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यात्रावृत्त

कितना अकेला आकाश
नरेश मेहता


ओहरिड, इंदौर या भोपाल जैसा ही छोटा हवाई अड्डा है। छोटे हवाई-अड्डों पर लोग ऐन बाहर फील्‍ड तक आ जाते है, जबकि बड़े हवाई-अड्डों पर ऐसा नहीं हुआ करता। स्‍वागत करने वालों ने सारे कवियों को एक-एक फूलछड़ी थमाई। परिचय के समय लोगों के नाम सुनकर भला कैसे याद रह सकते हैं? सर्वथा ऐसे नाम, जिनका उच्‍चारण भी आप नहीं कर पाते है। खैर, स्‍त्रूगा के‍ लिए बस तैयार थी। ओहरिड से स्‍त्रूगा मुश्किल से 12/13 किलोमीटर दूर होगा और देखते-देखते, झील किनारे की सड़क से होते हुए हम लोग करीब 11 बजे स्‍त्रूगा पहुँचे, जहाँ 'ड्रिम' होटल में हमारा प्रबंध था। इस छोटे से कस्‍बे में यह खासा बड़ा होटल था। मैं नहीं समझता कि भारत में इस प्रकार के कस्‍बे में इतना बड़ा तथा खासी सुविधा वाला होटल संभव है। मुझे बेलग्रेड से दुबई की अपनी वापसी यात्रा का 'कनफरमेशन' करवाना था। मीरशे (स्‍थानीय सहयोगी) ने बताया था कि उसका प्रबंध स्‍त्रूगा में हो जाएगा क्‍योंकि JAT वालों ने आए हुए कवियों की सुविधा के लिए अपना काउंटर होटल में ही खोला हुआ है और वही हुआ। काउंटर वाले ने कहा कि वह कल तक कनफरमेशन दिला देगा। विदेश में होटल में अपना पासपोर्ट जमा करना हेाता है, तभी कमरा मिलता है। मेरे आग्रह पर मुझे चौथी मंजिल पर झील की और पड़ने वाला कमरा नंबर 405 मिला और तबीयत खुश हो गई। इस बीच एक युगोस्‍लाविया के सज्‍जन भी मिले। जितना पूरा नाम याद नहीं रहा। जो कि स्‍कोपिया में आधुनिक साहित्‍य के प्राध्‍यापक हैं, से थोड़ी आत्‍मीयता हो गई जिसके कारण थोड़ी सुविधा हुई। उन्‍होंने ही मुझे 50,000 दीनार के पाँच नोट संस्‍था से दिलवाए। स्‍थानीय खर्चे के लिए दीनार की यह रकम दी गई थी। काफी काम आई। पर मजेदार बात यह है कि यहाँ एक कप चाय के लिए 30,000 दीनार देने पड़ते हैं, अतः यह रकम वैसे तो कुछ भी नहीं थी। पहली बार 'दीनार' मुद्रा देखी, जिसका इतिहास में नाम सुना था।

होटल से श्री बिल के साथ बाहर निकला। वस्‍तुतः पश्चिम के पास एक सौंदर्य दृष्टि है, जो उनके स्‍वयं के रहने, नगरों की बसाहट, मकानों के ढंग से स्‍पष्‍ट होती है। चूँकि यूरोप, एशिया की अपेक्षा ठंडा भूखंड है इसलिए इन्‍हें आँगन-दालान जैसी चीज नहीं चाहिए होती है। ये लोग धूप आदि का सेवन पार्कों में या जलाशय के किनारे कर लेते हैं अतः इनके मकानों का प्रकार बंद डिब्‍बों जैसा ही होता है। जो हो, ये मकान लगते सुंदर हैं। स्‍त्रूगा, ओखरी झील के किनारे बसी एक साधारण-सी ही बस्‍ती है। झील से एक नदी निकलती है। शायद इसका नाम 'ट्रिम' है। इसके दोनों किनारों पर काफी अच्‍छे मकान बने हुए हैं। आर-पार जाने के लिए काफी पुल हैं, जो कि आम तौर पर मजबूत लकड़ी के हैं। सारा दृश्‍य बड़ा ही मनोरम है। 'मेन' सड़क वाले पुल पर खड़े होकर बाईं ओर झील से बल खाती आती नदी और दाहिने हाथ अपना नदी-पथ बनाती ट्रिम को थोड़ी देर देखते खड़े रहे। उसके बाद पुल पार कर दाहिने हाथ मुड़े। इसी ओर वह 'होम ऑफ पोएट्री' का भवन है, जिसके लॉन में उन कवियों की मूर्तियाँ हैं जिनकी स्‍मृति में यह आयोजन होता है। थोड़ी दूर चलकर हम बाजार में पहुँचे। पत्‍थर की ईंटों के रास्‍ते के दोनों और घर जैसी शक्‍ल-सूरत और भाव वाली दुकानें। आपको लगता ही नहीं कि आप बाजार में हैं। कोई शोर-शराबा, चिल्‍लपों कुछ भी नहीं। बिना किसी अफरा-तफरी और भीड़-भाड़ के लोग सहज भाव से चीजें खरीदते आ-जा रहे थे। दुकानों के बाहर बहुत ही करीने से कुर्सी-टेबलों के चारों ओर बीयर या शराब पीते स्‍त्री-पुरुष। बस, मुश्किल भाषा और संप्रेषण की होती है। असल में बाजार घूमने से ज्यादा मुझे कपड़े धोने का साबुन लेना था। बड़ा ही आश्‍चर्य हुआ कि कहीं भी वह नहीं मिला। हाँ, पाउडर जरूर मिल सकता था पर मुझे टिकिया की जरूरत थी। स्‍त्रूगा का बाजार था ही कितना बड़ा। पूरा घूम आए। बल्कि कहना चाहिए कि सिरे पर सड़क से नीचे उतरकर खुदरा मार्केट भी हो लिए जो कि मंडी ही कहा जाएगा। साबुन तो नहीं मिला पर युगोस्‍लावीय जनजीवन को थोड़ा पास से देख सका। यहाँ फल बेचते लोग भी साधारण गरीब हैं, पर सामान रखने का ढंग तथा उनके बोल-चाल में खासा देसीपन भी है और स्‍वतंत्रता का बोध भी। अखि़रकार कई स्‍टोर्सों के चक्‍कर लगाकर, घूमकर देख आने के बाद भी जब साबुन नहीं मिला तो फिर एक नहाने का साबुन लिया। पता नहीं क्‍यों इस साबुन की गंध थोड़ी अप्रिय ही लगी। यहाँ की हवा तक में एक खास गंध थी, जिसे कुछ सुखद नहीं कहा जा सकता। या तो झील की गंध थी, जिसमें मछली की गंध शामिल थी। पर साथ ही मांस और मदिरा के आधिक्‍य की बू भी थी। और तब होटल पहुँचकर शाम तक के लिए बिल से विदा ली। अब शाम को ही 'होम ऑफ पोएट्री' में इस आयोजन की शुरुआत होने वाली थी।

वैसे मेरा अंदाज ही सही था कि यूरोप के इस सिरे वाले भूखंड में और वह भी अगस्‍त में जाड़ा नहीं होगा। और सचमुच ही कोई खास जाड़ा नहीं था। दिन थोड़े गरमा जाते हैं लेकिन रातें अवश्‍य ही सुखद और थोड़ी सिमट जाने वाली होती हैं। वैसे भी यहाँ की जलवायु भूमध्‍यसागरीय है। यूरोप के उत्‍तरी भाग जैसी जलवायु कम से कम इन दिनों तो नहीं ही थी। हाँ, बाल्‍कन पहाड़ियों के कारण वर्षा अच्‍छी-खासी होती है इसलिए चारों ओर की पहाड़ियाँ और मैदानी भाग सभी पेड़ों और वनस्‍पतियों से लदे हैं। समुद्री हवा दिन-रात अपनी उपस्थिति की प्रतीति कराती रहती है।

शाम को होटल की टैरेस पर एक काकटेल पार्टी थी। उस बड़ी-सी टेबल, टेबलें और कुर्सियों का सुर्ख लाल रंग देखकर पहली बार लगा कि आप किसी साम्‍यवादी देश के होटल में हैं। पर एक बात निर्विवाद रूप से कही जा सकती है कि युगोस्‍लाविया को देखकर साम्‍यवादी शासन की जकड़बंदी का कहीं पता नहीं चलता। शायद इसका कारण यही हो कि शुरू से ही युगोस्‍लाविया दूसरे साम्‍यवादी देशों की तरह नहीं रहा। वैसे यहाँ आज भी मार्शल टीटो के प्रति लोगों में सम्‍मान का भाव है। थोड़ी देर में उस प्रशस्‍त टैरेस पर कवि, लोग और प्रेस फोटोग्राफर्स जमा हो गए। इसी में पहली बार आस्‍ट्रेलिया के कवि थामस शेपकॉट को देखा जिन्‍हें इस वर्ष के स्‍वर्णपदक से सम्‍मानित किया जाना था। कुछ-कुछ हेमिंग्‍वे जैसे लगते हैं। औपचारिक 'हलो-हलो' के अलावा भी बातें जरूर हुईं। अच्‍छे ही स्‍वभाव के लगे। किसी प्रकार की कोई बनावट जैसी चीज नहीं लगी। उनका वह संग्रह भी दिन में प्राप्‍त हुआ था जो इस अवसर पर प्रकाशित किया गया था। कुछ कविताएँ भी देख गया था। अच्‍छी कविताएँ हैं। लोग अपना-अपना झुंड बनाए हुए बतिया रहे थे। मुझ जैसे अकेले कुछ ही कवि होंगे। मुझे बताया गया कि अँग्रेजी से ज्यादा फ्रेंच और स्‍पेनिश भाषा व्‍यवहृत होती है।

इसके बाद बिल के साथ 'होम ऑफ पोएट्री' के भवन पहुँचे। भवन के सामने का मैदान कुर्सियों पर जमा लोगों से भरा पड़ा था। इस कस्‍बे के लिए यह आयोजन कितना महत्वपूर्ण था, यह भीड़ देखकर ही पता चल रहा था। कई देशों के झंडे लहरा रहे थे। जरूर ही भारत का भी झंडा रहा होगा पर मुझे नहीं दिखाई दिया। मैदान के सामने एक ऊँचे मंच पर, जो कि भवन का स्‍थायी प्‍लेटफार्म है, एक बड़े से बोर्ड पर अँग्रेजी, फ्रेंच, स्‍पेनिश, रूसी आदि लिपियों में 'पोएट्री' लिखा था। शायद अरबी लिपि में भी था पर बेचारी देवनागरी या एशिया की किसी लिपि में नहीं था। सबसे पहले आठ-दस लोगों के दल ने बिगुल-वादन किया। उसके बाद बड़ी-सी ज्‍योति जलाई गई, जैसी कि ओलंपिक मशाल होती है - काव्‍य ज्‍योति। दो-एक कविताएँ, पता नहीं किस भाषा में, पढ़ी गईं और दो लड़कियों ने मेसेडोनियन में उसके अनुवाद सुनाए और इस प्रकार आयोजन का श्रीगणेश हुआ। इसके बाद ही बड़े से हाल में काव्‍य-पाठ का आयोजन था। आधे कवियों, मतलब करीब 40 कवियों को, आज काव्‍य-पाठ करना था और बाकी के कवियों को अंतिम समापन दिवस पर। मुझसे दिन में ही पूछा गया था कि क्‍या मैं आज काव्‍य-पाठ करना चाहूँगा? पर मैं बहुत ज्यादा थका था इसलिए आज के लिए मैंने अस्‍वीकार कर दिया। अतः इस समय मैं बिल के साथ हाल में मात्र दर्शक बनकर बैठा था। मेरा खयाल है कि हाल में दो हजार दर्शक जरूर होंगे। सरकारी बड़े कर्मचारी भी आए हुए थे। सारे प्रशासकों का अपना अलग ही रुतबा होता है। खासकर वो सेना के हों तो बात ही अलग होती है। इस सारे आयोजन के सभी दिनों जो महाशय उद्घोषक थे, उनकी आवाज बहुत ही षड्ज वाली थी और बोलने का ढंग भी बहुत सलीके का था। हालाँकि भाषा तो नहीं समझ पाता था पर लगता था कि आयोजनों का उद्घोषक ऐसा ही होना चाहिए। बड़े से मंच पर सारे कवि बैठाए गए। मंच के पार्श्‍व में दोनों ओर अनुवाद पाठकर्ता (कर्त्री) थे। बाईं ओर सिरे पर एक बड़ा-सा पियानो था। पहले एक सुंदर महिला ने पियानो-वादन प्रस्‍तुत किया। उसके बाद दो-एक साधारण भाषण हुए और तब काव्‍य-पाठ आरंभ हुआ। पहली बार लगा कि इस प्रकार के अंतरराष्‍ट्रीय काव्‍य-पाठ का लाभ न भी सही, तो भी प्रयोजन क्‍या है? ठीक है स्‍थानीय लोगों को अपनी भाषा में अनुवाद मिल जाता है परंतु हम जैसे बाहर से आए लोगों का क्‍या हो? मूल भाषा भी आप नहीं जान रहे होते हैं और न ही अनुवाद की भाषा से आप परिचित हैं। तब भला तीन-चार घंटे एक ध्‍वनियाँ सुनते हुए कोई कितना बैठ सकता है? थोड़ी देर में जब ऊब होने लगी तो बिल के साथ बाहर आ गया। हाल के बाहर के लाउंज में किताबों की प्रदर्शनी लगी हुई थी। मेरी भी पाँच-छह किताबें प्रदर्शित थीं। वैसे भी बहुत थकान थी ही। नींद भी बकाया थी। होटल पहुँचकर बार में बिल को बीयर पिलवाई और मैंने चाय ली और फिर बिल से विदा लेकर कमरे में पहुँचा। दिल्‍ली के बाद दो रातों की नींद में खो गया।

आज सवेरे सारे अतिथि बस से ओहरिड ले जाए जा रहे थे। वहाँ संत सेफिया के प्राचीन चर्च में भी आयोजन का एक हिस्‍सा आयोजित किया जाता है। वस्‍तुतः स्‍त्रूगा और ओहरिड के बीच मुश्किल से पद्रंह किलोमीटर की दूरी होगी। वस्‍तुतः अभी तक किसी से भी कोई विशेष आत्‍मीयता नहीं हुई थी इसलिए ओहरिड जाने का कोई उत्‍साह नहीं था। पर फिर भी तैयार होकर जब नीचे हॉल में पहुँचा तो सभी लोग बस में बैठने की तैयारी में थे। मैं भी एक ओर जाकर सीढ़ियों के नीचे पोर्च में खड़ा होकर देखने लगा। मैं सोच रहा था कि हुआ तो चला जाऊँगा वर्ना यहीं होटल में रुका रहूँगा दोनों बसें भरने लगी थीं। सब अपने में या अपनों में तल्‍लीन थे। तभी मैंने देखा कि वासंती रंग की पश्चिमी भूषा में एक महिला मेरी ओर बढ़ी आ रही है। इस चेहरे को मैं चाहूँ तो रोमानियन, हंगेरियन चपटे चेहरों में से एक मान सकता था। वस्‍तुतः ऐसे चेहरे डेन्‍यूब के किनारे के मध्‍य यूरोपीय देशों में ही पाए जाते हैं। युगोस्‍लावियन चेहरे ज्यादा लंबे और थोड़ा यूनानीपन लिए होते हैं जबकि इस महिला का चेहरा चपटा और गोल था। वह मेरे पास आई। वैसे मैंने इस क्षण के पूर्व तक नहीं देखा था। गत दो दिनों में यदि देखा भी होगा तो ध्‍यान नहीं गया होगा। आते ही अँग्रेजी में पूछा कि क्‍या मैं ओहरिड नहीं चल रहा हूँ? मैंने अस्‍वीकार तो नहीं किया पर मेरे स्‍वर और उत्‍तर में आश्‍वस्ति जैसा कुछ न देखकर वह बोली - कम ऑन!! और मैं कुछ कहूँ इसके पूर्व ही वह मेरे हाथ में हाथ डालकर बस की ओर बढ़ी। अपने संस्‍कारों के कारण मुझे बड़ी उलझन हो रही थी कि एक नितांत अपरिचित महिला हाथ में हाथ डालकर आपको लिए जा रही है, जैसे वह ऐसा किसी निकट के संबंध के कारण कर रही है। वस्‍तुतः वह मुझे लिए-दिए ही बस में चढ़ी और अपने पास की सीट पर बैठाकर निश्चित भाव से देखते बोली कि पहले दिन उसने मुझे जिस भारतीय भूषा में देखा था, वह उसे बहुत प्रिय है और मुझे यह पश्चिमी भूषा के स्‍थान पर वही पहनना चाहिए था। और इस सारे वार्तालाप में उसका नाटकीय मुद्रा में मेरे परिधान का हवा में हिलना, मेरे बोलने में जो संकोच है उस पर हँसते हुए टीका-टिप्‍पणी - वह इतने खुलेपन और मुक्‍त स्‍वर में कह रही थी कि मैं अवाक् था। आगे-पीछे जो लोग बैठे थे वे शायद स्‍थानीय ही अधिक थे और यह महिला उनसे उनकी ही भाषा में जो कह रही थी और उसके बाद वे सब स्‍त्री-पुरुष जिस भाव से मुझे देखते हुए हँसते-मुस्‍कराते बोल रहे थे उससे मैं समझ गया कि इस सारी बात का वि‍षय मैं ही हूँ। ओहरिड पहुँचने तक वह बता गई कि उसे भारत में बहुत रूचि है, खासकर पुनर्जन्‍म के सिंद्धात के बारे में। वह मुझे बराबर कोंचे जा रही थी और मैं नहीं समझ पा रहा था कि इस अनजान महिला को इस आधारभूत तत्‍वज्ञान के बारे में कैसे क्‍या बताऊँ। उसके सारे व्‍यवहार और वार्तालाप का ढंग यह था कि उसे मुझसे व्‍यवहार और बातें करने में न कोई संकोच है और न ही वह अजनबीपन महसूस करती है। जो हो उसके प्रति मैं शेष प्रवास में आभारी ही बना रहा क्‍योंकि उस दिन के बाद से वह निरंतर छाया की भाँति मेरे चारों ओर बनी रही।

ओहरिड के संत सेफिया चर्च के साथ यहाँ के लोगों का लगाव कितना गहरा और गंभीर है यह बिना देखे नहीं समझा जा सकता। शायद यहाँ के लोग इस चर्च में गए बिना अपना कोई भी महत्‍वपूर्ण कार्य संपन्‍न नहीं करते होंगे वर्ना इतनी रात में चर्च के उस छोटे से हॉल में इतने लोगों का आयोजन करने का अर्थ नहीं समझ पा रहा था। आज सवेरे जब आया था तब देखा था कि हॉल में, मतलब चर्च में हर चीज खस्‍ता हाल है पर बीच में रखा एक पियानो अलग से चमचमाता रखा था। उस समय तो ध्‍यान नहीं गया कि जब यहाँ 'सर्विस' नहीं होती तो पियानो क्‍यों है? पर उसका अर्थ शाम वाले कार्यक्रम में समझ में आया। चर्च में ढेर सारा प्रकाश कर दिया गया था। साथ ही कुर्सियाँ भी थीं, परंतु लोग कहीं ज्यादा थे इसलिए खड़े-बैठे लोगों से हाल और दीर्घाएँ तथा ऊपर के गवाक्ष और निकले बारजे भी भरे हुए थे। एक प्रकार से जिस कवि को इस वर्ष स्‍वर्णमाल दी जानी थी, उसे प्रभु के सामने प्रस्‍तुत करने की प्रथा थी। फोटोग्राफरों टेलीविजन वाले अपने काम में लगे हुए थे। यहाँ के लोग आवश्‍यकता से अधिक एक शब्‍द ज्यादा नहीं बोलते। आयोजक, संयोजक या संस्‍था के अध्‍यक्ष मुश्किल से दो-दो मिनट से अधिक कभी नहीं बोले होंगे। हाँ, यहाँ जो कवि के विषय में प्रशस्ति-पत्र पढ़ा गया वही शायद थोड़ा लंबा रहा होगा वर्ना स्‍वयं कवि श्री टामस शेपकॉट ने बहुत ही संक्षिप्‍त रूप में आभार प्रकट किया और 'साइतोंस' नामक अपनी एक कविता पढ़ी। इसके बाद संगीत का कार्यक्रम था। इसी के लिए पियानो सवेरे ही यहाँ पहुँचा दिया गया था। पियानो वादन एक सुषमित, सुंदर महिला कर रही थी तथा पश्चिमी गायकों वाली विशिष्‍ट काली भूषा में गायक ने चार-पाँच गीत गाए, जिन्‍हें लोगों ने बहुत पसंद किया। गायक निश्चित ही इस क्षेत्र का प्रसिद्ध गायक रहा होगा। गायन समाप्‍त होने पर लोगों ने, विशेषकर स्त्रियों ने उसकी अभ्‍यर्थना चूम कर की। चूँकि हम सब पहुँचे थे उस समय हॉल भर चुका था परंतु बुदिमका ने किसी तरह दूसरी पंक्ति में मेरे लिए जगह प्राप्‍त कर ही ली। कुल मिलाकर यह कार्यक्रम अच्‍छा रहा। यदि यही कार्यक्रम हमारे यहाँ होता तो इसमें कम से कम दो घंटे और जोड़ दिए जाते। खैर लौटते में रास्‍ते भर सोचता रहा कि प्राचीन धुँधले पड़े भित्ति-चित्रों की साक्षी थे, मेहराबों के बूढ़ेपन के नीचे भला यह आयोजन भव्‍य कैसे लग सकता था परंतु कहीं कुछ ऐसा संबोधन अवश्‍य था जो आपके मन को गहरे स्‍पर्श करता था। लगता था जैसे आप विगत इतिहास के द्वार पर दस्‍तक दे रहे हैं और भित्ति चित्रों के पादरी स्‍थापना, प्रसंग और कथाएँ जैसे विवश आपको देखते मौन हैं, जैसे कह रहे हों कि हम विगत की उस सीमा पर पहुँच गए हैं जहाँ से हम केवल आभास देते हैं, अभिव्‍यक्‍त तो नहीं ही हो सकते । मंच के कोने में तुर्कियों द्वारा बनाई गई वह इबादत की सीढ़ी न केवल अप्रासंगिक ही लग रही थी बल्कि अपने आकाओं की धर्मांधता के लिए ऐसी लज्जित लग रही थी जैसे कह रही हो कि यदि मुझे यहाँ से उखाड़ दें तो वह अपने पैरों चलकर तुर्किस्‍तान पहुँच जाएगी। पूरे रास्‍ते बुदिमका स्‍तोवानोव सवेरे भी साथ थी और इस समय भी। आज उसने टुकड़ों-टुकड़ों में अपने जीवन के बारे में काफी कुछ संकेत दिए। शायद ही कोई मनुष्‍य होगा जो अपने पैरों के नीचे दर्द दबाकर न खड़ा होगा। बुदिमका की कहानी भी कोई अपवाद नहीं थी। उसकी कहानी तो बाद में सुनी थी लेकिन उसे देखते ही उसे मैंने जो रूमानिया-हंगरी का समझा था, वह एकदम सही निकला। उसकी माँ रूमानिया की थी और पिता सरवरियन। उसका पहला पति युगोस्‍लाविया का था जिससे उसे एक पुत्र भी हुआ परंतु पति और पुत्र दोनों किसी कार-दुर्घटना में एक साथ चल बसे थे। इस घटना ने बुदिमका को पूरी तरह झकझोर दिया था। उन्‍हीं दिनों वह फिसल पड़ी थी जिसके कारण उसके एक पैर की हड्डी टूट गई थी और महीनों अस्‍पताल में पड़ी रही। पैर की हड्डी वैसे तो जुड़ गई थी पर फिर भी हल्‍का-सा लँगड़ा और दर्द जीवन भर के लिए मिला, परंतु अपने मौजी स्‍वभाव के कारण अपने सारे दर्द, अभाव भूली ही नहीं रहती थी बल्कि पता भी नहीं चलने देती थी। उसे असल में भारत से बड़ा लगाव था। जिन दिनों वह अस्‍पताल में थी, उन्‍हीं दिनों अस्‍पताल में एक मिस्री मुसलमान युवक से परिचय हुआ और यह परिचय बाद में परिणय में परिणत हुआ, जिससे उसे एक संतान संभवतः लड़की हुई। अपनी इस बेटी को बेलग्रेड के पास अपने भाई-भाभी के परिवार में बड़े होने के लिए छोड़े हुए है और स्‍वयं बेलग्रेड में एक प्रकार से फ्रीलांसिंग करती है। वह पत्रों के लिए लिखने से लेकर प्रदर्शन संबंधी काम भी करती है। हालाँकि उसने बताया तो नहीं परंतु आर्थिक दृष्टि से शायद बहुत साधारण स्थिति में ही है लेकिन दो-एक बार मैंने उदारतापूर्वक खर्च करते देखा। उसने देखा कि मेरे पास युगोस्‍लाविया करेंसी बहुत ही कम है तो वह अपने पास से देने के लिए तत्‍पर हुई थी। धर्म से वह शेष युगोस्‍लावियों की तरह ही आर्थोडॉक्‍स चर्च की मानने वाली थी, जबकि उसका यह दूसरा पति मुसलमान था। वह काहिरा में इंजीनियर था। कभी-कभी उसके पास हो आती है परंतु ऐसा लगता है कि बुदिमका ने अपना रास्‍ता, अपना संघर्ष स्‍वतंत्र ही रखा है। इसका जो भी कारण हो। यह एक यूरोपीय चरित्र और स्‍वभाव भी हो सकता है अथवा पति-पत्‍नी के बीच की कोई बात भी हो सकती है। लेकिन कुल मिलाकर, बुदिमका बहुत ही जीवट की महिला लगी। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि बुदिमका के कारण यहाँ का मेरा अजनबीपन एक प्रकार से दूर हुआ। अँग्रेजी वह जानती थी पर कामचलाऊ ही। वैसे यहाँ मैंने किसी को भी बहुत अच्‍छी अँग्रेजी जानते नहीं देखा। हाँ, फ्रेंच और स्‍पेनी जानने वाले तो थोड़े दिखे भी। लेकिन अँग्रेजी न कुछ के बराबर ही।

ओहरिड से स्‍त्रूगा पहुँचते बारह से भी ज्यादा हो गए थे। बुदिमका होटल तक आई। मेरा ख्‍़याल था कि वह भी यहाँ किसी कमरे में ठहरी होगी। पर नहीं वह इतनी रात में 'गुड नाइट' कहकर सुनसान सड़क पर अकेली जाती दिखी, तो मुझे थोड़ी असुविधा हुई। मैं उससे यह भी नहीं पूछ सका कि वह इतनी रात में क्‍या अकेली ही जाएगी? और कितनी दूर? सड़क की बत्तियों में उसकी अपनी ही छाया पैरों से बँधी आगे-पीछे होती हुई उसे कहीं ले जा रही थी।

स्‍त्रूगा के ड्रिम होटल में चौथे माले पर मेरा कमरा 405 नंबर का था और 406 में क्‍यूबा के कवि लोपेज लेमुस ठहरे हुए थे। लेमुस को देखते ही निस्‍संकोच उन्‍हें भारतीय मूल का कहा जा सकता था। मुझे उनमें कुछ-कुछ श्री मुकुंद लाठ की झलक दिखाई दी। बहुत ही शालीन व्‍यक्ति थे। हम दोनों एक-दूसरे को काफी पसंद भी करते थे पर कठिनाई भाषा की थी। उन्‍हें केवल फ्रेंच और स्‍पेनिश ही आती थी जबकि मुझे केवल अँग्रेजी। कई बार मैंने मार्क किया कि वह बातें करने के लिए कितने उत्‍सुक हैं परंतु दुभाषियों की निहायत कमी के कारण वह फ्रेंच में कुछ शब्‍द कहते तो उन्‍हें आशा होती थी कि इतनी फ्रेंच तो मैं समझ ही लूँगा और बदले में जब मैं अँग्रेजी बोलता तो मेरा मुँह ताकने लगते। फिर भी हम प्रायः साथ रहे और बिना भाषा के भी अपनी आत्‍मीयता ज्ञापित कर ही लेते थे। मैं जब समापन-समारोह के लिए धोती-कुरते और शाल में तैयार होकर निकला तो वह भी अपना कमरा बंद कर रहे थे। पता नहीं फ्रेंच में उन्‍होंने क्‍या कहा, पर स्‍वर, हाथ का फैलाना और विस्‍तृत आँखों में जिस तरह वह मेरी ओर आए, उससे यह तो लग गया कि उन्‍हें मेरी यह भारतीय-भूषा बहुत भाई है। कमरे से लिफ्ट तक की लंबी गैलरी में लेमुस मुझे बारंबार देखे जा रहे थे और बहुत खुश हो रहे थे। मुझे दूसरे दिन की वे महिलाएँ याद आ गईं जिन्‍होंने मुझे सफारी-सूट के स्‍थान पर धोती-कुरता पहनवाकर ही माना था। पहले दिन के समारोह में भी मैं धोती-कुरते में ही गया था और मैंने मार्क किया कि सारे लोगों का ध्‍यान मेरी इस भूषा की ओर ही था। चूँकि उस दिन मैं बिल के साथ बीच ही में उठ आया था, इसलिए कोई नहीं मिला वर्ना समारोह समाप्ति के बाद निश्चित ही प्रशंसा में लोगों ने मेरा कचूमर ही बना दिया होता। पश्चिम में जिस उन्‍मुक्‍त भाव से प्रशंसा की जाती है वह स्‍पृहणीय है। हम भारतीय प्रशंसा के समय भी बड़े हिसाबी-किताबीपन से ही व्‍यवहार करते हैं।

वैसे तो काव्‍य-पाठ का यह आयोजन अच्‍छा रहा। अधिकांश लोगों ने अवसरोचित गरिमा का ध्‍यान रखते हुए ही पढ़ा था। हाँ, कुछ कवियों ने अवश्‍य थोड़ी विषमता उत्‍पन्‍न की। विशेषकर मलेशिया के उस दूसरे कवि ने, जिसका नाम मैं भूल गया, लगभग हास्‍यास्‍पद स्थिति उत्‍पन्‍न कर दी। अंतर्राष्‍ट्रीय काव्‍य-पाठ में भी 'हूटिंग' हो सकती है, इसे इन्‍हीं श्रीमान ने मूर्त किया। इसी प्रकार कुवैत के अरबी कवि याकूब यूसुफ अल सुबई ने भी अपने मुस्लिम होने का अहसास 'अस्‍सलाम वालेकुम' से लेकर अजान के ढंग पर काव्‍य-पाठ के अंदाज से किया। नहीं जानता उनका कट्टरपन कविता में था या नहीं। कारण जो भी रहा हो पर जैसा स्‍वागत, उत्‍साहपूर्ण, मैंने उस दिन अपने संदर्भ में पाया, वैसा तो शायद भारत में भी कभी नहीं मिला होगा। काव्‍य-पाठ के पूर्व तालियों से लोगों ने मुझे उत्‍साहित किया। जब उन्‍होंने अनुवाद सुन लिया तो मुझे लगा कि नदी के दोनों किनारों पर दूर तथा देर तक तालियाँ बजती रहीं और लोग 'इंडिया' 'इंडिया' का घोष करते रहे। निश्चित ही यह अभ्‍यर्थना मुझसे अधिक 'इंडिया' को लेकर थी। मैं तो निमित्‍त भर था। उस क्षण मंच पर खड़े मुझे पहली बार लगा कि अपने देश का प्रतिनिधित्‍व करना कितना बड़ा आदर होता है तथा वह भी उत्‍तरदायित्‍वपूर्ण। और नहीं जानता कि मैंने इस दायित्‍व को अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में कितना-कुछ निभाया या नहीं, पर मैंने अपनी ओर से चेष्‍टा अवश्‍य की। मैं उस क्षण मंच पर खड़ा संपूर्ण भारत था जिसमें हिमशिखरों से लेकर रामेश्‍वर-कन्‍याकुमारी तक का विस्‍तार, उर्ध्‍वता, पवित्रता, प्राचीनता का प्रतीक बिन्‍दु था और मेरी भाषा तथा कविता रामायण-महाभारत की अपौरुषेयता, कालिदास की सांस्‍कृतिक रम्‍यता, रवींद्र की अलभ्‍य भू माधुरी को व्‍यक्‍त करती उस रात वहाँ के निरभ्र आकाश के नीचे, झील की ओर से आती माधवी हवाओं की साक्षियों तथा महान ग्रीक परंपरा के वाहक इन में सेडोनियन स्‍त्री-पुरूषों की उपस्थिति में विनम्र खड़ी थी। तालियों की अपार गड़गड़ाहट वस्‍तुतः मंदार के श्‍वेत पुष्‍पों की माला और सुगंध बनकर मुझे आप्‍लावित किए थी। उस दिन मुझे अपना कवि होना सार्थक लगा। स्‍वर्णमाल वाला अंतिम कार्यक्रम जब समाप्‍त हो गया और मैं मंच से नीचे उतरा, मुझे भीड़ ने घेर लिया और अपने पश्चिमी पारंपरिक ढंग से चुंबनों से, आलिंगनों से लाद दिया। इस प्रगाढ़ आत्‍मीयता में मेरे सारे भारतीय संस्‍कार, व्‍यवहार की मान्‍यताएँ सब ढह गईं। काव्‍य और काव्‍य का संबोधन क्‍या सच ही इतना चमत्‍कारिक होता है? शायद हम भारतीय न अपनी अभिव्‍यक्ति, न आचरण, किसी में भी तो सहज या उन्‍मुक्‍त नहीं होते। एक ऐसा मिथ्‍यात्‍व, नैतिकता, परंपरा आदि के नाम पर ओढ़े रहते हैं कि हमारा वास्‍तविक स्‍वत्‍व, अभिव्‍यक्ति सभी कुछ इन आडंबरों, मान्‍यताओं में दबा रहता है। हमने पश्चिम की उन्‍मुक्‍तता को यदि कुछ ग्रहण भी किया है तो यह इतना उच्‍छृंखल स्‍वरूप है कि उससे जुगुप्‍सा होती है। हमने अपनी आधुनिकता, अपनी उन्‍मुक्‍तता का कोई स्‍वरूप परिकल्पित नहीं किया फलतः यदि हम पारंपरिक भारतीय पद्धति को अप्रासंगिक समझते हैं तो हमारा आधुनिक स्‍वरूप, व्‍यवहार और आचरण भी तो हमें अपने सांस्‍कृतिक परिवेश से समरस नहीं बनाता। हम अपने आधुनिक की भूमिका में कहीं अधिक विदूषक लगते हैं बनिस्‍बत पारंपरिक स्‍वरूप के। और इसकी प्रतीति भारत में उतनी नहीं होती जितनी की पश्चिम परिवेश में उभरकर आती है।

दिन में दो-एक बार झील किनारे घूमा हूँ। झील की भाषा, माधवी, सबको अपने भीतर अनुभव भी किया है। धूप में लगता, हिल्‍लोलता झील का जल जब तेज सपाटे भरती हवाओं के साथ दूर से लपकता आता दिखता है तो आपको स्‍पेनी साँड़ का गुर्राता हुआ लपकना याद आने लगता है। पर जब किनारे पहुँचकर वही हुलसता जल, झील नहीं उलाँघता बल्कि ठंडी हवाओं का चीनांशुक बनकर आपको घेर लेता है तब वह स्‍पर्श, स्‍वाद की माधुरी, स्‍पर्श की कमनीयता और संभोग की सी तृप्ति देकर देखते-देखते आपके पीछे की ओर खड़ी बालकन पहाड़ियों पर किसी ग्रीक वीर की लपकता चढ़ रहा होता है। लगता है ये बालकन पहाड़ियाँ ही कभी ग्रीक सेनाएँ थीं जो झील के इस माया जादू को लाँघ न पाईं और जड़ बन गईं। एक अजीब सम्‍मोहन था सारे दृश्‍य में। उस दिन बेलग्रेड से ओहरिड आते समय विमान से मेघ-सागर की तलहटी में, नीचे, सुदूर में प्रक‍ंपित लहरियों वाला जल झाँका तो पता चला कि यह ओखरी झील है, जो संसार की, प्राचीनतम झीलों में से एक है तथा उतनी ही प्रशस्‍त एवं गहरी।

समापन-समारोह के बाद कुछ लोगों के साथ हम लोग झील की ओर निकल आए। झील का जल जहाँ नदी बनता है वहाँ तक दोनों ओर पुश्‍त जैसी पक्‍की दीवार बनी है। लोग संध्‍या समय प्रायः इसी दीवार पर टहलते होते हैं। यह दीवार जहाँ घुमाव लेती है वहाँ की गोलाई में एक बुर्जी़पन है, जहाँ बैठना, जहाज के डेक पर बैठना जैसा लगता है। मुझे शायद समय का अंदाज नहीं था। इसी बुर्जी़ पर हम तीन-चार लोग बैठे रहे। बुदिमका उन लोगों से अपनी भाषा में न जाने क्‍या-क्‍या बातें करती रही। कभी-कभी उसके हावभाव से लगता कि मुझे लेकर भी थोड़ी चर्चा हो जाती है। ऐसी चर्चा के समय बुदिमका जब उन्‍हें जवाब दे रही होती उस वक्त उसमें एक अजीब प्रकार का काव्‍यात्‍म, मुस्‍कराता, आवेलित लगता। मैं सोचता कि यह किस अभिभावकीय अंदाज में मेरे बारे में या मेरी ओर से बातें कर रही है, संभव है जवाब भी दे रही हो। वह जिस प्रकार बातें कर रही होती उसमें लगता कि जैसे मैं उसे अनायास सड़क किनारे मिल गया हूँ और मुझे देखकर लोग उससे तरह-तरह की जिज्ञासाएँ कर रहे हैं और वह निःसंकोच जवाब भी दे लेती है।

दिन में दूर की बस्तियों का आपको कोई अहसास नहीं हो पात परंतु अंधकार के बढ़ने के साथ ही दूरियों में बत्तियों की पंक्तियाँ, झालरें खिल उठती हैं। खासकर तब और भी रोमांचक लगता है जब कोई बताए कि वो जो दूरी पर धुँधली रोशनी का झुंड है न, वह अलबानिया है। क्षितिज की रेख प्रकाश की रेखा में लिखा सर्वथा दूसरा देश, जहाँ वैसे जाने के लिए वीसा की आवश्‍यकता होती है पर आप वीसा की बाधा को पार करके कम-से-कम उस प्रदेश के प्रकाश को तो देख ही रहे होते हैं। बालकन पहाड़ियों पर भी लिखे प्रकाश का यह सिलसिला रात को कितना मोहक बना देता है न? गहराती रात के साथ झील भी औंघाती लग रही थी। शायद इस निस्‍तब्‍धता में मेरे और बुदिमका की जिज्ञासाओं को कोई अंत नहीं था कि भारत कैसा है, लोग कैसे हैं, से लेकर दुनिया-जहान के बारे में वह जानना चाहती है। होटल के डाइनिंग-हॉल के झाड़-फानूसों की रोशनियाँ लकदका रही थीं। अभी जो थोड़ी देर पहले तक कंसर्ट की आवाज आ रही थी, वह कब शेष होनी थी, पता ही नहीं चला। हमें लगा कि शायद रात आधी के नजदीक पहुँच रही है अतः चलना चाहिए, और हम दोनों उठे।

होटल पहुँचकर मैंने उसे पोर्च से विदा करना चाहा पर वह बोली कि वह मुझसे कुछ कविताएँ सुनना चाहती है क्‍योंकि कल सवेरे के बाद तो सब कुछ अलविदा हो जाना है। मुझे थोड़ा संकोच हुआ पर वह निःसंकोच मेरे कमरे तक आई। हमने पाया कि आसपास के कमरों में भी लोग खूब हँस-बोल रहे थे और आज भी इस अंतिम रात्रि को पूरी तरह स्‍मरणीय बना लेना चाहते थे। कमरे में पहुँच मैंने उससे आग्रह किया कि पहले वह अपनी कविता सुनाए पर वह तैयार नहीं हुई। उसने जो कारण बताया वह उचित ही था कि मैं उसकी भाषा नहीं समझ सकूँगा और वह उसका अनुवाद नहीं कर पाएगी। हार कर तब मैंने ही अँग्रेजी में कुछ कविताएँ सुनाई। निश्चित ही रात का एक बज रहा था परंतु जैसे उसे किसी बात की कोई चिंता ही नहीं थी। आखि़रकार करीब डेढ़ बजे वह उठी और मैं उसे विदा देने नीचे पोर्च तक आया। वह स्‍त्रूगा की निर्जन सड़कों पर एक दिन और इसी प्रकार अकेले गई थी, तब भी मुझे खासी असुविधा हुई थी पर आज कुछ ज्यादा ही हो रही थी कि इस आत्‍मीय महिला के साथ क्‍या फिर कभी भेंट हो सकेगी? हालाँकि दूसरे दिन ही सवेरे जब मैं प्रिलेप के लिए बस में बैठने जा रहा था, वह भागी-भागी आई और एक क्षण रुककर बड़े ही अपेक्षित रूप से चली गई। शायद विदा की औपचारिकता में मैं हाथ नहीं हिला सका। विदा का यह अनपेक्षित स्‍वरूप क्‍या सायास था या अनायास ही ऐसा हुआ? बुदिमका, कई अर्थों में अत्‍यंत साधारण-सी लगने वाली नारी कैसे सहज बनकर, बिना किसी अपेक्षा के आपके निकट आती है, कुछ चिंता जैसी भी करती है। थोड़ा-‍बहुत अपने को कहकर कैसे निष्‍प्रयास अपने को सहेजकर लौटाकर भी ले जाती है। इस पूरी यात्रा का जब भी स्‍मरण होता है तब मध्‍य यूरोप की यह ग्रामीण जैसी लगने वाली स्‍त्री कैसे आपकी ओर देखती, मुस्‍कराती होती है, जैसे कालवृक्ष में खिला कोई सूर्यमुखी का बड़ा-सा फूल हो।

(नरेश मेहता यूगोस्‍लाविया के एक छोटे-से जनस्‍थान स्‍त्रूगा में आयोजित काव्‍य समारोह में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में गए थे। इस यात्रा विवरण में उन्‍होंने वहाँ के जीवन,वहाँ के स्‍त्री-पुरुषों की गतिविधियों, भाव मुद्राओं मानसिकताओं और हलचलों की एक छवि उतारी है, उसी यात्रा विवरण 'कितना अकेला आकाश 'से थोड़े अंश।)


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हिंदी समय में नरेश मेहता की रचनाएँ