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कविता

दुर्दिनों में कविताएँ
उदय प्रकाश


एक

तिनके की उम्मीद में आप करते हैं टेलिफोन
तो सब बाथरूम में होते हैं

आप जेब में सिक्के टटोलते हैं
राज्य परिवहन की बस से बहुत दूर
दोपहर में जाते हैं उनसे मिलने
वे सो रहे होते हैं

बीस साल पुराना बचपन का दोस्त नौकरी से बरखास्त होकर
अपने पिता का इलाज कराने आपके घर आ जाता है

कविताएँ जीवन स्तर की तरह ही
निकृष्ट हो जाती हैं
(उदाहरणार्थ यही कविता)

दुर्दिनों में कहीं नहीं मिलता उधार
फिर भी हम खोजते-फिरते हैं प्यार

दो

जीवन भर के सारे सिक्के
तालाब में कूद कर मछलियाँ बन जाते हैं

स्वर्ण के सारे मुहर मेंढक
और जेवर साँप
जाल में से निकलते हैं
फूते हुए काले मटके

नल भटकता फिरता है नगर-नगर
दमयंती चांडाल के बिस्तर पर
अपनी देह के चीथड़े सीती है

तीन
हाथ जोड़े हुए दूर से मुस्कराते हैं आप
हृदय में उठती है आँधी कहने के लिए
नमस्कार... नमस्कार...

किसी अदृश्य की तरह देखते हुए आपको
आपके बगल से गुजर जाता है
राजधानियों के संवेदनशील कवियों का गिरोह
किसी कविता की कतिपय करुण पंक्ति पर
मगन मन मूँड हिलाता

चार

कटघरे में चीखता है बंदी
'योर आनर,
मुझे नहीं मैकाले को भेजना चाहिए
कालापानी'

'योर आनर,
इतिहास में और भविष्य में फाँसी का हुक्म
जनरल डायर के लिए हो'
'मुजरिम मैं नहीं
हिज हाईनेस,
मुजरिम नाथूराम है'

नेपथ्य में से निकलते हैं कर्मचारी
सिर पर डालकर काला कनटोप
उसे ले जाते हैं नेपथ्य की ओर

न्यायाधीश तोड़ता है कलम
न्यायविद लेते हैं जमुहाइयाँ

दुर्दिनों में ऐसे ही हुआ करता है न्याय

 


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