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कविता

ओस्लो की सड़क पर
शरद आलोक


ओस्लो की सड़क पर
भीख माँगता दर-दर...

नशे में धुत हकलाता स्वर
हार दू समो पेन्गेर?
(तुम्हारे पास छोटे सिक्के हैं?)
फेम्मेर एल्लेर थीएर!
(पाँच या दस क्रोनर का सिक्का!)
कुछ अनसुने कुछ अनकहे चले जाते
कुछ घूरते, नजर फेरकर।
आँखों में बुझे दीपक की लौ
फैलाए अपने हाथ (पर)
भीख माँगता दर-दर.

सर्द हवाओं को चीरता
मन में अधीरता
बर्फ को पाँव से धकेलता,
मुह नाक से निकलता वाष्प सा धुँआ
नाक पोछती बाहें
जीवन बन खाई कुँआ
गिरने से से बेखबर
निर्भय, निडर
जिंदगी लिए हथेली पर
भीख माँगता दर-दर

भीख ही तो माँगते
चोरी तो नहीं करते
डाका तो नहीं डालते।
कोई मजबूरी रही होगी
तब बने होंगे
नशे के आदी।
लोगों की नजरें
निःशब्द कह जाती हैं,
मत दो भीख
समाज के कलंक हैं
मदिरा पिएँगे, नशा करेंगे
अपने को और डुबोएँगे।
अपने को मार रहे हैं
कैसी सजा काट रहे हैं?

हाथ में बोतल या नशे की पुड़िया
सबसे धनी देश में
ये भीख क्यों माँग रहे हैं?
कैसी सजा काट रहे हैं?
निवेदन से दूर
स्वरों में माँग,
झूमते, घूमते मजबूर
मन में विश्वास
नहीं पश्चाताप।

आहत मन में अनेक घाव लिए
राह देखता
कोई मरहम लगाए आगे बढ़कर
बाँहों में भरे कसकर
स्नेह को तरसता
सहानुभूति खोजता
विश्रामगृहों की छतों को छोड़कर
आ गया
ओस्लो की सड़क पर,
भीख माँगता दर-दर।


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