेक्षा उसके यथावत रूप को स्वीकृति देती है। वे बच्चे को घास खोदने की खुरपी देने की बजाए उसे शिक्षा के दरवाजे तक पहुँचाने की वकालत करते तो उसमें नवजागरण दिखाई देता। इस समय तक स्कूलों में दरवाजे सभी के लिए खोले जा चुके थे। प्रेमचंद सपने के माध्यम से शोषण और अंधविश्वास का बीजारोपण करते हैं। यदि सुखिया को सपने में पति द्वारा मंदिर जाने का संदेश न दिलवाते तो उसका इतना शोषण नहीं होता। वह अंधविश्वास में डूबकर पति के कहे अनुसार मंदिर के दरवाजे तक जाती है। अच्छा होता यदि प्रेमचंद कहानी में उसे किसी डाक्टर या वैद्य के पास पहुँचाते और इस कार्य में उसके चाँदी के आभूषण भी गिरवी रखवा देते, लेकिन कहानी में ये आभूषण मंदिर जाने और पूजा-पाठ पर गिरवी रखवा कर उसकी चेतना को बंद करने का यत्न हुआ है। पूजा से बीमार व्यक्ति का रोग ठीक नहीं हो सकता। रोगमुक्ति के लिए व्यक्ति को पूजा की नहीं, ज्ञाननिर्मित इलाज की आवश्यकता है। रचनाकार का दायित्व है कि वह मानवीय विकास की प्रवृत्ति को पहचाने और समाज को बताए, लेकिन प्रेमचंद ऐसा करने की अपेक्षा सुखिया को शोषण के लिए तैयार करते हैं। कहानी में मानवीय समता, स्त्री और दलित गरिमा कदम-कदम पर खंडित हुई है।

कहानीकार बालक को 'छतरी बंस' कहकर स्त्रीत्व पर हमला करते हैं। रचनाकार यदि अन्याय, अंधविश्वास, अपमान, हिंसा की मार झेलने वाली स्त्री को संघर्ष के लिए तैयार करते तो उनमें नवजागरण के मूल्य दिखाई देते। सुखिया को ज्ञान मार्ग पर ले जाने की बजाए अविवेकी, अंधआचरण के प्रति श्रद्धावनत करना लेखक की पिछड़ी सोच का प्रतीक है। कहानी की ये अंतिम पंक्तियाँ सभ्य समाज निर्माण में कानून की भूमिका का विरोध करती हैं और न्याय के लिए ईवर पर विश्वास करने का समर्थन करती हैं। वे अन्याय की शिकार स्त्री को संघर्ष के लिए तैयार करने की अपेक्षा देवताओं के नाम पर कायम जुल्मों के पक्ष में खड़ा कर देते हैं, जबकि नवजागरण की विचारधारा इसकी विरोधी है। बालक की मौत पर घायल ममता चीखते-चिल्लाते हुए कहती है-''तुम सबके सब हत्यारे हो, निपट हत्यारे हो। डरो मत, मैं थाना-पुलिस नहीं जाऊँगी। मेरा न्याय भगवान करेंगे, अब उन्हीं के दरबार में फरियाद करूँगी। ...इतनी देर में सारा गाँव जमा हो गया। सुखिया ने एक बार फिर बालक के मुँह की तरफ देखा। मुँह से निकला - हाय मेरे लाल! फिर वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ी। प्राण निकल गए। बच्चे के लिए प्राण दे दिए। माता, तू धन्य है। तुझ-जैसी निष्ठा, तुझ-जैसी श्रद्धा, तुझ-जैसा विश्वास देवताओं को भी दुर्लभ है!''30 यदि कोई किसी की व्यक्तिगत गरिमा पर हमला करता है या बालक की हत्या कर देता है तो पीड़ित पक्ष न्याय हेतु पुलिस या न्यायालय की शरण लेता है। यदि सुखिया बालक की हत्या के बाद पुलिस में जाती तो उसका चरित्र अधिक उज्ज्वल होता। लेकिन अचरज की बात है कि कहानी घोषणा करती है कि मेरा न्याय भगवान करेंगे। यह भगवान के नाम पर कायम अन्याय को समर्थन है। प्रेमचंद शोषण का प्रतिकार करने की अपेक्षा सुखिया को वर्ण-व्यवस्था के समर्थन में खड़ा करते हैं। यह नवजागरण के मूल्यों के उलट है।

'सद्गति' कहानी संवेदनहीनता की हद है। पंडित दिनभर भूखे व्यक्ति दुखी से काम लेता है, फटकार लगाता है, उसकी पहचान को अपमानित करता है। 'नीच के घर में खाने को हुआ और उसकी आँख बदली।' वह लकड़ी फाड़ते-फाड़ते बेदम होकर गिर पड़ा और प्राण निकल गए। सहज मानवीय संवेदना का अंत तो उस समय देखने को मिलता है जब वह उसे छूने की अपेक्षा चमरवाड़े में जाकर मुर्दा उठाने को कहता है। दुखी की पत्नी और पुत्री कई अन्य महिलाएँ के साथ चीखती-चिल्लाती लाश तक आईं। हिंदुओं के लिए तो चमार को छूना भी पाप था। वे यहाँ दलित महिलाओं के स्वजन की मौत पर रोने को मनहूस कहते हैं। कहानी पीड़ित महिलाओं की मानसिक स्थिति का मजाक उड़ाते हुए उन्हें चुड़ैल कहती है। ''इन डाईनों ने खोपड़ी चाट डाली। सभों का गला भी नहीं पकता। ...पंडित जी ने एक रस्सी निकाली। उसका फंदा बनाकर मुरदे के पैर में डाला और फंदे को खींचकर कस दिया। अभी कुछ-कुछ धुँधलका था। पंडित जी ने रस्सी पकड़कर लाश को घसीटना शुरू किया और गाँव के बाहर घसीट ले आए। वहाँ से आकर तुरंत स्नान किया, दुर्गापाठ किया और घर में गंगाजल छिड़की। उधर दुखी की लाश को खेत में गीदड़ और गिद्ध, कुत्ते और कौए नोच रहे थे। यही जीवन पर्यंत की भक्ति, सेवा और निष्ठा का पुरस्कार था।'' 31

यह सहज मानवीय सरोकार है कि मृत व्यक्ति की देह का धार्मिक रीति-रिवाजानुसार अंतिम संस्कार कर दिया जाता है। प्रेमचंद दलित से जी-तोड़ बेगार करवाते हैं और बेगारी करते-करते मर जाने पर उसे पशुओं से भी बुरी तरह घसीटकर गाँव से बाहर फिंकवाते हैं। गाँवों में पशु की मौत पर भी उसको सम्मान से दफनाया जाता है। उसे खुले में नहीं फेंका जाता, लेकिन लेखक के लिए दलित पशु से भी गए-गुजरे हैं। नवजागरण मनुष्य को संवेदनशील बनाकर उसे मानवीय सरोकारों से जोड़ता है। यह कहानी दुखी को परिस्थितियों के हवाले छोड़कर कहीं पर भी चेतना का निर्माण नहीं करती, बल्कि मानवीयता के उलट है। कहानी का शीर्षक किस सद्गति की माँग करता है। बेगारी करते-करते जीवन समाप्त हो गया, प्राण निकल गए, भाव के पैरों में रस्सी उलझाकर पशुओं से भी बुरी तरह घसीट कर गाँव के बाहर फैंके जाने का आचरण किसको सद्गति दे रहा है? हिंदू शास्त्र कहते हैं कि दलित समाज के प्रति बेरहमी से पेश आना चाहिए। प्रेमचंद ऐसा ही कर रहे हैं। दलित चरित्रों के प्रति वे शास्त्रीय मानसिकता से पेश आते हैं। 'सद्गति' यानी दलित समाज की अच्छी स्थिति। दलित समाज कभी नहीं चाहेगा कि उसकी ऐसी गति हो। वर्ण व्यवस्था में श्रमहीन लोग सम्मान पाते हैं और श्रमशील लोगों को घसीटा जाता है। प्रेमचंद बीच-बीच में वर्ण व्यवस्था का गुणगान करते दिखाई पड़ते हैं। यदि वे नवजागरण के मूल्यों के आधार पर साहित्य रचते तो उनकी कहानियों में मानवीय गरिमा का ऐसा मजाक नहीं उड़ाया जाता, ऐसा वीभत्स चित्रण नहीं होता। कहानी में भूखे व्यक्ति को दो-चार रोटी खिलाने की अपेक्षा उसकी हैसियत का मजाक उड़ाया जाना क्रूरता का परिचायक है। सभी जगह देखते हैं कि मृतक के परिवार, भाईचारे और गाँव के लोग अंतिम संस्कार होने तक लाश को अकेला नहीं छोड़ते। उसकी याद में गमगीन रहते हैं, सुरक्षा करते है, लेकिन मुंशी प्रेमचंद दुखी के शव को बेहद अपमानजनक और आपत्तिजनक ढंग से पेश करते हैं। कहानी मृत व्यक्ति के अनादर की सीमाओं का भी अतिक्रमण करती है।

नवजागरण और वर्ण व्यवस्था एक-दूसरे के विरोधी हैं। 'ठाकुर का कुआँ'32 कहानी की नायक 'गंगी' बीमार पति जोखू को ठाकुर के कुएँ से ताजा पानी पिलाने का प्रयास करती है। गंगी प्रश्न करती है कि हम नीच क्यों हैं? और ये लोग ऊँच क्यों हैं? इसलिए कि ये लोग गले में तागा डाल लेते हैं? यहाँ तो जितने हैं, एक-से-एक छँटे हुए हैं? चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकद्दमें ये करें। मिलावटखोरी करने वाले साहू, गडरिए की भेड़ चुराकर मारकर खा जाने वाले ठाकुर, जुआ खेलने वाले पंडित और महिलाओं के दुराचरण करने वाले कभी भी ऊँचे नहीं हो सकते, लेकिन वर्ण व्यवस्था गुण-अवगुण से नहीं, जन्मजात चलती है। उसे बेगार करने से मना करने वाले महँगू की पिटाई याद आने लगती है। यहाँ वर्ण व्यवस्था को कर्म के अनुसार कहने वालों की औकात दिखाती है कि वे किस तरह निकृष्ट कार्य करने के बावजूद व्यवस्था के शीर्ष पर कायम हैं। नवजागरण की दृष्टि से कहानी में चेतना और अधिकार के लिए कोई संघर्ष नहीं है। गंगी कुएँ से पानी भरने जाती है, ठाकुर के द्वार खुलने पर रस्सी और घड़े को वहीं छोड़कर भागने लगती है? इतना डर क्यों? प्रेमचंद को इस डर से मुक्ति का रास्ता बनाना चाहिए था। ऐसा उस समय के समाज में हो रहा था। प्रेमचंद के समकालीन डॉ. अंबेडकर 1927 में महाड़ का जल सत्याग्रह कर चुके थे। इस कहानी लेखन से 70 वर्ष पूर्व ज्योतिबा फुले अपने तालाब को दलितों के उपयोग के लिए खोल चुके थे। प्रेमचंद इसे पानी के अधिकार की कहानी बनाते तो नवजागरण के निकट होते। असल में, प्रेमचंद अंबेडकर के आंदोलन का कहीं भी समर्थन नहीं करते। वे अछूतों को थोड़ी रियायत देने के पक्षधर तो थे, पर उनका नेतृत्व और संघर्ष उन्हें स्वीकार नहीं था। गंगी क्यों भागी जा रही है? इस डर को निकालने के प्रयास में कहानी आगे बढ़नी चाहिए थी, लेकिन यह डर, डर ही बना रहा। मुंशी प्रेमचंद के पास इसका कोई जवाब नहीं हैं कि दलितों को गंदे व्यवसाय करने, जूठन खाने और गंदा पानी क्यों पीना पड़ रहा है? कहानी न्याय और अन्याय के लिए संघर्ष का बीजारोपण करवाने की अपेक्षा दलित पात्रों को संघर्ष पर जाने से रोकती ही नहीं, नियंत्रित करती है।

'दूध का दाम' 1934 में प्रकाशित हुई। गाँव के जमींदार के यहाँ तीन लड़कियों के बाद लड़के के जन्म पर उनकी पत्नी का दूध न उतरने पर दलित महिला 'भूंगी' अपने बच्चे का प्राकृतिक हक मारकर एक वर्ष तक जमींदार के बालक को स्तनपान करवाती है। दलित स्त्री द्वारा सवर्ण बालक को दुग्धपान करवाने से धर्म बिगड़ने की बात कहकर मोटेराम शास्त्री जमींदार से प्रायश्चित करवाने को कहते हैं तो महेशनाथ उन्हें एकबारगी फटकारते तो हैं, लेकिन वे कहीं पर भी न्याय के पक्ष में खड़े नहीं होते। कहानी दलितों के प्रति सवर्णों की वादाखिलाफी और नाटकबाजी का उद्घाटन करती है। ज्यों ही काम निकला, सारे वायदे हवा। जमींदारनी मंगल से छुआछूत करती है और उसे गालियाँ देते हुए द्वार से भगा देती हैं। व्यक्ति और समाज परिवर्तनशील हैं, लेकिन यहाँ प्रेमचंद वर्ण व्यवस्था का पुरजोर समर्थन करते देखे जा सकते हैं। जमींदार जब भूगीं से बातचीत करता है तो उसके दलितों के प्रति जातीय दुर्भावना संबंधी विचार सामने आते हैं - ''दुनिया में और चाहे जो कुछ हो जाए, भंगी भंगी ही रहेंगे। उन्हें आदमी बनाना कठिन है।''33 हद तो उस वक्त हो जाती है कि जब वे भंगियों को इनसान मानने से ही मना कर देते हैं। कहानी में दूध का दाम अपमानित होकर, जूठन खाकर मिल रहा है। मंगल को कुत्ते के संग रहते, खाते-पीते दिखाया गया है। दलित समाज को भोला-भाला बनकर रहने की अपेक्षा दुनियादारी की कुटिल चालों को समझने के प्रयास करने चाहिए। प्रेम के बदले में प्रेम तो ठीक है, लेकिन दुष्टता के बदले में भी प्रेम का प्रयास व्यक्ति की कमजोरी माना जाता है। कहानी जचकी कार्य काने वाली दलित महिला द्वारा जमींदार के बालक को दुग्धपान करवाने की स्थिति से संकेत करती है कि जातीय बंधन तोड़ने चाहिए, लेकिन अपना दूध पिलाकर जमींदार के बालक का जीवन बचाने वाली स्त्री के बालक और उसकी जाति को बार-बार जमींदार के परिवार और उसके नौकरों द्वारा अपमानित किया जाना बदलाव का मार्ग रोके खड़ा है। कहानी सारगर्भित बदलाव का मुद्दा उठाने के बावजूद सामाजिक जड़ता को तोड़ने में विफल रहती है। सामाजिक सच्चाई तो यह है कि बालक के संबंधियों या पारिवारिक महिलाओं में से ही बालक को कोई स्तनपान करवाती है। प्रेमचंद यहाँ सच्चाई के विरुद्ध नया प्रसंग उठाकर दलित पक्ष के सम्मान की बखियाँ उधेड़ डालते हैं।

'कफन' 1936 में प्रकाशित प्रेमचंद की सबसे विवादित कहानी है। इस कहानी में दलित बाप-बेटे के चरित्र को अत्यधिक असामाजिक, संवेदनहीन, सरोकारहीन और अप्राकृतिक बनाया गया है। संसार में ऐसा व्यक्ति या परिवार नहीं हो सकता, जिसकी स्त्री प्रसव वेदना में तड़पे और वह उसके मरने की कामना इसलिए करे ताकि आराम से सो सके। यही संवेदनहीनता कहानी की सबसे बड़ी कमजोरी और अवगुण है। ''चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना कामचोर था कि आध घंटे काम करता तो घंटे-भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मजदूरी नहीं मिलती थी।''34 बेगारी सहित कई तरह का शोषण झेलने वाले दलित कामचोर कैसे हो सकते हैं? संतान के जन्म की हालत में पति माधव को आवयक सामान की चिंता होती है, पर घीसू भगवान भरोसे रहते हैं। कहानी कहती हैं - ''सब कुछ आ जाएगा। भगवान दे तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे थे वे ही कल बुलाकर रुपए देंगे। मेरे नौ लड़के हुए घर में कभी कुछ न था, मगर भगवान ने किसी न किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया है।''35 अंधविश्वास पर चोट, अन्याय के विरुद्ध लोकजागरण, पीड़ित के प्रति संवेदना रखना, अधिकार देना नवजागरण के मूल्य हैं, लेकिन कहानी प्रसव वेदना में तड़प रही बुधिया की अपेक्षा ठाकुर की बारात में पचास पूड़ियाँ खाने के चटकारे पेश करती है। यह दलित और स्त्री विरोधी कहानी है।

लेखक जमींदार को दयालु और कामकाजी दलितों को निष्ठुर, नालायक कहते हैं। एक व्यक्ति बुरा हो सकता है, लेकिन सभी लोग बुरे नहीं हो सकते। बुधिया की मौत के बाद कफन और चिता की लकड़ी के लिए भीख माँगकर पाँच रुपए जुटाने के बाद पिता-पुत्र का बहानेबाजी करते-करते मधुशाला में पहुँचना घोर अनैतिकता का परिचायक है। ''पियक्कड़ों की आँखें इनकी ओर लगी हुई थी और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाए जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बताए, अभिनय भी किए। और आखिर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े।''36 लेखक लोक व्यवहार को पूर्णतः दरकिनार करते हुए बाप-बेटे को बाजार में शराब पीते, मछलियाँ और पूड़िया खाते पेश करते हैं। गाँव में कफन और लकड़ी के लिए भीख माँगने की जरूरत नहीं रहती, लोग स्वयं ही अंतिम संस्कार को पूरा करवाते हैं। 'कफन' के अनुसार दलित समाज नीच, नालायक, निकम्मा तो है ही, उसमें पारिवारिक और दांपत्य संबंधों के प्रति अविश्वसनीय भी है। कहानी में व्यक्ति के निकृष्ट, अविश्वसनीय चित्रण के साथ-साथ नकारात्मक संदेश है।

रचनाकार ने जीवन के जिन पक्षों को उद्घाटित किया है, उनमें कहीं न कहीं सामाजिक सच्चाई तो हो सकती है, लकिन चेतना कहीं दिखाई नहीं देती। साहित्य केवल सामाजिक सच्चाई का रोपण नहीं हैं, इसमें सामाजिक मार्ग दर्शन और चेतना का प्रवाह होना चाहिए। सामाजिक वीभत्सता चारों ओर दिखाई दे रही है, लेकिन समसामयिक और बेहतर मानवीय मूल्यों की तलाश करते हुए रचनाकार को पीछे भी जाना पड़े तो उसे चले जाना चाहिए। हमें देखना होगा कि जब हिंदी पट्टी में प्रेमचंद के समकालीन स्वामी अछूतानंद नवजागरण के प्रश्नों के लिए संघर्ष कर सकते हैं तो प्रेमचंद क्यों नहीं? वे तो स्वामी अछूतानंद से बड़े लेखक थे। प्रेमचंद कहीं पर भी वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था और भाग्यवाद और दैवीय चमत्कारों का तिरस्कार नहीं करते, बल्कि उनकी अधिकतर रचनाओं में तथाकथित ईवरीय शक्ति के इन्हीं औजारों को सम्मानित किया गया है। वे खुलकर चेतना और न्याय के पक्ष में आने से कतराते हैं। यह डर क्यों है और किसका है?

राजेंद्र यादव के अनुसार ''मैं भी उन महान और दिग्गज रचनाकारों की कालजयी रचनाओं को उतनी ही श्रद्धा और प्रशंसा से देखता हूँ जितना कोई भी प्राध्यापक देखता है। मगर सवाल तो उठा ही सकता हूँ कि अगर होरी या धीसू-माधव अपनी कहानियाँ खुद लिखते तो क्या उनके रूप यही होते? यह भी हमें नहीं भूलना चाहिए। अपनी सारी सद्भावना, सरोकार और सहानुभूति के साथ प्रेमचंद भी उसी वर्ग के थे जिस वर्ग के उनके पाठक या समीक्षक। एक ने लिखा, दूसरे ने सराहा और तीसरे ने उसे कालजयी सिद्ध कर दिया।'' 37 ओमप्रकाश वाल्मीकि प्रेमचंद की कहानियों पर लिखते हैं - ''प्रेमचंद की कहानी 'ठाकुर का कुआँ', 'सदगति', 'दूध का दाम' और अमृतलाल नागर के उपन्यास 'नाच्यौ बहुत गोपाल' की संवेदना क्या एक जैसी है? यथास्थिति बनाए रखने के लिए उनकी आंतरिक छटपटाहट ठंडी कर दी जाती है। संवेदनाओं के स्तर पर झकझोर देने वाली रचनाओं में दलितों की त्रासद स्थिति, समग्रता बोध, शोषण, दमन को पुख्ता करने वाले 'आदर्शों' के कारण प्रतिकार की बेचैनी, उग्रता, बदलाव की आकांक्षा, सहानुभूति से परिपूर्ण इस साहित्य में दिखाई क्यों नहीं पड़ती। क्यों खो जाती है वह छटपटाहट जो बदलाव को जन्म देती है? सामाजिक विषमता, परस्पर लूट-खसोट, सत्ता के गलियारों की चमचागिरी, भ्रष्टाचार,शिक्षा-संस्थाओं की धांधलियों से बचकर कब तक कन्नी काटते रहेंगे? हिंदी रचनाकार सीधे-सीधे समस्याओं से जूझने के बजाय क्यों जरूरी समझते हैं 'कला' के मुखौटे पहनना? हिंदी समीक्षा इन स्थितियों को रेखांकित करने की बजाय इनमें सहयोग देती है, इसलिए राष्ट्रीय समस्याओं पर हिंदी लेखक लगभग मौन धारण किए रहते हैं, कुछ अपवादों को छोड़कर। ये अपवाद भी वह हैं जो मुख्य धारा से बाहर हैं।''38 ''प्रेमचंद साहित्य में न दलित नेतृत्व है, न दलित चरित्र। इनकी रचनाओं के कथानक धर्मशास्त्रों के सूक्तों से ऊपर नहीं उठ पाए हैं। शास्त्र, जो अपने अंतस में पूर्वाग्रह समाए होने के कारण शूद्रों के लिये ''शस्त्र'' से भी ज्यादा मारक साबित हुए हैं। प्रेमचंद की कलम ''शास्त्र बनाम शस्त्र'' के गिर्द घूमती है।''39 राजनीतिक लोकतंत्र के 65 वर्ष बीत जाने के बाद दलितों को मानवीय गरिमा और सामाजिक सम्मान नहीं मिल पाया है। व्यवस्था के भेदभावों के प्रति इनकी शिकायतें कायम हैं। हाँ, इनके स्वरूप में इतना परिवर्तन तो देखा जा सकता है कि प्रत्यक्ष हिंसा की अपेक्षा मानसिक हिंसा बढ़ रही है। ''आजाद भारत में अछूत ज्यादा से ज्यादा 'अर्ध नागरिक' भर हैं और नागरिक समाज की रचना-प्रक्रिया के दौरान अछूत होने की कलंकित पहचान समग्र समाज में विलीन नहीं हो पाई है। अछूत आज भी समाज से बहिष्कृत हैं।''40

आज भी संपूर्ण देश में इनके प्रति हो रहे अत्याचारों का बड़ा कारण, कानून व्यवस्था लागू करने वाली मशीनरी की मानसिकता में व्याप्त अन्याय और भेदभाव का जीता-जागता उदाहरण है। भारतीय राज्य का संगठनात्मक ढाँचा और न्यायिक व्यवस्था इन्हें न्याय देने से बचती है। इनकी अस्मिताओं पर प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में हमले होते हैं, मानवाधिकारों को रौंदा जाता है, लेकिन वर्तमान सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों में इन्हें न्याय मिलना कठिन डगर बनी हुई है। पिछले वर्षों के दौरान आए न्यायपालिका के निर्णय इसे सिद्ध करने के लिए काफी हैं। न्यायालयों द्वारा अपने निर्णयों में यहाँ तक कह दिया गया है कि जब सवर्ण पुरुष दलित स्त्री को छू ही नहीं सकता तो उससे बलात्कार करने की बात कैसे मानी जा सकती है? उन्हें संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में दलित महिलाएँ जीवन को अपमान-अभिशाप मानकर ढोती रहती हैं या आत्महत्याएँ कर लेती हैं। वैसे भी न्यायपालिका निर्णय देती है, न्याय नहीं। निर्णय देते वक्त किसी से न्याय हो जाए तो ठीक है नहीं हो तो आगे का रास्ता खुला है। न्याय व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण न्याय मिलता टेढ़ी खीर है। दिल्ली में दामिनी गैंगरेप पर दिल्ली की सड़कों पर गुस्सा उतर आता है, लेकिन इसी दौरान दिल्ली के आसपास सैंकड़ों दलित महिलाओं से गैंगरेप होते हैं तो लोग इस अन्याय के विरुद्ध सड़कों पर उतरकर आंदोलनकारियों का जरा भी साथ नहीं देते और इन पर लिखने के लिए मीडिया की कलम की तो स्याही ही सूख जाती है। इन सबके बावजूद दलित समाज में राजनीतिक चेतना निरंतर उभर रही है जो उनकी चेतना, अस्मिता और अस्तित्व के लिए आवश्यक है, क्योंकि देश का स्थापित नेतृत्व और प्रशासन इनके वोट तो हासिल कर लेता है, लेकिन इनके प्रति होने वाले जुल्मों के विरुद्ध कार्रवाई करने से हिचकिचाता है। तब वह न्याय का पक्षधर बनने की बजाय, सवर्ण मानसिकता से काम करता है।

ज्योतिबा फुले और मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को नवजागरण की दृष्टि से तुलना करने पर कई प्रश्न उभरते हैं। ज्योतिबा फुले के साहित्य में ऐतिहासिकता के नजरिए से तत्कालीन समाज के व्यवहारों पर गंभीर चिंतन हुआ है। वे समाज को खंड-खंड करने वाली वर्ण-धर्म और जातिवाद संबंधी शोषण के लिए हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहराते हैं। फुले दलितों, पिछड़ों और स्त्रियों की शिक्षा के लिए अभियान चलाते हैं और सामाजिक और सरकारी सहयोग से अनेक विद्यालयों की स्थापना करने और करवाने में सफल रहते हैं। वे ब्राह्मणवाद की विचारधारा को सामाजिक विकास, समता, बंधुता, न्याय और बौद्धिकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा के रूप में देखते हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि भाग्य, भगवान और भविष्य ने समाज को बहुत अधिक नुकसान किया है, इसलिए अब अँग्रेजी शिक्षा व्यवस्था को अपनाकर समाज को ज्ञानसत्ता से जोड़ने का सुनहरा अवसर आया है। उनकी दृष्टि में वेद-शास्त्रों में ज्ञान होना तो दूर ये इसके निकट भी नहीं हैं। फुले चाहते हैं कि भारतीय समाज पश्चिमी ज्ञान और बंधुता पर आधारित समतामूलक आचरण को अपनाकर सभ्य बने। कुल मिलाकर कहें तो इनके पास दलितों, बहुजनों, स्त्रियों सहित समाज के विकास के अनेक फार्मूले हैं। प्रेमचंद की संदर्भित कहानियों में मानवीय सरोकारों की भारी कमी है और वहीं वे भाग्य, भगवान, भविष्य और दैवीय शक्तियों पर बहुत विश्वास करते हैं जो उनके लेखन में बार-बार उभरती हैं। यही अंध ताकतें नवजागरण के मूलभूत मूल्यों की विरोधी हैं। अंतिम पंक्ति मे जोड़कर रखे गए शोषित समाज के विकास का उनके पास कोई महत्वपूर्ण फार्मूला नहीं है। दलित समाज पर लिखी प्रेमचंद की कहानियाँ सदियों से सांस्कृतिक श्रेष्ठता के नाम पर इनमें रचाए-बसाए भय का प्रतिरोध नहीं करती, बल्कि उसे संरक्षण देती हैं जिससे लोकजागरण की चेतना के निर्माण में अनेक अवरोध पैदा होते हैं। यदि कहा जाए कि प्रेमचंद की संदर्भित कहानियाँ वर्ण व्यवस्था के मूल की पक्षधर बनकर उभरती हैं तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।

प्रेमचंद की उपरोक्त कहानियों में दलित समाज के कामकाजी चरित्र एवं संस्कारों को लांछित करते हुए इन्हें मूलभूत मानवीय सम्मान से भी वंचित किया गया है। यह कहकर प्रेमचंद को इस आरोप से मुक्त नहीं किया जा सकता कि उस समय का समाज ऐसा ही था। यहाँ देख रहे हैं कि फुले जिस बेबाकी से समाज, धर्म और भेदभावों को प्रश्रय देने वाली मनु व्यवस्था पर अपने विचार रखते हैं, दलित-बहुजन के प्रति वैसे विचार प्रेमचंद के अगल-बगल भी नहीं हैं। वे 'तृतीय रत्न', 'ब्राह्मणों की चालाकी' 'गुलामगिरी' और 'अछूतों की कैफियत' नामक महत्वपूर्ण संदर्भित रचनाएँ लिखकर देश-दुनिया के सामने सार्वभौमिक न्याय के प्रश्न खड़े करते हैं, जिनसे हमें मालूम होता है कि वे नवजागरण के मुद्दों से गहरे तक जुड़े हुए थे। प्रेमचंद के समकालीन बाबा साहेब अंबेडकर शिक्षा, न्याय और प्रतिनिधित्व के प्रश्नों पर निरंतर लिख रहे थे और आंदोलन चला रहे थे। यहाँ तक कि उनके आंदोलन गांधी जी के एकतरफी आजादी के आंदोलन को वैचारिक समग्रता प्रदान कर रहे थे। उत्तर प्रदेश में स्वामी अछूतानंद और पंजाब से मंगूराम मंगोवालिया सामाजिक चेतना, प्रतिनिधित्व और न्याय के अभियान चला रहे थे, लेकिन प्रेमचंद की कहानियाँ इन अभियानों के मुद्दों से एक विशेष दूरी बनाकर रखती हैं। अतः कह सकते हैं कि भारतीय नवजागरण के दलित प्रश्नों की दृष्टि से ज्योतिबा फुले के लेखन में प्रेमचंद की कहानियों से अधिक व्यापकता और समग्रता मौजूद है।

संदर्भ :

1 . विमलकीर्ति, महात्मा ज्योतिबा फुले रचनावली, खंड-1, आमुख से, राधाकृष्ण प्रकाशन दिल्ली, पेपरबैक संस्करण 2002

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3 . शंभुनाथ, राष्ट्रीय पुनर्जागरण और रामविलास शर्मा, पृ. 142, नई किताब, दिल्ली, 2013

4 . रोहिणी अग्रवाल, भारतीय नवजागरण : स्त्री प्रश्न और हिंदी साहित्य, बहुवचन-अंक 23, अक्तूबर-दिसंबर 2009, पृ. 209, अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा

5 . हंस विशेषांक - सत्ता विमर्श और दलित, अगस्त 2004, पृ. 4-5, नई दिल्ली

6 . रजत रानी 'मीनू', हिंदी दलित कथा साहित्य, अवधारणाएँ और विधाएँ, पृ. 39,अनामिका पब्लिशर्स दिल्ली, 2010

7 . विमलकीर्ति, महात्मा ज्योतिबा फुले रचनावली, खंड-1, आमुख से

8 . वही, पृ. 95

9 . वही, पृ. 119

10 . वही, पृ. 141

11 . वही, पृ. 145

12 . वही, पृ. 214

13 . वही, पृ. 285

14 . वही, पृ. 218

15 . वही, पृ. 223

16 . वही, पृ. 236

17 . ज्योतिबा फुले, गुलामगीरी (अनुवादक : विमल कीर्ति) आवरण पृष्ठ, सम्यक प्रकाशन दिल्ली, 2006

18 . विमलकीर्ति, महात्मा ज्योतिबा फुले रचनावली खंड-1, पृ. 228

19 . विमलकीर्ति, ज्योतिबा फुले रचनावली खंड-2, पृ. 291

20 . वही, पृ. 295

21 . वही, पृ. 297

22 . वही पृ. 300-301

23 . वही, पृ. 305

24 . वही, पृ. 306

25 . वही, पृ. 306

26 . वही, पृ. 307

27 . हंसराज रहबर, प्रेमचंद : जीवन कला और कृतित्व, पृ. 163, 1962

28 . ओमप्रकाश वाल्मीकि, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, पृ. 67, राधाकृष्ण प्रकाशन दिल्ली, छात्र संस्करण, 2014

29 . रत्न कुमार सांभरिया, मुंशी प्रेमचंद और दलित समाज, पृ. 22, अनामिका पब्लिशर्स, नई दिल्ली, 2011

30 . वही, पृ. 71 'मूल कहानियाँ'

31 . वही, पृ. 151

32 . वही, पृ. 157

33 . वही, पृ. 165

34 . वही, पृ. 181

35 . वही, पृ. 181

36 . वही, पृ. 187

37 . हंस विशेषांक - सत्ता विमर्श और दलित, अगस्त 2004, पृ. 7

38 . ओमप्रकाश वाल्मीकि, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, पृ. 106

39 . रत्न कुमार सांभरिया, मुंशी प्रेमचंद और दलित समाज, पृ. 21

40 . अभय कुमार दुबे, आधुनिकता के आईने में दलित, पृ. 22, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, 2004 स


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हिंदी समय में अजमेर सिंह काजल की रचनाएँ