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कविता

राजधानी में बैल
उदय प्रकाश


एक
बादलों को सींग पर उठाए
खड़ा है आकाश की पुलक के नीचे

एक बूँद के अचानक गिरने से
देर तक सिहरती रहती है उसकी त्वचा

देखता हुआ उसे
भीगता हूँ मैं

देर तक ।

दो

एक सफेद बादल
उतर आया है नीचे
सड़क पर

अपने सींग पर टाँगे हुए आकाश

पृथ्वी को अपने खुरों के नीचे दबाए अपने वजन भर
आँधी में उड़ जाने से उसे बचाते हुए
बौछारें उसके सींगों को छूने के लिए
दौड़ती हैं एक के बाद एक
हवा में लहरें बनाती हुईं

मेरा छाता
धरती को पानी में घुल जाने से
बचाने के लिए हवा में फड़फड़ाता है

बैल को मैं अपने छाते के नीचे ले आना चाहता हूँ
आकाश, पृथ्वी और उसे भीगने से बचाने के लिए

लेकिन शायद
कुछ छोटा है यह छाता ।

तीन

सूर्य सबसे पहले बैल के सींग पर उतरा
फिर टिका कुछ देर चमकता हुआ
हल की नोक पर

घास के नीचे की मिट्टी पलटता हुआ सूर्य
बार-बार दिख जाता था
झलक के साथ
जब-जब फाल ऊपर उठते थे

इस फसल के अन्न में
होगा
धूप जैसा आटा
बादल जैसा भात

हमारे घर के कुठिला में
इस साल
कभी न होगी रात ।


चार

पेसिफिक मॉल के ठीक सामने
सड़क के बीचोंबीच खड़ा है देर से
वह चितकबरा

उसकी अधमुँदी आँखों में निस्पृहता है अजब
किसी संत की
या फिर किसी ड्रग-एडिक्ट की

तीखे शोर, तेज रफ्तार, आपाधापी और उन्माद में
उसके दोनों ओर चलता रहता है
अनंत ट्रैफिक

घंटों से वह वहीं खड़ा है चुपचाप
मोहनजोदाड़ो की मुहर में उत्कीर्ण
इतिहास से पहले का वृषभ
या काठमांडू का नांदी

कभी-कभी बस वह अपनी गर्दन हिलाता है
किसी मक्खी के बैठने पर
उसके सींगों पर टिकी नगर सभ्यता काँपती है
उसके सींगों पर टिका आकाश थोड़ा-सा डगमगाता है

उसकी स्मृतियों में अभी तक हैं खेत
अपनी स्मृतियों की घास को चबाते हुए
उसके जबड़े से बाहर कभी-कभी टपकता है समय
झाग की तरह ।

पाँच

अपनी दोनों हथेलियों के बीचोंबीच
भर लो उसके कंधे का ककुद

और देर तक आँखें मूँदे थामे रहो
अपनी चेतना तक महसूस करते हुए
उसका स्पर्श

उसी तरह जैसे
हथेलियों की त्वचा और
हृदय के बीचोंबीच थामा जाता है
प्रेमिका का स्तन

क्या शिव है वह
उसकी देह पर उगा ?

एक अतिरिक्त सुंदरता
एक अतिरिक्त भार
देह के आकार के गढे जाने के दौरान
बची रह गई अतिरिक्त मिट्टी
जिसे रख दिया विधाता ने यों ही वहाँ
बिना कुछ सोचे ?

बैल और स्त्री
व्यर्थ है दोनों के लिए
उनकी देह की यह अतिरिक्त मात्रा
बताते हैं चिकित्सक

दुनिया के किसी भी बैल के कंधों पर
नहीं होता यह ककुद
इसीलिए मोहनजोदाड़ो के बैल के कंधों पर रखा गया
संसार का सबसे पहला जुआ

संसार में सबसे पहले धरती पर चला हल
सबसे पहले शुरू हुई जुताई
पुरातत्वविद बताते हैं

संसार में सबसे पहले बसे नगर
बैल के कंधे पर रखे ककुद
पर निर्भर

इतिहास जहाँ से शुरू होता था
उसके पहले छोर पर
खड़े थे
बैल और स्त्री

अपने-अपने ककुदों से रचने के लिए
सभ्यताओं का भविष्य ।

छह

आई.टी.ओ. पुल के पास
दिल्ली के सबसे व्यस्त चौराहे पर
खड़ा है बैल

उसे स्मृति में दिखते हैं
गोधूलि में जंगल से गाँव लौटते
अपने पितर-पुरखे

उसकी आँखों के सामने
किसी विराट हरे समुद्र की तरह
फैला हुआ कौंधता है चारागाह

उसके कानों में गूँजती रहती हैं
पुरखों के रँभाने की आवाजें
स्मृतियों से बार-बार उसे पुकारती हुई उनकी व्याकुल टेर

बयालीस लाख या सैंतालीस लाख
कारों और वाहनों की रफ्तार और हॉर्न के बीच
गहरे असमंजस में जड़ है वह

आई.टी.ओ. पुल के चौराहे से
कहाँ जाना चाहिए उसे

पितरों-पुरखों के गाँव की ओर
जहाँ नहीं बचे हैं अब चारागाह
या फिर कनॉटप्लेस या पालम हवाई अड्डे की दिशा में

जहाँ निषिद्ध है सदा के लिए
उसका प्रवेश ।


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