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यात्रावृत्त

किन्नौर यात्रा
कृष्णनाथ


रेस्‍ट हाउस , कानम,

26 जून , 1995

किसी को याद नहीं। मुझे भी यह लिखने तक याद नहीं कि आज मेरा जन्‍मदिन है। कोई नहीं, न माता, न पिता, न भाई, न स्‍त्री, न पुत्र, न सखा, न सखी जो याद रखे। ऐसे में 61 साल पूरे करना क्‍या? न करना क्‍या? मेरे लिए जन्‍मदिन का क्‍या मतलब? मृत्‍यु के दिन का है, सो जाने कब है? 'मौत आती है पर नहीं आती।'

मृत्‍यु मेरी इच्‍छा पर है या अनिच्‍छा पर? इच्‍छा-मृत्‍यु हो तो दु:ख नहीं, रोना-कलपना नहीं। न पछताना। न किए का और न-न किए का। स्‍मृति सहित जैसे विमान पर जाना है। और अनिच्‍छा से मौत हो, तो दु:ख है रोना-कलपना है। पछतावा है किए का, न-किए का। और अंध तस लोक में घिसटते हुए जाना है।

अब इच्‍छा-मृत्‍यु हो तो भी इच्‍छा कब होगी? क्‍या यह भी अपने हाथ में है? या इच्‍छा तो जब उसकी इच्‍छा हो तो होगी, न हो तो न होगी। मैं थोड़े ही इच्‍छा करता हूँ। इच्‍छा मुझे होती है। वही मुझे पकड़ लेती है। मैं उसे नहीं पकड़ सकता। न इच्‍छा करता हूँ। और जब मैं इच्‍छा करता होता तो न भी कर सकता था। लेकिन मैं तो न करता हूँ। और जब मैं इच्‍छा करता होता तो न भी कर सकता था। लेकिन मैं तो न इच्‍छा करता हूँ।, न इच्‍छा करने से अपने को रोक सकता हूँ। वैसे इच्‍छा-जयी होते होंगे, जो इच्‍छा को रोक सकते हों, मैं उनमें से नहीं। मैं तो डरता हूँ। कलम की दुकान में जाने से, किताब की दुकान में जाने से, कपड़े की दुकान में जाने से... सब दूर डरता हूँ। क्‍योंकि मैं नहीं खरीदता, कलम मुझसे खरीदवा लेती है। इस तरह इतनी कलम जमा हो गई हैं जो मैं मृत्‍यु-पर्यंत इस्‍तेमाल नहीं कर सकता। जैसे स्त्रियाँ साड़ी खरीदने से या भेंट पाने से अपने को रोक नहीं सकती।

इच्‍छा-तो-इच्‍छा, चिंता के साथ भी यही है। लोक कहते हैं कि चिंता मत कीजिए। अब बताइए, मैं चिंता करता होता तो चिंता तो चिंता न करता। कौन चिंता करना चाहता है? किसे शौक है चिंता करने का? क्‍या कुत्‍ते ने काटा है? लेकिन चिंता तो मुझे पकड़ लेती है। इसीलिए न तो मैं चिंता करना चाहता हूँ, न मैं चिंता करने से अपने को रोक सकता हूँ।

ऐसे ही इच्‍छा-मृत्‍यु है। न तो मैं मृत्‍यु की इच्‍छा करता हूँ, न इच्‍छा करने से अपने को रोक सकता हूँ। हाँ, उसका स्‍मरण बार-बार करता हूँ। मेरी एक हितू हैं जो मुझे बरजरती हैं। यह नहीं सोचना कि मैं मर जाऊँगा। यह मौत को न्‍यौता देना है। जब वह आएगी तो आएगी। उसे बुलाना क्‍या? फिर भी, सुबह-शाम लगता है कि मैं मर जाऊँगा। यह तो अनिच्‍छा मृत्‍यु में होता है। वह बार-बार मरता है। सो भी नहीं। सिर्फ मरण की अनुस्‍मृति मरणानुस्‍मृति रहती है। इस तरह हर क्षण जीता, हर क्षण मरता हूँ। उदय-व्‍यय, उदय-व्‍यय, उदय-व्‍यय होता रहता है, जैसे साँस का आना-जाना। और प्राण का स्‍पंदन, रक्‍त-वीर्य, मन, जीवन का प्रवाह चलता जाता है।

ऐसे ही चलते-चलते 61 साल बीते। उनके बिना जीते बहुत दिन बीते। अब?

रेस्‍ट हाउस अंग्रेजों का बनाया हुआ है। कानम गाँव से दूर है। गाँव के कुत्‍तों के भौंकने की आवाज यहाँ नहीं सुनाई पड़ती। घरों की खटर-पटर तो और भी नहीं। दूर एक फाटक है उससे रास्‍ता है। एक प्रशस्‍त बरामदा है। दो 'सूट' है। एक सोने का कमरा, फायर प्‍लेस, चिमनी, बाथरूम, ड्रेसिंग रूम। अपने में पूरी इकाई। मिट्टी की जोड़ाई। ऊँची छत, पहले छत थी मिट्टी की, तन भी मिट्टी का। इसलिए इसमें स्‍वास्ति है किंतु छत जगह, बे जगह बैठ गई। तो अब 'शीट' की कर दी गई। उस पर टापर-टुपुर बरफ पड़ती है। फिर पिघल जाती है। या साफ करनी होती है। पता नहीं। बरफ पड़ते कानम नहीं आया। सुना बड़ी भारी बरफ पड़ती है इसलिए खेती अच्‍छी है फल-फूल भी। लेकिन यह तो ऋतु नहीं। इसलिए कुछ भी नहीं। चुली भी नहीं। सेब में छोटे-छोटे दाने आ रहे हैं। जैसे वक्ष पर घुडी। अभी उनके सिरे पर कहीं फूल लगे हुए हैं, कहीं झड़ गए हैं।

बरामदे के बाहर खुली जगह। हलकी घास की परत। फिर बाड़ और ढलान। सामने पहाड़। हाल-हाल की बरफ से नहाए हुए। जो टापरी में बारिश थी, वही यहाँ बरफ। उस पहाड़ के पीछे सांग्‍ला। उसके छोर पर छितकुल। उसके पार हरसिल, गंगोत्री, उत्‍तरकाशी। उस पार से उसे देखा है। इस पार छिकुल के आसपास से। वहाँ तक पहुँचा नहीं। कोई भी काम आधा ही करता हूँ। पूरा करने की इच्‍छा है।

कानम गाँव में बिजली है। शायद हिमाचल प्रदेश में हर गाँव में है। इससे बड़ा भारी फर्क पड़ा है। लेकिन बिजली की पूर्ति बराबर नहीं है। गाँव में हाईस्‍कूल है। गाँव पंचायत है। सड़क टूटी हुई है। बन रही है। पिछले 10 साल से बन रही है। इधर उसमें एक विघ्‍न आ गया। ऐसी सूचना पी.डब्‍ल्‍यू.डी. के एक अफसर जो साथ के सूट में ठहरे हुए हैं देते हैं। कहते हैं, बीच में एक पत्‍थर आ गया। आधा घंटा, एक घंटा का काम था। रूक गया। इस बीच पास के गाँव के लोग आ गए। कहते हैं पहले गाँव के लिए रास्‍ता बनाओ तो हम सड़क बनाने देंगे। अन्‍यथा नहीं। अब पत्‍थर को 'ब्‍लास्‍ट' करना है। लेकिन उसके पहले गाँव के लोगों से बात कर रास्‍ता निकालना है।

गोनपा में दूसरा पक्ष सुनने को मिला। कहते हैं कि जिसकी जमीन है उसे एतराज है। ढाँग काटेंगे तो उसका खेत गिर जाएगा। सीढ़ीदार खेत है। नीचे काट कर सड़क बनाएँगे तो ऊपर का खेत सड़क पर आ जाएगा। इसलिए पहले उसकी रोकथाम करें तो सड़क ले जाएँ। अन्‍यथा नहीं।

जो हो। जैसे अभी मुहूर्त नहीं। हर चीज का मुहूर्त होता है। साइत होती है। सिर्फ विवाह की ही नहीं, विनाश की भी, या उसके लिए कोई और मुहूर्त नहीं। विवाह का ही मुहूर्त है, विनाश तो उसके गर्भ में समाया हुआ है।

विश्राम गृह यथा नाम तथा गुण है। यहाँ विश्राम है। सड़क नहीं। बिजली नहीं। सारी फिटिंग, गीजर वगैरह सब है। सिर्फ करेंट नहीं। जैसे देह हो, प्राण न हो। रेस्‍ट हाउस पी.डब्‍ल्‍यू.डी. का है। बिजली बिजली विभाग को देनी है। या नहीं देनी। सिर्फ दो खंभे गाड़कर 'कनेक्‍शन' दिया जा सकता है। लेकिन कोई जोर-दबाव नहीं है। पैरवी नहीं है। जनतंत्र में तो इसके बिना गाड़ी चलती नहीं। इसलिए बिजली नहीं।

सड़क नहीं है इसलिए उस पार गाड़ी छोड़कर अफसर इस पार आता नहीं। गाँव में विश्राम गृह है, लेकिन गाँव का नहीं है। उसमें गाँव का कोई ठहरता नहीं। क्‍यों ठहरे? इसलिए बिजली है या नहीं, यह किसी की चिंता का विषय नहीं।

मेरी चिंता का भी नहीं। बल्कि मुझे तो राहत है। कोई अफसर आता नहीं, इसलिए विश्राम गृह में कोई खलल नहीं। सूट है। उसका परमिट लेकर कोई आ जाए तो खाली करना पड़ सकता है। लेकिन ऐसे में कौन आता है?

फिर, कमरे में 'फायर प्‍लेस' के ऊपर वह लुप्‍त होती प्रजाति का अवशेष पीतल का लैम्‍प है। (यह मेरी ही तरह अपने दिन गिन रहा है) चौकीदार उसे शाम को साफ कर, बिस्‍तर बनाकर चला जाता है। बरामदे में शाम का उजास रहते, 7-30 बजे तक 'डिनर' हो जाता है। नीचे से गाड़ी तो आती नहीं। इसलिए कोई सब्‍जी नहीं। चना है। वह दाल-सब्‍जी दोनों है और यथेच्‍छ रोटी है। सबके ऊपर प्रेम है। इस प्रेम का सारा संसार भूखा है। वह है तो सब कुछ है, वह नहीं है तो सब कुछ होते हुए कुछ नहीं है। इसलिए जो भी है प्रेम से, सत्‍कार से ग्रहण कर थोड़ी देर टहलता हूँ। महाराष्‍ट्र भाषा में इसे 'शत पावली' कहते हैं। सौ कदम चलता हूँ। और बरामदे में बैठ आकाश, पर्वत, घाटी और मन में उतरती हुई रात का अनुभव करता हूँ तो कमरे में चला आता हूँ। कमरे में लैम्‍प का प्रकाश भर जाता है। सूरज डूब चुका है। उसका काम यह लैम्‍प कर रहा है।

रवि बाबू की कविता की पंक्ति का स्‍मरण हो जाता है डूबते सूर्य ने पूछा कि मैं तो अब अस्‍त हो रहा हूँ। मेरे बाद मेरा काम कौन करेगा? एक छोटे-से मिट्टी के दीये ने कहा कि श्रीमन, यथाशक्ति यह काम मैं करूँगा। सूरज डूब गया और मिट्टी के दीये की रोशनी से घर-आँगन भर गया।

लैम्‍प की रोशनी के साथ कमरे में गर्मी है। लेकिन मिट्टी के तेल की गंध है। गुण-द्रव्‍य का साथ है। लैम्‍प है तो प्रकाश और ताप और गंध है। अब जो है, सो है।


 


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