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कविता

एक अकेले का गाना
उदय प्रकाश


धन्य प्रिया तुम जागीं
ना जाने दुखभरी रैन में कब तेरी अँखियाँ लागीं ।

जीवन नदिया, बैरी केवट, पार न कोई अपना
घाट पराया, देस बिराना, हाट-बाट सब सपना ।
क्या मन की, क्या तन की, किहनी अपनी अँसुअन पागी ।। धन्य प्रिया...

दाना-पानी, ठौर-ठिकाना, कहाँ बसेरा अपना
निस दिन चलना, पल-पल जलना, नींद भई एक छलना ।
पाखी रूँख न पाएँ, अँखियाँ बरस-बरस की जागीं ।। धन्य प्रिया...

प्रेम न साँचा, शपथ न साँचा, साँच न संग हमारा
एक साँस का जीवन सारा, बिरथा का चौबारा ।
जीवन के इस पल फिर तुम क्यों जनम-जनम की लागीं ।। धन्य प्रिया...

धन्य प्रिया तुम जागीं
ना जाने दुखभरी रैन में कब तेरी अँखियाँ लागीं ।


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