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कहानी

घर-बेघर
नीना पॉल


लैस्टर के रॉयल इन्फर्मरी हॉस्पिटल में जरनैल सिंह घर जाने को तैयार बैठे अपने बच्चों के आने का इंतजार कर रहे हैं। उत्सुकता चेहरे से साफ झलक रही है। वह कभी खिड़की से बाहर झाँकते तो कभी जरा सी आहट पर दरवाजे की ओर नजरें उठ जातीं। समय को जैसे ब्रेक लग गया हो। इंतजार में भी एक अपना ही मजा होता है। आँखों की चमक और होठों की मुस्कुराहट छुपाए से नहीं छुपती।

'क्या बात है जनरल बड़े खुश दिखाई दे रहे हो?'

'खुश होने की तो बात ही है पीटर। पूरे तीन हफ्तों के बाद घर जा रहा हूँ।'

'कौन आ रहा है लेने? घर जा कर हम सब को भूल तो नहीं जाओगे जनरल' (जरनैल सिंह को हॉस्पिटल में सभी जनरल कह कर बुलाते हैं) 'आप तो सूटकेस वगैरह पैक करके ऐसे लग रहे हो जैसे कोई जेल से छूट रहा हो।'

'भई हॉस्पिटल और जेल में ज्यादा फर्क ही कहाँ होता है। इनसान दो चीजों से ही तो डरता है... हस्पताल और जेल। दोनों में ही कैद मिलती है। इस कैद से कोई बगैर आज्ञा के बाहर नहीं निकल सकता।

बड़े पते की बात बोली है जनरल...

घर तो आखिर घर ही होता है न यार। बाहर कहीं कितना भी आराम क्यों न हो पर वो अपनापन नहीं मिलता। और फिर अपना बिस्तर चाहे कैसा भी हो कहीं भी चले जाओ बहुत याद आता है। पोती की भी जल्दी ही छुट्टियाँ होने वाली हैं। वह घर आते ही बस अपने दादू को ढूँढ़ने लगती है।'

'दादू भी तो दिन रात उसी के ही गुन गाते रहते हैं और फिर भाई क्यों नहीं। मूल से ज्यादा सूद जो प्यारा होता है। बेटे का फोन आया कि कब आ रहा है?'

'फोन की क्या जरूरत है घर ही तो जाना है। यह इंतजार भी बहुत बुरी चीज होती है पीटर। मालूम है कि घर जा रहा हूँ फिर भी ना जाने क्यों एक धुकधुकी सी लगी हुई है। वाहे गुरु अपनी नजर सव्वली रखे।'

'बेचैनी कैसी, खुशकिस्मत हो यार। तुम्हें इतना अच्छा प्यार करने वाला परिवार मिला है। मेरी तो एक ही बेटी है और वह भी नहीं पूछती। कैसे अपने ही माँ-बाप को बूढ़े हो जाने पर बच्चे बोझ समझ कर ओल्ड पीपल होम में फेंक देते हैं। होम वालों ने उसे मेरी बीमारी की सूचना भी भेजी थी, लेकिन एक बार भी देखने नहीं आई। कहीं कोई यह ना कह ना दे कि कुछ दिन के लिए अपने बाप को घर ले जाओ' पीटर ने आँखें पोंछते हुए कहा।

'तुमने मुझे दोस्त कहा है ना पीटर तो अब उदास होना छोड़ दो। शायद मेरे वाहेगुरु और तुम्हारे गॉड ने इसी लिए हमें आपस में मिलवाया होगा। अब हम एक दूसरे का खयाल रखेंगे। मेरी बहू बहुत अच्छी है। तुम कभी-कभी हमारे घर आ जाया करना। वह बिल्कुल भी बुरा नहीं मानेंगी।'

दोस्ती भी कितनी प्यारी चीज है। कब, कहाँ, कैसे यह समय का चक्र दो अजनबियों को एक ऐसे अटूट रिश्ते में बांध देता है कि वह अपनों से ज्यादा अपने बन जाते हैं। कभी तो यह रिश्ते यूँ ही जुड़ जाते हैं और कभी अपने खून के रिश्ते भी धोखा दे जाते हैं। किसकी नजर कब पलट जाए पता ही नहीं चलता।

पता तो जरनैल सिंह को भी तब लगा जब समय ने अचानक उनके सामने ही पलटा खाया। सुबह से ही बड़ी उत्सुकता से वह सूटकेस तैयार किए बच्चों का इंतजार करते रहे। एक ऐसा इंतजार जो कभी खत्म ना हुआ। वह कभी खिड़की के बाहर झाँकते तो कभी कमरे में टहलने लगते। पीटर उनकी बेचैनी समझ रहा था।

जरनैल सिंह ने तो सोचा भी नहीं था कि कभी उनके जीवन में भी ऐसा तूफान आएगा। यह जानते हुए कि आप अपनी अगली साँस पर भी भरोसा नहीं कर सकते कि वह आएगी कि नहीं तो फिर इनसान का क्या यकीन। वह तो कभी भी बदल सकता है। क्यों हम किसी आदत को अपने ऊपर इतना हावी होने देते हैं कि उसके छूटने पर जानलेवा तकलीफ हो।

तकलीफ की अगर पूछो तो क्या उस समय कम हुई थी जब जनरैल सिंह की पत्नी बलवंत कौर अचानक दो छोटे बच्चों के साथ उन्हें छोड़ कर स्वर्ग सिधार गई थी। कितनी खुश थी वह भारत जाने के लिए, अपने गाँव की सोंधी मिट्टी की सुगंध लेने के लिए। यूँ लग रहा था कि जैसे वह स्वयं नहीं जा रही बल्कि कोई अज्ञात शक्ति उसे अपनी ओर खींच रही हो और वह हवा में उड़ती हुई उस ओर खिंची चली जा रही थी। जैसे उसकी कोई दबी हुई इच्छा पूरी होने जा रही हो।

इच्छाएँ तो हर इनसान के दिल में होती हैं। कभी-कभी हम भूल भी जाते हैं कि हमारे दिल में कौन सी चाहत थी। जब वह अचानक सामने आ कर खड़ी हो जाती है तो हम सकपका जाते हैं। जैसे इस समय जरनैल सिंह के मन में भी घर जाने की तीव्र इच्छा उठ रही थी।

जनरैल सिंह सोचने लगे यह इच्छा क्या कहीं... नहीं, नहीं यह मुझे बुरे खयाल क्यों आ रहे हैं। कहीं मेरा हाल भी पीटर की तरह तो नहीं होने वाला। अपनी इस सोच से ही उनका दिल घबराने लगा। लगता है बुढ़ापे में मेरे दिमाग को भी जंग लगने लगा है। मेरे बच्चे तो मुझे बहुत प्यार करते हैं। हाँ बहू की जुबान थोड़ी तीखी जरूर है। वह बेचारी भी क्या करे। सारा दिन बैंक में मगज खपाई, फिर घर का काम, बच्चों की देख भाल। आखिर वह भी तो इनसान है थक जाती होगी। बस काम खत्म करके वह आते ही होंगे मुझे लेने। सोच कर जरनैल सिंह अपने दिल को तसल्ली देने लगे।

तसल्ली तो उस दिन भी दिल को देनी पड़ी थी जब मेरी आँखों के सामने मेरी बलवंत दम तोड़ रही थी। जरनैल सिंह फिर पूरानी सोचों में खो गए। मैं कितना मजबूर और बेबस था जब वह भरी जवानी में मुझे और बच्चों को बिलखता हुआ छोड़ गई थी। कितने चाव से गर्मी की छुट्टियों में हम भारत आए थे बेबे से मिलने के लिए। बहुत ज्यादा गर्मी के कारण बलवंत कौर ने बाजार से आई बर्फ का एक टुकड़ा अपने शर्बत में डाल लिया था। बस वह एक टुकड़ा बर्फ ही बलवंत की जान का दुश्मन बन गया और हैजे की मार को उसका कमजोर शरीर ना सह पाया। मौत किसी को पूछ कर थोड़े ही आती है। उसका भी समय और जगह निर्धारित होते हैं।

समय तो अपनी गति से बढ़ता जा रहा है परंतु ये बच्चे क्यों नहीं आ रहे। इंतजार करते हुए जरनैल सिंह कभी पुरानी यादों में खो जाते और कभी वर्तमान में आ जाते। ये यादें ही तो हैं जो इनसान के साथ-साथ चलती रहती हैं। एक तरफ पुरानी यादें दूसरी तरफ घर जाने की उत्सुकता। अब तो शाम भी ढलने को आ गई है। सोचा था घर जा कर बहू की हाथ की खिचड़ी खाऊँगा। घर जाने के इंतजार में जरनैल सिंह ने ठीक से खाना भी नहीं खाया था। उनका खुशी से खिला हुआ चेहरा मुर्झाने लगा।

चेहरा तो और भी उतर गया जब उस वार्ड की इन्चार्ज ने आ कर कहा - 'मिस्टर जरनैल सिंह लांबा, आज आप डिस्चार्ज होने वाले थे लेकिन आपके घर से कोई लेने नहीं आया। हम जानते हैं कि आप सुबह से ही घर जाने के लिए तैयार बैठे हैं। आई एम सोरी टू से कि परिस्थिति को देखते हुए सिर्फ आज की रात हम आपको यहाँ रुकने की इजाजत दे सकते हैं। मिस्टर पीटर एंग्रेव का इलाज भी खत्म हो चुका है। वह भी कल वापिस होम जा रहे हैं। आपको यह कमरा दूसरे मरीजों के लिए छोड़ना होगा।'

छोड़ तो जरनैल सिंह की हिम्मत रही थी उसे। उसने डूबती हुई आवाज में कहा 'कोई नहीं आया तो क्या हुआ आप मेहरबानी करके मुझे एक टैक्सी बुला दीजिए। हो सकता है वो किसी काम में फँस गए हों। मैं स्वयं घर चला जाऊँगा।'

'आप तो चले जाएँगे मगर हम ऐसा नहीं कर सकते मिस्टर लांबा। आपके दिल का बाईपास ऑपरेशन हुआ है। आपको अभी पूरी देख भाल की जरूरत है। अगर कल सुबह तक कोई लेने नहीं आया तो मजबूरन हमें सोशल सर्विसिस से किसी को बुलाना पड़ेगा जो वह आपके साथ जा कर आपके घर वालों से बात करें कि वह क्या चाहते हैं। आप अभी अकेले नहीं रह सकते।'

उधर बहू जसमिंदर पति से झगड़ रही थी, 'नहीं पापाजी अब यहाँ नहीं आ सकते प्रीतम... उस ने झुँझलाते हुए कहा, 'उनके लिए कोई नर्स रखना हमारे बस की बात नहीं है और मुझसे यह सब होगा नहीं। अच्छा यही है कि उनका तुम किसी ओल्ड पीपल होम में इंतजाम कर दो इसी में हम सब की भलाई है।'

प्रीतम सुन कर भौंचक्का रह गया। उसे पत्नी से ऐसी उम्मीद नहीं थी। वह बौखला कर बोला 'तू पागल तो नहीं हो गई जसमिंदर। ...वह मेरे पापा जी हैं और यह उनका घर है जहाँ हम सब रह रहे हैं। मैं कैसे उनको उन्हीं के घर से बाहर कर दूँ। दुनिया क्या कहेगी, कि जिस बाप ने बच्चों की खातिर भरी जवानी में पत्नी खो देने पर दूसरी शादी नहीं की, उसी बाप के बूढ़े होते ही बेटे बहू ने उसे घर से बाहर निकाल दिया।'

'हजारों लोग होम में रहते हैं प्रीतम। आप के पापा जी कोई विरले इनसान नहीं होंगे वहाँ रहने वाले। मैं फुलटाईम जोब करती हूँ, फिर बच्चों की देख भाल, खाना बनाना, घर देखना ऊपर से बीमार पापा जी की देख भाल मुझसे नहीं होगी। आखिर मैं भी तो इनसान हूँ प्रीतम। ...थक जाती हूँ... और कितना काम करवाओगे मुझसे। आप तो काम से आ खाना खा कर दोस्तों के साथ पब चले जाते हो।'

'ओह तो बात सारी मेरे पब जाने की है। मैं सोच ही रहा था कि अभी तक मेरे पब जाने की बात क्यों नहीं आई।'

'बात आपने उठाई ही है तो आप भी सुन लीजिए कि अगर आप बीमार पापा जी को इस घर में लाए तो उनकी सेवा आपको ही करनी पड़ेगी। मैं मम्मी के पास चली जाऊँगी। और हाँ इससे पहले कि सुषमा यूनिवर्सिटी से आ जाए हमें बाबूजी को होम में भेज देना होगा नहीं तो वह हंगामा खड़ा कर देगी' जसमिंदर जरा गुस्से से बोली।

हस्पताल में बिस्तर पर करवटें बदलते हुए गुस्से के स्थान पर जरनैल सिंह को स्वयं पर दया आने लगी। वह रात भर अपनी जिंदगी के बारे में सोचते रहे। एक पल को भी उनकी आँख नहीं लगी। उनके स्वाभिमान को ठेस लगी थी। इससे ज्यादा कोई क्या अपमानित हो सकता है। जिन बच्चों को इतनी तकलीफें सह कर इस काबिल बनाया... जिस अपने परिवार पर उन्हें मान था। आज उनके लिए ही वह बोझ बन कर रह गए। बच्चों ने घर से बेघर करके किसी को भी मुँह दिखाने के काबिल नहीं छोड़ा। जैसे कि वह इस इंतजार में थे कि यह बुड्ढा घर से जाए और वह उसके मुँह पर दरवाजा बंद कर दें।

नर्स किसी अजनबी औरत के साथ दरवाजे से अंदर आते हुए बोली 'जरनैल यह सोशल वर्कर जैकी हैं। आप इनके साथ जाइए। यह आपके घर वालों के साथ बात करेंगी कि आखिर वह चाहते क्या हैं...?'

'नहीं नर्स, मैं घर नहीं जाऊँगा। इनसे कहिए मेरा इंतजाम किसी ओल्ड पीपल होम में कर दें। आज बच्चों ने यह दिन भी दिखा दिया।'

जनरैल सोचने लगे इस दिन का इशारा बेबे ने भी बातों बातों में किया था। लेकिन मैं ही बच्चों के प्यार में इतना अंधा था कि नहीं समझ पाया। उस दिन बेबे ने कितने प्यार से कहा था 'पुतर जनरैल जाने वाली तो चली गई। तेरी अभी भरी जवानी है बेटा। बहुत हो गया इंग्लैंड का चक्कर। पुतर अपणे पिंड दे विच वी बथेरी रोटी रोजी ए...। अब तू फिर से शादी कर के यहीं मेरी नजरों के सामने रह। बच्चे भी अभी बहुत छोटे हैं, कैसे रह पाएँगे माँ के बिना।'

'नहीं बेबे। मुझे बच्चों के भविष्य का खयाल है। मैं यहाँ रह कर इन की वैसी देख भाल नहीं कर पाऊँगा जैसी बलवंत चाहती थी।'

'ठीक है पुतर जाना ही है तो फिर शादी करके ज...'

'बेबे... आप ऐसा सोच भी कैसे सकती हैं? बात को बीच में ही काट कर जरनैल सिंह जल्दी से बोले। अभी तो मेरी बलवंत की चिता की आग भी ठंडी नहीं हुई और आप... मुझे बहुत दुख हुआ आपके मुँह से यह बात सुन कर।'

'देख बेटा यह भावुक होने का समय नहीं है। मैं जानती हूँ तू बलवंत की जगह किसी और को नहीं दे सकता। तुम्हारे दोनों बच्चे अभी छोटे हैं। प्रीतम बेचारा तो सिर्फ तीन साल का है और पम्मी भी कहाँ बड़ी है सात साल की बच्ची। समय बहुत जालिम चीज है बेटा। बच्चों से ज्यादा मुझे तेरा फिक्र है। अकेला कैसे कर पाएगा यह सब कुछ।'

'जिस वाहे गुरु ने इस इम्तिहान में डाला है वही पार उतरने का रास्ता भी दिखा देगा। वैसे बेबे तू क्यों नहीं चल पड़ती मेरे साथ।'

'नहीं पुतर यह बात पहले भी हो चुकी है। शराब के नशे में तेरा जीजा जब भी आपे से बाहर हो जाता है तो तेरी बहन बच्चों को लेकर यहीं मेरे पास आ जाती है। मैं ही यहाँ नहीं रही तो वह बेचारी कहाँ जाएगी?'

'यह जीजा जी की शराब पीने की आदत अभी छूटी नहीं।'

'कुछ आदतें जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं।'

'बेबे कल सवेरे दी मेरी फ्लाइट ऐ।'

'जा पुतर रब राखा। बस एक ही बात का डर है कि जिन बच्चों के लिए तू इतनी बड़ी कुरबानी देने जा रहा है वो बुढ़ापे में तेरा सहारा बनें। 'बुढ़ापा कले कटणा बड़ा मुश्किल ऐ पुतर।'

'आपके आशीर्वाद और उस वाहेगुरु की मेहर से सब ठीक होगा' जरनैल सिंह की आवाज भर आई। 'बेबे बलवंत नू तेरे कोल छड चलयाँ ओदा खयाल रखीं।' बेबे आँखें पोंछती हुई दूसरे कमरे में चली गई।

आँखें तो जरनैल सिंह की भी भर आईं थीं बेबे की बात सोचते हुए। बड़े लोगों ने दुनिया देखी होती है तभी तो वह दूर की सोचते हैं। जरनैल सिंह ने हाथ से आँसुओं को हटाते हुए मन ही मन एक इरादा किया।

दर्द सहने के बाद जो इरादे और स्वयं से वादे किए जाते हैं वह बहुत पक्के होते हैं क्यों कि उनमें कुछ दुख, कुछ स्वाभिमान, कुछ गहरी चोटों के निशान होते हैं। घाव तो समय के साथ भर जाएँगे परंतु उनके निशानों की टीस रिसती रहती है जो दर्द से भी ज्यादा घायल कर जाती है।

एक घायल इनसान कैसे हँसी में अपना दर्द छुपा लेता है यह जरनैल सिंह ने साबित करके दिखा दिया। कभी-कभी बिना सोचे कही गई बात सच हो जाती है।

'आखिर मेरी कही बात सच हो ही गई ना पीटर। शायद तुम्हारा गॉड और मेरा वाहेगुरु हमारी दोस्ती निभाने की बातें सुन रहे थे। यार तुम्हें तो अपने घर नहीं बुला पाया लेकिन देखो न मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे घर चल रहा हूँ' जरनैल सिंह ने कहकहा लगा कर कहा।

पीटर बड़े ध्यान से जरनैल सिंह की ओर देख कर बोले 'जनरल... कम ऑन यंग मैन मेरे कंधे पर सिर रखो और बह जाने दो इस सहलाब को। नहीं तो अंदर ही अंदर मेरी तरह डूब के रह जाओगे।'

एक पल को जरनैल की आँखों में दो मोती चमके दूसरे ही क्षण पलकें झपक कर उन्होंने उन्हें उड़ा दिया और हँस कर बोले 'मर्द कभी रोते नहीं पीटर। अब तो हम दोनों एक दूसरे का परिवार हैं।'

अपने परिवार के बारे में इनसान कितने मान के साथ बात करता है। एक-एक तिनका जोड़ कर आशियाना बना उसे अरमानों से सजाया जाता है। एक छोटे से घर के अंदर कैसे पूरा परिवार समा जाता है। घर से ज्यादा सुरक्षित स्थान पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलता। एक छोटा बच्चा जब बाहर खेल रहा होता है तो अचानक कुत्ते के भौंकने की आवाज सुन कर या तेज वाहन को देख कर कैसे घर के अंदर भागता है। जिसे खून पसीने से सींचा हो, जरूरत के समय जब उसी के किवाड़ बंद हो जाएँ तो इनसान कितना असहाय हो जाता है। 'मैं स्वयं को असहाय नहीं होने दूँगा' यह जरनैल सिंह का अपने से से वादा था।

वादा तो बेटे प्रीतम सिंह ने भी किया था कि 'पापा जी अगले साल माँ को गए हुए चालीस साल हो जाएँगे। समय तो जैसे पंख लगा कर उड़ रहा हो। कैसे इतना समय बीत गया पता ही नहीं चला।'

'पुतर मेरे दिल से पूछ कि बलवंत के बिना एक-एक पल कैसे बीतता है। मैं तो केवल तुम दोनों की खातिर जिंदा हूँ नहीं तो बलवंत को इतने लंबे सफर पर अकेला कभी ना भेजता...।'

'ऐसा मत कहिए पापा जी। आप तो हमारे लिए माँ और पापा दोनों ही हैं। याद है काम पर जाने से पहले कैसे आप मुझे और पम्मी को स्कूल के लिए तैयार कर के अपने हाथ से नाश्ता बना कर खिलाते थे।'

'तू भी तो कितना बड़ा हो जाने पर भी रात को बिस्तर में सू-सू कर दिया करता था' जरनैल सिंह ने हँस कर बेटे को छेड़ा। 'जी कुछ कुछ मुझे भी याद है कि आधी रात को आप मेरे कपड़े और बिस्तर बदल दिया करते थे। मैं तो दोस्तों से यही कहा करता था कि मेरे पापा सुपरमैन हैं उन्हें रात को भी नींद नहीं आती।'

'नींद तो पुतर तेरी माँ का साथ देने चली गई थी। फिर किसी को दिया हुआ वादा भी तो निभाना था। तुम चालीस साल की बात करते हो बेटे मुझे तो अभी भी यही महसूस होता है कि बलवंत मेरी बाँहों में दम तोड़ रही है और मैं मजबूरी से उसे जाते हुए देख रहा हूँ।'

पापा जी क्यों ना अगले साल हम सब मिल कर भारत चलें माँ को श्रद्धांजलि देने के लिए... प्रीतम ने पापा को उदास देख कर कहा। श्रद्धांजलि माँ को तो बाद में मिलती पहले जिंदा बाप को ही बेटे ने उसके घर से बाहर धक्का दे कर दे दी। अच्छा है प्रीतम की माँ यह दिन देखने से पहले ही चली गई थी नहीं तो बेचारी बहू-बेटे की इस शर्मनाक हरकत पर जीते जी ही मर चुकी होती।

जिसे मरना चाहिए था वह तो इतना बड़ा अपमान सह कर भी जिंदा खड़ा है। सच जरनैल सिंहा तेरी बड़ी सख्त जान है...। बलवंत के जाने के बाद तो बच्चों के बहाने जिंदा था मगर इतनी बड़ी बेइज्जती के बाद तो किसी अच्छे भले मानस का भी हार्टफेल हो सकता है और तू दिल का मरीज हो कर भी खड़ा है।

अपने नए घर के छोटे से कमरे की खिड़की के पास खड़ा जरनैल सिंह बाहर एक बाप बेटे को खेलते हुए देख कर सोचने लगे कि कौन जाने बड़ा हो कर यह बेटा अपने बाप के साथ कैसा सलूक करेगा। अच्छा है जो इनसान इस दिन के लिए पहले से ही तैयार रहे।

'खाना तैयार है जरनैल सिंह' पीटर ने कमरे का दरवाजा खटखटा कर कहा।

बाहर निकलने से पहले जरनैल सिंह सारी उदासी कमरे में ही छोड़ गए। यही तो इनकी विशेषता है की दिल का दर्द कभी चेहरे पर नहीं आने देते। जरनैल सिंह के आने से इस ओल्ड पीपल होम का माहोल ही जैसे बदल गया। अब शाम को कोई भी अकेले अपने कमरों में नहीं बल्कि हाल में इकट्ठे बैठ कर कोई ताश, कोई डोमिनोस और कोई चैस खेलता हुआ दिखाई देने लगा। होम में कुछ भाग्यशाली ऐसे भी थे जिनके रिश्तेदार हर सप्ताह उनसे मिलने आते थे और कुछ बेचारे, अपनों का इंतजार करते रहते जो कभी खत्म ना होता ।

यही इंतजार तो अब उसी होम में रहने वाली एलिजबेथ भी करने लगी थी अपने भांजे का... जिसने मतलब पूरा हो जाने के बाद कभी मुड़ कर भी नहीं देखा। उसे उदास देख कर जरनैल सिंह ने समझाया। 'हम उनका इंतजार क्यों करें एलिजबेथ जिन्हें हमारी परवाह ही नहीं।'

परवाह तो मेरी वह बहुत करता था जनरल जब तक मैंने उन कागजात पर साईन नहीं किया था। मेरी प्रोपर्टी तो वैसे भी उसी के पास जानी थी। उसके सिवा मेरा और कोई है भी तो नहीं।

तुम्हारा कोई क्यों नहीं एलिजबेथ। हम हैं ना सब एक दूसरे के लिए। जब वह हमें नहीं पूछते तो हम उनके लिए आँसू क्यों बहाएँ। हमें भी उन्हें कुछ सबक तो सिखाना ही चाहिए।

सबक तो सबसे पहले जरनैल ने सिखाया अपने बच्चों को जब...

अरे यह हमारे घर के बाहर सेल का बोर्ड किसने लगाया, जसमिंदर काम से घर आई तो हैरान रह गई। वह प्रीतम के आने का इंतजार ना कर सकी और बोर्ड पर से नंबर लेकर फोन घुमा दिया।

'जी मैं 24 मिडल एवन्यू से बोल रही हूँ। शायद आपका आदमी गलती से हमारे घर के बाहर सेल का बोर्ड लगा गया है।'

'नहीं मैम, कोई गलती नहीं हुई, मिस्टर लांबा की परमिशन से ही बोर्ड लगाया गया है'

'लेकिन मिस्टर लांबा ने मुझसे तो कुछ नहीं कहा। फिर कुछ सोच कर बोली, 'कौन से मिस्टर लांबा?'

'जी मिस्टर जरनैल सिंह लांबा मैम'

'जरनैल' ...जसमिंदर के हाथ से फोन छूट गया। उसके हाथ ही नहीं पूरा शरीर गुस्से से काँप रहा था। 'पापा जी की यह हिम्मत। ...हमसे पूछे बिना वह हमारे घर को सेल पर कैसे लगा सकते हैं। आने दो प्रीतम को। आखिर उसके बाप ने अपनी औकात दिखा ही दी। ...कितनी बार प्रीतम से कहा था कि घर के कागजात पर साईन करवा लो पापा जी से। कोई मेरी सुने तब ना। अब भुगतो। यह बोर्ड हटाने के लिए मजबूरन बुड्ढे को घर लाने का ढोंग करना ही पड़ेगा।'

ढोंग जेसन ने भी किए थे अपनी आंटी एलिजबेथ के सामने। हर सप्ताह कभी फूल तो कभी चॉकलेट ले कर आता था वह अपनी आंटी के लिए। फिर काम निकलते ही सूरत तक देखने नहीं आया।

सूरत तो तब देखता ना यदि उसका दिल साफ होता। आज का स्वार्थी इनसान सिवाय अपने किसी और का सोचता ही कहाँ है। क्या पैसा ही सब कुछ है। इनसान की भावनाओं उसके प्यार की कोई कद्र नहीं। किसी के साथ बुरा करने वाला यह क्यों भूल जाता है कि कल को उसके साथ भी ऐसा हो सकता है।

हुआ तो प्रीतम के साथ जब उसने घर के बाहर सेल का बोर्ड देखा। एक तो वह वैसे ही शर्मिंदगी से डूबा जा रहा था ऊपर से जसमिंदर के ताने।

'जसमिंदर बाहर यह बोर्ड... भई कुछ काम करने से पहले मुझ से पूछ तो लिया करो' घर के अंदर घुसते हुए प्रीतम की आवाज थोड़ी ऊँची हो गई।

'यह करतूत आपके सीधे-साधे पापा जी की है। अरे हमारे बारे में ना सही अपने छोटे-छोटे पोते पोतियों के बारे में तो कुछ सोचा होता। बड़ा प्यार जताते थे वैसे तो। आज ही चल कर बात करते हैं उनसे।'

उधर जनरैल सिंह की बेटी पम्मी कैनेडा से बार-बार फोन कर रही थी। यह प्रीतम बात क्यों नहीं करवाता पापा जी से मेरी। तीन बार फोन कर चुकी हूँ। हमेशा ही कोई ना कोई बहाना बना कर टाल देता है। कैनेडा में बैठी पम्मी सोच ही रही थी कि अचानक फोन की घंटी बज उठी।

यह अजनबी नंबर ब्रिटेन से... हैलो

'पम्मी पुतर।' 'पापाजी' ...उधर से खुशी से भरी आवाज आई। 'मैं कितनी बार आपको फोन कर चुकी हूँ आप मिलते ही नहीं। प्रीतम भी कुछ ठीक से जवाब नहीं देता। आप ठीक तो हैं ना पापा जी?'

'मैं बिल्कुल ठीक हूँ मेरे बच्चे, अभी इस बुड्ढे को कुछ नहीं होता। बहुत सख्त जान है। यह बताओ कि जमाई साहब और बच्चे कैसे हैं?'

'सब ठीक हैं। मुझे तो यूँ लग रहा था कि इतनी दूर कैनेडा भेज कर आप अपनी बेटी को भूल ही गए हैं।'

'भूलते तो बच्चे हैं अपना फर्ज बेटा। हम बुड्ढों की आँखें तो उनकी राहों में हमेशा बिछी रहती हैं।'

'पापा जी आप ठीक तो हैं न। आपसे मिलने का बहुत मन कर रहा है। बच्चों को अभी छुट्टियाँ भी तो नहीं हैं और अकेले छोड़ कर आ नहीं सकती।'

'वाहे गुरु ने चाहा तो जल्दी मिलेंगे पुतर। तेरा जब भी बात करने का मन करे इस नंबर पर फोन कर लिया करना। चल रखता हूँ। रब राखा। अपना खयाल रखना।'

खयाल तो अपना स्वयं ही रखना पड़ता है। बूढे हो जाओ तो बच्चे भी नजरें घुमा लेते हैं। माँ-बाप के साथ दो पल बात तो क्या उनका सामना भी उन्हें गँवारा नहीं होता। सबके सामने अपमान करते हुए भी नहीं झिझकते। बहाना ढूँढ़ते हैं उनसे पिंड छुड़ाने का।

'अब हमें कोई बहाना बनाना ही पड़ेगा पापा जी से बात करने के लिए' प्रीतम जसमिंदर कुछ सोचते हुए बोली।

'हम किस मुँह से जाएँगे उनके पास जसमिंदर। जिन्हें हॉस्पिटल के बैड पर छोड़ कर दोबारा पलट कर नहीं देखा। मेरी भी मत मारी गई थी जो तुम्हारी बातों में आ गया।'

'बात मानते तो आज यह दिन देखने को ना मिलता। पापा जी ने तो खुद कितनी बार आपसे कहा था कि मेरे जीते जी मकान अपने नाम कर लो कहीं बाद में मुश्किल न हो लेकिन नहीं, आपको तो भावुक बनना था। तो लो अब गिड़गिड़ाओ उनके आगे।'

'शरम कर जसमिंदर वह...'

'हाँ हाँ ठीक है अब समय बर्बाद मत करो। चलो आपसे तो कुछ होगा नहीं। मुझे ही रास्ते भर सोचना पड़ेगा कि उनसे कैसे बात करनी है।'

ओह तो तुम लोग मुझसे बात करने आए हो या...?' जनरैल सिंह बहू बेटे को देख कुर्सी से उठते हुए बोले।

'पापा जी हमें माफ कर दीजिए' जसमिंदर ने लपक कर ससुर के पैर पकड़ लिए और रोने लगी। 'हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई है। सारा कसूर हमारा भी नहीं। मैं बीमार थी और ये बच्चों को सँभालने में लगे हुए थे। बस इसी लिए आपको लेने नहीं आ पाए। आप भी तो टैक्सी ले कर आ सकते थे न। बहुत हो गया पापा जी। मैं आपको अब यहाँ एक पल भी नहीं रहने दूँगी चलिए अपने घर।'

'अपना घर... कौन सा घर? ...किसका घर? ...जिसका दरवाजा तुमने मेरे मुँह पर दे मारा। प्रीतम, अपनी घर वाली को बोल यह मगरमच्छ के आँसू सँभाल के रखे कहीं और काम आएँगे। मगरमच्छ के आँसू जितने ठंडे होते हैं दाँत उतने ही तेज। मैंने दोनों ही देख लिए हैं। पुत्तर, आँसू वो जो इस बूढ़े की आँखों से बहे थे। दिल का खून कतरा-कतरा टपका था इन पलकों से जब तुमने मुझे अपने ही घर से बेघर किया था। अरे मूर्खों... घर दा बुजुर्ग ते दरवाजे दा जंद्रा होंदा ए। जब अपने हाथों से ही उस ताले को तोड़ दिया जाता है न तो बाहर वालों को अंदर आने से कोई नहीं रोक सकता। घर की इज्जत एक बार जब चारदिवारी के बाहर चली जाती है तो लोगों की जुबान कैंची और नजरें तीर बन जाती हैं।'

'तीर तो इस सीने ने खाए हैं और वह भी अपनों से। तुम नौजवान बुजुर्गों की कीमत क्या जानों जो घर का जंद्रा ही नहीं होता बल्कि तुम जब भी घर आओ बाँहें खोले मुस्कुराता हुआ कोई तुम्हारा स्वागत करता हुआ मिलता है। कभी पूछो उनके दिल से जिन्हें सूने ठंडे घर का ताला स्वयं खोलना पड़ता है। प्रीतम तुम्हे मैं दोष भी क्या दूँ। तुम तो शुरू से ही कमजोर रहे हो। छोटे से छोटा फैसला करने के लिए भी तुम दूसरों की शक्ल देखते रहते हो।'

'दूसरों के सहारे ऐश करना छोड़ो। जब रोज पकी पकाई थाली सामने आती है तो उसमें बहुत से नुक्स दिखाई देने लगते हैं। जिस आशियाने को तिनका-तिनका इकट्ठा कर के बनाया और सजाया जाता है उसके लुटने का गम...' जरनैल सिंह की आवाज भर आई। 'अब इन सूनी आँखों और खाली हाथों में कुछ भी बाकी नहीं बचा।' जाओ बच्चो दूसरों की खिड़की में झाँकना छोड़ो और अपना आशियाना स्वयं बनाओ। वाहे गुरु से यही अरदास है कि तुम्हें कभी यह दिन ना दिखाए। अरे नाशुकरो... किसके लिए यह सब ढोंग रचाए जा रहे हैं। इस कागज के टुकड़े के लिए। यह तो वैसे भी तुम्हारा ही था। यह लो... जरनैल सिंह ने घर के कागज दूर फेंकते हुए कहा... ये लो उठाओ इस फसाद की जड़ को और इससे पहले कि इस बुड्ढे के मुँह से कोई अपशब्द निकल जाए दूर हो जाओ मेरी नजरों के सामने से। आज मैं अपने आप को लावारिस घोषित करता हूँ।'

प्रीतम सिंह रोते हुए आगे बढ़ा जरनैल सिंह के गले लगने के लिए परंतु उन्होंने बेटे को हाथ के इशारे से वहीं रोक दिया और अपने कमरे में जा कर अंदर से दरवाजा बंद कर दिया...।


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