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कविता

बस में पिता
उदय प्रकाश


मैंने बिल्कुल साफ-साफ देखा
उस बस पर बैठे
कहीं जा रहे थे पिता

उनके सफेद गाल, तंबाकू भरा उनका मुँह
किसी को न पहचानती उनकी आँखें

उस बस को रोको
जो अदृश्य हो जाएगी अभी

उस बस तक
क्या
पहुँच सकती है
मेरी आवाज ?

उस बस पर बैठ कर
इस तरह क्यों चले गए पिता ?


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