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कहानी

आखिरी गीत
नीना पॉल


सारा हाल भरा हुआ था। यह सोनल का पहला बड़ा म्यूजिक कॉन्सर्ट था। आज वह अपने डैडी का सपना साकार करने जा रही थी। डैडी, जिनसे उसने चार साल तक बात नहीं की थी। अफसोस उसकी हर साँस में बसा हुआ था। आज अपनी एंजल का गाना सुन कर डैडी का सीना गर्व से भर जाएगा। वही सीना जिसके कारण वह मौत के दरवाजे पर खड़े थे।

कपिल खाँसते-खाँसते दोहरे हुए जा रहे थे। उन्हें साँस लेने में भी तकलीफ हो रही थी। उनका एक हाथ सीने पर था तो दूसरे से कुर्सी थामे हुए थे कि खाँसते हुए कहीं संतुलन ना खो दें। उन्होंने साँस लेने के लिए सिर को थोड़ा ऊँचा किया ही था कि खाँसी का दूसरा दौर शुरू हो गया। सोनल ने डैडी की ऐसी हालत पहले कभी नहीं देखी थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। इतने में उसका छोटा भाई चराग एक हाथ में पानी का गिलास और दूसरे हाथ में इन्हेलर ले कर भागता हुआ आया।

सोनल डैडी से नाराज जरूर थी लेकिन वह उन्हें इस हालत में भी नहीं देख सकती थी। सोनल का अपने डैडी से नाराज होना किसी हद तक उचित भी था। वह उस समय सब कुछ छोड़-छाड़ कर चले गए थे जब सोनल को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। डैडी ने सिर्फ और सिर्फ अपने लिए ही सोचा। वह बिना अपने बच्चों से मिले, बिना कुछ कहे, घर छोड़ कर चल दिए। वह डैडी को इस बात के लिए कभी भी माफ नहीं कर सकती।

'किसने किसको छोड़ा और किसकी बेवफाई की सजा किसको भुगतनी पड़ रही है'

यह अपने में ही कुछ ऐसे सवाल हैं जो सवाल ही बन के रह गए। सोनल के सवाल, जवाब ढूँढ़ते हुए एक और नया सवाल खड़ा कर देते। मम्मी से भी आज कल उसकी अकसर झड़प हो जाती। आज तो मम्मी ने उसे और भी भड़का दिया।

'बच्चो तुम्हारे डैडी चाहते हैं कि ये गर्मी की छुट्टियाँ तुम दोनों उनके साथ मेबलथोर्प में बिताओ और मैंने उन्हें हाँ कह दिया है।'

'क्या? हम से पूछना भी किसी ने उचित नहीं समझा कि हम क्या चाहते हैं। हर समय क्या उन्हीं की मर्जी चलेगी' सोनल तुनक कर बोली।

'सोनल' ...मम्मी ऊँची आवाज में बोलीं, 'वह तुम्हारे डैडी हैं। उनका भी कुछ हक है अपने बच्चों पर।'

'हक,' 'हक की बात तो मम्मी आप ना ही करिए तो अच्छा होगा। क्या उस समय हमारा हक नहीं बनता था ये जानने का कि आखिर डैडी हमें कुछ बताए बिना चले क्यों गए। वह भी मुझे मँझधार में छोड़ कर। कितनी शर्म आई थी मुझे अपने दोस्तों के सामने। मैं कहीं नहीं जाऊँगी।'

'देखो सोनल कभी जिंदगी इनसान को ऐसे मुकाम पर ले आती है कि ना चाह कर भी कुछ फैसले लेने पड़ जाते हैं।'

'चाहे उसके लिए कितनों के दिल टूटें मॉम।' मैं अब बड़ी हो गई हूँ। 'सो प्लीज आई नीड एन ऐक्सप्लनेशन।'

जवाब देने के स्थान पर अंजलि खिड़की के बाहर देखने लगी।

ठीक है... सोनल गाल पे सरकते आँसुओं को हटाते हुए बोली 'ना मैं उनसे मिलना चाहती हूँ और ना ही बात करना।'

चराग जो चुपचाप सारी बात सुन रहा था उचक कर बहन से बोला... 'यू आर सो स्टबर्न।' कभी डैडी के फोन का जवाब तक नहीं देती।

'इटस नन ऑफ योर बिजनेस समझे।' सोनल गुस्से से बोली।

'अनफ बोथ ऑफ यू।' मैं अब कोई और बदतमीजी नहीं सुनूँगी; अंजलि की आवाज आई तो दोनों खामोश हो गए। तुम अब छोटी सी बच्ची नहीं हो सोनल। गर्मी की छुट्टियों के बाद यूनिवर्सिटी जा रही हो। यह छुट्टियाँ डैडी के साथ बिता लो, बाद में करती रहना अपनी मनमर्जी।

'मम्मा ये मेबलथोर्प वही है ना स्केगनेस के पास। ओह सोनल सोचो हम पूरे दो महीने समुंदर के नजदीक रहेंगे। सच कितना मजा आएगा डैडी के साथ लहरों से रेस लगा कर', चराग सोनल का हाथ पकड़ कर बोला तो उसने भाई का हाथ झटक दिया।

हाँ बेटा, अंजलि आवाज में मिठास भर कर बोली... तुम्हारे डैडी तुमसे बहुत प्यार करते हैं।

'झूठ' ...सोनल की तड़पती हुई आवाज आई 'वह सिर्फ अपने संगीत से प्यार करते हैं या फिर... जिसके लिए उन्होंने हमें छोड़ा। मुझे नफरत है उनके हारमोनियम और तानपूरे से। जिस दिन डैडी हमारी जिंदगी से गए मैंने उसी दिन कसम खाई थी कि अब मैं कभी नहीं गाऊँगी।'

'ये कसमें भी न, इनसान गुस्से में आ कर ले तो लेता है परंतु आगे क्या होने वाला है ये कोई भी नहीं जानता। 'जिंदगी बहुत छोटी है बेटा। न जाने कब क्या हो जाए और पछताने का भी समय ना मिले।'

सोनल पछताई ही तो थी डैडी की ऐसी हालत देख कर। डैडी के प्यार में तो कोई कमी नहीं आई थी। चार लंबे सालों के बाद अपनी बेटी को सामने देख कर कपिल तो बस उसे देखते ही रह गए। उनकी गुड़िया इतनी जल्दी बड़ी हो गई। अभी कल ही की तो बात लगती है जब वह परेशान से हॉस्पिटल में इधर से उधर टहल रहे थे। अंजलि का दर्द उनसे देखा नहीं जा रहा था। अंजलि प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी।

'मिस्टर सिन्हा आपकी पत्नी को हमने इंजेक्शन दे दिया है। हमारी यही कोशिश रहेगी कि बच्चा नॉर्मल पैदा हो। आप भी थोड़ा आराम कर लीजिए। सब ठीक होगा' डाक्टर ने सांत्वना देते हुए कहा।

कपिल एक कप चाय लेकर वेटिंगरूम में एक कोने पे रखी कुर्सी पर जा कर बैठ गए।

वह रात भर के जगे हुए थे। कुर्सी की पीठ से सिर टिकाते ही उनकी नींद से बोझिल आँखें बंद होने लगीं। वह नींद में क्या देखते हैं कि सारा कमरा एक रोशनी से भर गया। दरवाजे से एक स्त्री सफेद कपड़े पहने हुए अंदर आती है। स्त्री के चेहरे पर एक मुस्कुराहट खेल रही थी। उसकी बाँहों में गुलाबी कपड़ों में लिपटा एक बंडल था। उसने आगे बढ़ कर वह बंडल कपिल के हाथों में दे दिया...

मिस्टर सिन्हा... नर्स ने कंधा हिला कर कपिल को जगाया। 'मिस्टर सिन्हा मुबारक हो आप एक प्यारी बेटी के बाप बन गए हैं।'

'अंजलि कैसी है नर्स', कपिल ने जल्दी से पूछा।

आपकी पत्नी और बेटी दोनों बिल्कुल ठीक हैं। नर्स ने मुस्कुरा कर जवाब दिया। 'क्या मैं उन्हें देख सकता हूँ'? क्यों नहीं? आइए मेरे साथ।

ओह मेरी एंजल... कपिल का दिल धड़क रहा था और हाथ काँप रहे थे बेटी को उठाते हुए। 'याद है इसका नाम हमने सोनल रखा है एंजल नहीं' अंजलि शर्माते हुए कमजोर आवाज मे बोली।

तुम इसे कुछ भी बुलाओ अंजलि लेकिन मेरे लिए तो यह एंजल है। कपिल भावुक हो कर बोले बहुत शुक्रिया इतनी प्यारी बेटी देने के लिए और झुक कर उन्होंने पत्नी के माथे का चुंबन ले लिया।

प्यार तो आज वह अपनी रूठी हुई बेटी को भी करना चाहते थे। उसे बताना चाहते थे कि उससे बढ़ कर उनके लिए दुनिया में और कोई चीज नहीं।

डैडी... चराग भाग कर आ डैडी से लिपट गया तो वह खयालों से जागे। कपिल की आँखे तो बस बेटी के चेहरे पर जमीं हुईं थीं। 'हाय एंजल। कैसी है मेरी गुड़िया।'

आप शायद और चीजों की तरह यह भी भूल गए हैं कि मेरा नाम एंजल नहीं सोनल है। वह बिना डैडी के गले लगे बेरुखी से आगे बढ़ गई।

कपिल की बाँहें खुली की खुली रह गईं। एक दर्द की लहर उनकी आँखों से गुजर गई। अंजलि ने धीरे से कपिल की बाँह छू कर कहा, थोड़ा समय दो इसे। नाराज है। ठीक हो जाएगी।

समय कब किसके लिए रुकता है। हाँ इनसान जरूर थक हार कर धीमा पड़ जाता है।

थकावट तो आज कल कपिल को भी रहने लगी थी। वह थोड़ा सा भी कोई काम करते तो साँस फूलने लगती। एक बहुत बड़े स्टेज शो की वह आज कल दिन रात तैयारी कर रहे हैं। वह चाहते हैं कि सोनल भी उनके साथ गाए लेकिन कहने की हिम्मत नहीं हुई।

बचपन में सोनल को गाना सिखाते हुए कपिल जान गए थे कि थोड़ी सी मेहनत के बाद यह एक बहुत अच्छी गायिका बन सकती है। उसके गले की मिठास और स्वरों का दर्द उनके पारखी कानों ने कई बार सुना और दिल ने महसूस भी किया था। एक बार तो वह एक सरगम में उलझे हुए थे कि सोनल ने गाते गाते उस में ऐसे स्वर लगाए कि कपिल हैरान रह गए।

'डैडी मैंने एक गाना बनाया है सुनेंगे।'

'हाँ सुनाओ ना बेटा, हम भी देखें हमारी एंजल ने कौन-सी धुन बनाई है।'

सोनल जोर जोर से मेज पर तबला बजा कर अँग्रेजी धुन की नकल में गाने लगी।

कपिल कुछ देर तो सुनते रहे फिर प्यार से बोले 'बेटे यह कैसा गाना है।'

'डैडी यह आज के जमाने का गाना है। आज कल लोग ऐसे ही तो गाने पसंद करते हैं।'

'हाँ बेटा गाना अच्छा है, बहुत अच्छा। मगर एक बात हमेशा याद रखना कि ऐसे गाने जितनी जल्दी बनते हैं उतनी जल्दी ही खत्म भी हो जाते हैं। धुन वो जो लोग सालों साल याद रखें और शब्द वो जो कानों के रास्ते दिल में उतर जाएँ। ऐसे गाने हमेशा लोगों की जुबाँ पर और उनके दिलों में जिंदा रहते हैं।'

'ऐसा संगीत आज कल कहाँ मिलता है डैडी!'

मिलता है बेटा' कपिल जल्दी से बोले। 'यह संगीत तो प्रकृति के कण-कण में बसा हुआ है। कभी खामोशी में बैठ कर भँवरों की गुन-गुन सुनो। कबूतरों की गुटरगूँ सुनो। कोयल, पपीहा इन सब की आवाज में तुम्हें एक रिदम भरा संगीत सुनाई देगा... इनका संगीत ले कर जो धुन बनेगी न एंजल वह अपने में ही एक नायाब संगीत होगा। तुम ऐसा संगीत बना सकती हो। मैंने तुम्हारी आवाज में वह तड़प महसूस की है। बस तुम्हें सही रास्ते की जरूरत है।' कपिल अपनी ही धुन में बोलते जा रहे थे जिसे सोनल मंत्रमुग्ध-सी सुन रही थी।

आज वही सोनल डैडी के गाने की आवाज सुन कर परेशान हो उठी... 'उफ, रोज सुबह सुबह डैडी क्या जताने की कोशिश करते हैं। कपिल तो सारे दरवाजे बंद करके अपने कमरे में संगीत का रियाज कर रहे थे जिसकी आवाज सोनल के कानों में पड़ गई। मगर आज डैडी यह क्या गा रहे हैं। बोल और धुन उसे कुछ जानी पहचानी लगी। कपिल को पता ही न चला कि कब वह वही धुन गाने लगे जो घर छोड़ने से पहले वह सोनल को स्कूल कंपटीशन में गाने के लिए सिखा रहे थे। थोड़ी देर तक सोनल सुनती रही। बेखयाली में सोनल भी वह धुन गुनगुनाने लगी। उसे यूँ लगा जैसे वह भी डैडी के साथ बैठ कर स्वर से स्वर मिलाने की कोशिश कर रही हो।

अचानक कपिल को जोर से खाँसी आई। खाँसी की आवाज ने सोनल को भी खयालों से जगा दिया। उसके दिमाग को एक झटका सा लगा। खाँसी रुकते ही कपिल फिर से वही धुन गाने लगे। सोनल स्वयं को और ना रोक सकी। वह पैर पटकती हुई सीधी डैडी के कमरे में दाखिल हुई।

'डैडी' ...बेटी की आवाज सुन कर कपिल का गाना रुक गया। 'आप क्या जताना चाहते हैं। जो कुछ भी आप करने की कोशिश कर रहे हैं न, वो कभी नहीं होगा। प्लीज जब तक मैं यहाँ हूँ मेरे सामने आप ना ही गाएँ तो अच्छा होगा।'

कपिल खामोश नजरों से कुछ सोचते हुए बेटी को देखते रहे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि इसे कैसे समझाएँ। ऐसा ना हो कि फिर बहुत देर हो जाए।

चराग डैडी को ढूँढ़ते हुए बाहर आया तो देखता है कि डैडी दूर समुंदर के किनारे खड़े लहरों का तमाशा देख रहे हैं। अभी तो लहरें बहुत शांत दिखाई दे रही हैं लेकिन जब वो हवाओं संग आँखमिचोली खेलती हैं, तब यही लहरें तूफान का रूप धारण कर तहस-नहस कर देती हैं।

आज सुबह अपने अंदर उठते ज्वारभाटे को कपिल ने हमेशा की तरह लंबी साँसें लेकर शांत कर दिया। वह अपनी बेटी को अच्छी तरह से जानते हैं। सोनल बाहर से कितनी भी कठोर क्यों न दिखे परंतु उसका दिल मोम से भी ज्यादा कोमल है। जिसे पिघलाने के लिए आग नहीं प्यार की जरूरत है।

समय का उन्हें पता ही ना चला कि कितनी देर से वह समुंदर के किनारे खड़े लहरों का खेल देख रहे थे कि पीछे से एक जानी पहचानी आवाज आई। 'लगता है इन लहरों के साथ आज कोई नई धुन बन रही है।' पलट के देखा तो पीटर और गौतम वहाँ मुस्कुराते हुए खड़े थे।

'क्या बात है भई... आज सूरज उल्टी दिशा से कैसे निकल आया जो हमारे प्यारे दोस्त अपनी गहरी नींद छोड़ कर सेहत बनाने चले आए' कपिल ने छेड़ते हुए कहा।

क्या करें तुम्हारी तरह हम सुबह सबेरे आ...आ...आ... करने नहीं उठ सकते।

अरे हाँ इस आ... से याद आया, पीटर मैं चर्च में बैठ कर संगीत का रियाज कर सकता हूँ। बात यह है यार कि इन गर्मी की छुट्टियों में बच्चे मेरे साथ थोड़ा समय बिताने आए हुए हैं। मैं उन्हें सोते हुए डिस्टर्ब नहीं करना चाहता।

क्यों नहीं। मगर तुम्हे मालूम है कि चर्च में रिपेयर का काम चल रहा है। धूल मिट्टी काफी होगी। फिर तुम्हें अस्थमा भी रहता है, पीटर सोचते हुए बोला।

यार थोड़े दिन की तो बात है। आज कल मैं कुछ नई धुनों पर काम कर रहा हूँ जिन्हें बीच में नहीं छोड़ सकता। कपिल बोले।

'ठीक है अगर तुम धूल में सरवाइव कर सकते हो तो मुझे कोई आपति नहीं' पीटर बोला।

'वह देखो मेरा बहादुर बेटा कैसे भागता हुआ आ रहा है' कपिल का सिर गर्व से ऊँचा हो गया।

यकीनन यह तो मानने वाली बात है। जिस बहादुरी से कल सोनल ने उस गिरते हुए बच्चे को बचाया वह कोई मामूली काम नहीं था। भई आज कल के बच्चे दूसरों की कहाँ परवाह करते हैं।

'सोनल ने' ...आखिर किया क्या मेरी सोनल ने कपिल ने उत्सुकता से पूछा।

तुम्हें नहीं पता। सोनल ने कल फुर्ती ना दिखाई होती तो न जाने उस बच्चे का क्या होता। एक पाँच छह साल का बच्चा घोड़ों वाली राईड पे सवार था। वही जहाँ गोलचक्र घूमता रहता है और एक डंडे के सहारे घोड़े भी ऊँचे नीचे होते रहते हैं। बस माँ पे नजर पड़ते ही उस बच्चे ने खुश हो कर एक हाथ छोड़ कर हिलाना चाहा। इतने में ही वह अपना संतुलन खो बैठा। इससे पहले कि वह बच्चा नीचे गिरता, सोनल ने फुर्ती से आकर उस बच्चे को अपनी बाँहों में ले लिया। ऐसा करते समय उसके हाथ में चोट भी लग गई थी। मान गए कपिल, बड़े बहादुर बच्चे हैं तुम्हारे।

'डैडी की बहादुरी तो तब पता चलेगी जब वह मेरे साथ रेस लगाएँगे' पीछे से चराग की आवाज आई। 'ये बात है तो चलो हो जाए।' ग्यारह साल के लड़के के साथ कपिल का मुकाबला ही क्या। भागते-भागते कपिल को खाँसी आने लगी। वह साँस लेने के लिए रुके और फिर दौड़ पड़े। अभी वह कुछ दूर ही गए थे कि बड़े जोर का खाँसी का दौरा पड़ा। कपिल दोनों हाथों से पसलियों को यूँ थामे हुए थे मानों वह बहुत दर्द में हों। मुँह में कुछ अजीब सा कड़वा गीलापन महसूस हुआ तो जेब से रूमाल निकाल कर मुँह साफ करते ही चौंक गए। रूमाल पर लाल खून के धब्बे दिखाई दिए। इससे पहले कि चराग की नजर उस रूमाल पर पड़ती उन्होंने जल्दी से वो रूमाल जेब में रख लिया।

'यू आर टू स्लो डैडी।'

'अब क्या करें बेटे तुम्हारे डैडी बूढ़े जो हो रहे हैं। अच्छा यह बताओ आज सुबह सोनल तुम्हें डाँट क्यों रही थी।'

'वही पुरानी बात डैडी। कमरा इतना गंदा रखता है। अपने कपड़े नहीं सँभालता, बला, बला, बला... बस लड़कियों को सिवाय सफाई के और आता ही क्या है। दे डोंट नो हाओ टू एन्जॉय लाईफ।'

'बहुत बोलने लगे हो चराग। अच्छा यह बताओ तुम्हारी बहन का पसंदीदा रंग कौन सा है।'

'हूँ... वही आसमानी नीला रंग' चराग सोचते हुए बोला।

'चलो तो ठीक है कल बाप बेटा कुछ काम करेंगे।'

काम तो किया दोनों ने सारा दिन। बीच में कपिल को खाँसी जरूर आती रही लेकिन वह रुके नहीं।

'रुको सोनल।' सोनल अपने कमरे की ओर बढ़ने लगी तो चराग ने रोका। 'पहले यह पकड़ो। कैंची...'

'मैं बहुत थकी हुई हूँ। इस समय कोई गेम खेलने के मूड में नहीं हूँ।'

'यह कोई गेम नहीं है। मैं भी थका हुआ हूँ' चराग हाथ हिलाते हुए बोला। 'सुबह से तुम्हारा काम ही तो कर रहा हूँ। पहले यह कैंची लेकर क्वीन की तरह रिबिन काटो, तब कमरे में जा सकती हो।'

सोनल कुछ पल खड़ी भाई को देखती रही फिर गुस्से से बोली 'लाओ कैंची।' दरवाजा खुलते ही कमरे की बदली हुई रंगत देख कर सोनल वहीं खड़ी रह गई। दीवारों पर उसका मन पसंद रंग, नए पर्दे, नया बिस्तर। हैरान हो कर उसने चराग की ओर देखा तो वह जल्दी से बोला 'यह आइडिया तो डैडी का था लेकिन हैल्प मैंने की है।'

सुबह सोनल की आँख खुली तो क्या देखती है कि डैडी उसके सिरहाने खड़े बड़े प्यार से अपनी सोई हुई बेटी को निहार रहे हैं। एक पल को बाप बेटी की नजरें मिलीं। सोनल का जी चाहा कि उठ के डैडी के गले लग जाए मगर उसने नजरें घुमा लीं। एक लंबी साँस ले कर कपिल कमरे से बाहर आ गए। सोनल की बंद पलकों से दो आँसू ढुलक गए।

आँसू तो उस समय कपिल की आँखों में भी भर आए थे जब डॉक्टर ने उनसे बताया कि उन्हें लंग कैंसर है। कैंसर था भी अपनी एडवांस स्टेज पर जहाँ वह शरीर के अन्य हिस्सों सें फैल रहा था।

इसका मतलब बचने की कोई उम्मीद नहीं है... कपिल ने उदास स्वर में पूछा 'तुमने अपनी हर उम्मीद को जगाने में बहुत देर कर दी है कपिल।' अब मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता।'

'अच्छा डॉक्टर सच्चे मन से एक जवाब दीजिए कि कितना समय है मेरे पास?'

'कोई ज्यादा नहीं कपिल।'

'दो महीने, पाँच महीने कितने डाक्टर... प्लीज मुझसे कुछ छुपाना नहीं।'

'एक साल भी काट जाओ तो स्वयं को खुशकिस्मत समझना। मगर यह समय तुम्हारे लिए असान नहीं होगा कपिल।'

'डॉक्टर एक विनती कर सकता हूँ। मेरे कैंसर के बारे में किसी को भी पता नहीं चलना चाहिए। विशेषकर मेरे बच्चों को। मैं उनके साथ अपनी जिंदगी के बीते हुए समय को जीना चाहता हूँ।'

'कब तक कपिल। यह चीज ज्यादा देर तक छुपी नहीं रह सकती।'

बच्चे चाहे माँ-बाप से कितने भी नाराज क्यों ना हों उनके मन में छुपा प्यार आखिर एक दिन सामने आ ही जाता है।

आज डैडी के गाने की आवाज क्यों नहीं आ रही। उनकी तबियत तो ठीक है न। आज कल वह खाँसते भी बहुत हैं। कहीं मैं उनके साथ ज्यादा कठोर तो नहीं हो रही। सोचते हुए सोनल का ध्यान बाहर पक्षियों की चहचहाहट की ओर चला गया।

ऐसी पक्षियों की आवाज लंदन जैसे शहर में कहाँ। वहाँ की दौड़ भाग की जिंदगी, जहाँ सुबह उठते ही हर किसी को अपनी-अपनी पड़ी होती है। किसी के पास इतना समय ही कहाँ है जो परिंदों की ओर ध्यान जा सके। फिर बंद घर, डबलग्लेस खिड़कियाँ। जहाँ से हवा आने की भी गुंजाइश ना हो वहाँ परिंदों की आवाज किसे सुनाई देगी।

आज डैडी के गाने की आवाज क्यों नहीं सुनाई दे रही। गाऊन पहन कर सोनल जल्दी से डैडी के कमरे की ओर गई। वहाँ ना डैडी थे ना हारमोनियम और ना ही की-बोर्ड। सोनल ने सोचा बस... अब और नहीं। मैं डैडी को और तकलीफ नहीं दे सकती। सोनल किचन में जा कर नाश्ता बनाने लगी।

घर के बाहर से ही बड़ी अच्छी खुशबू आ रही थी। 'नहीं, ये खुशबू मेरे घर से कैसे आ सकती है कपिल चर्च से आते हुए सोचने लगे। मैं तो बच्चों को सोते हुए छोड़ कर आया हूँ। कहीं मैं गैस पे कुछ रख कर भूल तो नहीं गया। आज कल याददाश्त भी तो कुछ ऐसी ही हो रही है।' जल्दी से किचन का दरवाजा खोला तो क्या देखते हैं कि सोनल पूरियाँ तल रही है और चराग गर्मागर्म पूरियाँ खा रहा है।

'हाय डैडी।' चराग की आवाज सुनते ही सोनल पलटी। 'आइए डैडी आप भी नाशता कर लीजिए।' कपिल हैरानी से बेटी को देखने लगे। 'आइए बैठिए न सब ठंडा हो जाएगा' सोनल ने प्लेट में फूली हुई पूरी रखते हुए कहा। बाप बेटी दोनों खामोशी से खा तो रहे थे परंतु दोनों के दिलों में कितने ही शिकवे शिकायतें तूफान उठा रहे थे। पहली बार सोनल ने आँख भर कर डैडी की ओर देखा और पाया कि डैडी बहुत कमजोर हो गए हैं।

कमजोर तो कपिल की हिम्मत पड़ गई थी बेटी का प्यार देख कर। 'क्या मैं बेटी का कन्यादान भी अपने हाथों नहीं कर पाऊँगा। मेरे साथ ही यह सब क्यों... अभी तक जो मैं सह रहा हूँ क्या वह कम है। चराग भी कितना छोटा है। खैर चराग की इतनी फिक्र नहीं है। उसका खयाल रखने के लिए नीरज जो है। मुझे चिंता है तो सिर्फ सोनल की है।'

सोनल को तब चिंता हुई जब शाम को डैडी घर पर नहीं मिले। चराग के सामने बिस्कुट का पैकेट खुला हुआ था। वह एक के बाद एक बिस्कुट खा रहा था। 'चराग... यह खाना खाने का समय है बिस्कुट नहीं। डैडी देखेंगे तो नाराज होंगे। वैसे डैडी हैं कहाँ?'

'वह आज अभी तक चर्च से नहीं आए और मुझे भूख लगी है।'

चर्च जहाँ रोज कपिल संगीत का रियाज करने जाते हैं। आज कल वह एक बहुत बड़े कॉन्सर्ट की तैयारी में लगे हुए हैं। चर्च में कदम रखते ही सोनल ने पूरे वातावरण में धूल महसूस की। कपिल हारमोनियम पर कोई सरगम बजाते, उसे जल्दी से कागज पर लिखते फिर जोर से सिर हिलाते और उसी सरगम को दूसरी तरह से बजाने लगते।

थोड़ी देर तक यह क्रम चलता रहा। कपिल धीरे धीरे गाने लगे। उन्होँने स्वर लगाने की कोशिश की ही थी कि खाँसी आ गई। खाँसी को रोकने के लिए कपिल ने जोर से साँस अंदर खींची तो हवा में धूल होने के कारण और जोर से खाँसी छिड़ गई। खाँसते हुए कपिल हारमोनियम पर ही झुक गए। थोड़ी देर के बाद जब ऊँचे हुए तो सारा रूमाल खून से लाल था।

'डैडी' ...सोनल एक दम कपिल की ओर भागी। उसने आ कर डैडी को सहारा दिया। कपिल बेटी की बाँहों पर झूल गए। उन्होंने सोनल की कराहती हुई आवाज सुनी। 'ओह डैडी आई एम सॉरी।' कपिल पर बेहोशी छा गई।

जब होश आया तो सोचने लगे 'मैं यहाँ कैसे।' कपिल ने चारों ओर आँखें घुमाईं। सामने नजर उठी तो सोनल और गौतम बैठे थे। 'बस... दोस्ती का यही सिला दिया तुमने कपिल। मैं तो इसी धोखे में रहा कि तुम्हारा दोस्त हूँ। इतना कुछ अकेले ही सहते रहे और दोस्तों को कानों कान खबर नहीं।'

'यार जरा सी खाँसी ही तो है ठीक हो जाएगी।' सोनल मुँह पे हाथ रख कर अपनी रुलाई रोकती हुइ कमरे से बाहर भाग गई। 'सोनल क्या जानती है गौतम' कपिल गंभीर आवाज में बोले

'सोनल बच्ची नहीं है कपिल। उसने सब कुछ पता कर लिया है।'

कपिल कुछ सोचते हुए बोले... 'जरा अपना फोन देना गौतम। 'हैलो अंजलि। हाँ मैं ठीक हूँ। सुनो मैं सोनल को और परेशान नहीं देख सकता। चाहता हूँ तुम जितनी जल्दी हो सके आ कर बच्चों को वापिस ले जाओ।'

अचानक अंजलि को आया देख सोनल सब समझ गई... 'मैं लंदन नहीं जाऊँगी मम्मा' सोनल ने होंठ भींचते हुए कहा।

'तुम्हें जाना होगा। मैं तुम्हारी बदतमीजी और नहीं सह सकता' कपिल ने कठोरता से कहा।

'मैं जानती हूँ डैडी आप ऐसा क्यों कर रहे हैं। मैं आपको अकेला छोड़ कर कहीं नहीं जाऊँगी।'

देखो बेटा... अंजलि जो अभी तक चुपचाप सब कुछ सुन रही थी प्यार से बोली 'तुम जल्दी ही यूनिवर्सिटी जाने वाली हो। अभी तो तुम्हारी जिंदगी की शुरुआत है। थोड़ी सी नादानी से अपना कैरियर मत खराब करो। चाहो तो अगली अपनी सारी छुट्टियाँ डैडी के साथ ही बिताना। इस समय मेरे साथ चलो।'

'आप समझती क्यों नहीं हैं। डैडी को मेरी अभी जरूरत है। वह बहुत बीमार हैं मम्मा। वैसे भी मैं अठारह साल की हो चुकी हूँ। आप मेरी मर्जी के खिलाफ हमेशा की तरह मुझे फोर्स नहीं कर सकतीं।'

अंजलि अभी बेटी की बातों से सँभल भी ना पाई थी कि पीछे से चराग की आवाज आई 'मैं भी नहीं जाऊँगा सोनल को अकेला छोड़ के मम्मा।'

'तुम्हारे स्कूल और दोस्तों का क्या होगा'

'यहाँ भी बहुत से स्कूल हैं' चराग मुँह बना कर बोला।

'देख लिया... तुम छोटे भाई को भी बिगाड़ रही हो, अंजलि आँखें पोंछती हुई बोली। चलो बहुत हो गया तमाशा। अब तुम दोनों अपना सामान पैक करो जो हम रात होने से पहले घर पहुँच जाएँ।'

आओ चराग मैं तुम्हारा सामान पैक करने में मदद करती हूँ। तुम जानते हो कि मम्मा तुम्हारे बिना नहीं रह सकतीं' सोनल ने प्यार से भाई को समझाया। 'अभी तुम जाओ मैं डैडी के ठीक होते ही आ जाऊँगी।'

'देख लिया कपिल। मैं जानती थी कि तुम्हें देखते ही बेटी का खून अपना रंग दिखाएगा। ठीक है, अगर यह अपना कैरियर खराब करने पर ही तुली है तो इसकी मर्जी। अब यह अठारह साल की जो हो चुकी है। अपना भला बुरा स्वयं जानती है।'

भला बुरा तो नहीं जानती हाँ डैडी के साथ समय जरूर व्यतीत करना चाहती है।

अब समय ही तो कपिल के पास नहीं था। दिनोंदिन उनकी सेहत गिरती जा रही थी। कमजोरी के कारण उनका अधिक समय बिस्तर में ही बीतता। सोनल उन्हें समुंदर के किनारे टहलने ले जाती जहाँ वह कुछ कदम चल कर ही हाँफने लगते। शरीर हड्डियों का ढाँचा बनता जा रहा था। सोनल उन्हें एक पल के लिए भी अपनी आँखों से ओझल ना होने देती। गौतम की भी यही कोशिश रहती कि रोज अपने दोस्त से आकर मिले और सोनल का थोड़ा हाथ बँटाए।

हाथ बँटाने से जयादा सोनल को मोरल स्पोर्ट की जरूरत थी। एक गौतम अंकल ही तो थे जिनसे वह कोई बात कर सकती थी।

'अंकल मैंने डैडी को मार डाला। मेरे कारण ही आज डैडी की ऐसी हालत है।'

'नहीं बेटा ऐसा नहीं सोचते। तुम्हारे आने से तो मेरे दोस्त की जिंदगी थोड़ी बढ़ गई है। देखती नहीं कि कपिल कितना खुश है।'

'अंकल मैं डैडी के लिए कुछ ऐसा करना चाहती हूँ जिसे डैडी अपने साथ ले कर जाएँ।

'तुम कर सकती हो सोनल। कपिल हमेशा कहते हैं कि मेरी एंजल के गले में सरस्वती का वास है। तुम्हारे डैडी जिस कॉन्सर्ट की तैयारी कर रहे हैं उसे तुम पूरा करो।'

'मैं यह कैसे कर सकती हूँ अंकल। चार पाँच साल से मैंने गाना तो क्या गुनगुना कर भी नहीं देखा। और फिर डैडी इस हालत में मेरी कुछ सहायता भी तो नहीं कर सकते। अकेले यह सब मेरे से नहीं होगा अंकल कुछ और सोचिए।'

'जानती हो इससे तुम्हारे डैडी को कितनी खुशी मिलेगी। यह उनकी जिंदगी का सबसे नायाब तोहफा होगा। कॉन्सर्ट में अभी करीब दो महीने बाकी हैं। बस प्रार्थना करो कि तब तक मेरे दोस्त को कुछ ना हो।'

'उन्हें कुछ नहीं होगा अंकल' और रोते हुए सोनल गौतम के सीने से लग गई।

सीने से ही तो लगना चाहती थी वह अपने डैडी के। सोनल ने कपिल की लिखी सरगमों पर काम करना शुरू कर दिया। उसने मन में प्रतिज्ञा कर ली कि वह डैडी के सपने को पूरा करेगी।

गौतम रोज आकर कपिल के पास बैठते जो सोनल चर्च में जा कर रियाज कर सके। सारा काम चुपचाप हो रहा था। सोनल के मन में एक ही लगन थी उस कॉन्सर्ट में 'डैडी के लिए गाना और गौतम अंकल के विश्वास को जीतना।'

कॉन्सर्ट की तारीख आ गई। आज कपिल बार-बार बेहोश हो रहे थे। डॉक्टरों ने कह दिया था कि किसी भी समय जा सकते हैं। सोनल ने अंजलि को बुला लिया था।

'कपिल... यार तुम्हें थोड़ी देर रुकना होगा' गौतम ने गीली आवाज में कहा। 'आज तुम्हारी बेटी तुम्हें जिंदगी का सबसे बड़ा तोहफा देने वाली है। तुम अभी नहीं जा सकते मेरे दोस्त। 'अंजलि इसे रोको।' इसकी बच्ची ने बड़ी तकलीफ सह कर इसके लिए कुछ तैयार किया है।' अंजलि की आँखों में भी आँसू थे।

ठीक समय पर कपिल के कानों के पास रेडियो रख कर अंजलि ने चालू कर दिया।

कपिल के दोस्त गौतम की आवाज आई। 'जैसा कि यहाँ बैठे काफी लोग जानते हैं कि कपिल साहब इस समय हॉस्पिटल में हैं। इस कॉन्सर्ट की बुकिंग बहुत पहले ही हो गई थी। जिसकी तैयारी कपिल कर रहे थे कि अचानक इस जानलेवा बीमारी के बारे में उन्हें पता चला। उन्होंने अपनी इस बीमारी को छुपा कर संगीत का काम जारी रखा। उन्होंने तो हिम्मत नहीं हारी परंतु बीमारी के हाथ जरा ज्यादा ही लंबे निकले। उनके स्थान पर उनकी बेटी एंजल उनके लिखे और संगीतबद्ध किए गाने आपके सामने प्रस्तुत करेगी। वह कपिल के लिखे आखिरी गाने के साथ इस प्रोग्राम की शुरुआत करेगी। तो तालियों के साथ स्वागत करिए एंजल का।' सारा हाल तालियों से गूँज उठा।

'डैडी' ...सोनल की आवाज सुन कर कपिल की बंद होती आँखें खुल गईं। 'डैडी, आप सुन रहे हैं न। आपका आखिरी लिखा गीत आपकी एंजल का पहला होगा। यह आपकी बेटी, दुनिया के हर कोने में आपका संगीत ले जाकर सुनाएगी। आइ लव यू डैडी।'

तालियों की गूँज के साथ एंजल ने आलाप शुरू कर दिया। खामोशी छा गई। वह संगीत में डूब गई। एक-एक स्वर उसके दिल से लिकल रहा था। उसे यूँ लगा मानों डैडी सामने बैठे हारमोनियम बजा रहे हों। सोनल की आवाज में इतना दर्द और स्वरों में इतना सोज था कि सुनने वालों की पलकें भी भीग गईं। बेटी का गाना सुन कर कपिल की आँखों में थोड़ी देर के लिए चमक आ गई।

प्रोग्राम समाप्त होते ही सब लोग एंजल से मिलना चाहते थे परंतु एंजल अपने डैडी से। वह हॉस्पिटल की ओर भागी। अंजलि अपनी ओर से कपिल को बातों से उलझाने की पूरी कोशिश कर रही थी जो कपिल सो ना जाएँ। डॉक्टर का कहना था कि यदि कपिल सो गए तब शायद उठाना मुश्किल हो जाएगा। अंजलि आज सोनल का नहीं कपिल की एंजल का इंतजार कर रही थी।

अंजलि... नीरज कैसा है... एक दम कपिल की आवाज सुन कर अंजलि चौंकी। उसके चेहरे का रंग उड़ गया। जिस नीरज के कारण आपकी यह दशा हुई है, इस समय भी आपको उस की याद आ रही है। आप न जाने किस मिट्टी के बने हैं कपिल।

हाँ अंजलि... उस दिन तुम बहुत खुश दिखाई दे रही थी कपिल कमजोर आवाज में बोले।

'खुश, मैं तो उस दिन को कोसती हूँ जब मैं और नीरज बाँहों में बाँहें डाले होटल से बाहर निकल रहे थे और सामने आप खड़े थे।' आपकी वह अविश्वास से भरी हैरान आँखें, मुझे अकसर रातों को जगा जाती हैं। आप अगर मेरी बेवफाई की सजा देते तो शायद मुझे आज इतनी तकलीफ ना होती। यही मेरी सबसे बड़ी सजा है कपिल जो आपने हमें इतनी आसानी से माफ कर दिया।'

'तुम एक बहुत अच्छी माँ हो अंजलि। बस खयाल रहे कि एंजल को इस बारे में कभी पता ना चले' वह डूबती आवाज में बोले...

'आई डोंट विलीव दिस। इट वाज यू माम'। दरवाजे पर एंजल खड़ी सब सुन रही थी...


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