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कविता

सूरज से कम नहीं उलाहना
शरद आलोक


सूरज से कम नहीं उलाहना,
धूप लू को रिश्वत में बाँटना।
कट रहे पेड़ जब यहाँ-वहाँ,
छाया की क्या करें कामना

छायादार वृक्षों की क्या कहें,
बन रहे अमीरों के पालना।
खलियानों में आग-सी बयार,
सड़कों पर श्रमिकों का हाँफना।

जब सूखे हों पालिका के नल,
बाजार में पानी को बेचना
आजादी प्रजातंत्र सुख को
खुले आम पैसे से बेचना।

एक दिन आएगा रामराज्य,
एक ही तराजू में तौलना
बाँटकर खाएँगे हम सब,
भूखे पेट कभी नहीं सोना।

शिक्षा चिकित्सा होगी निःशुल्क
अमीरों से ज्यादा कर लेना
सूरज से कम नहीं उलाहना,
धूप लू को रिश्वत में बाँटना।

कट रहे पेड़ जब यहाँ-वहाँ,
छाया की क्या करें कामना


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