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कविता

उठाओ हाथ में मशाल
शरद आलोक


मशाल की है मजाल
जल उठी है भोर से
ज्यों गर्भनाल!

कविता पर जो तालियों का शोर है,
जनता की सामर्थ्य का जो जोर है,
ताली के दो नहीं, बस एक हाथ चाहिए,
उठा लो एक हाथ में मशाल!
करें कदम ताल.
अन्याय को वेध दे अकाल!
गांधी के संदेश से हल करें सवाल

आतंकियों की टोलियाँ नई-नई,
हाथ में चूड़ी पहने
जो उठा नहीं सकते कुदाल?
अपनों का गला घोंटते,
धरती माँ के वक्ष से संतानों का करते कत्ल,
कितना घिनौना है
इनका समाज-आतंकवाद आंदोलन

पियो विवेक ज्ञान का पना,
श्रम और लगन के बिना,
कब तक चलेगा
शक्ति के नाम पर आतंक?
प्रजातंत्र के बिना
कौन है स्वतंत्र-स्वच्छंद?

माँ नग्न घुमाई जा रही हम मौन हैं!
बहनों और निर्बलों को जला रहे हम कौन हैं?
विदेश में विरोध में उठाई बहुत मशाल,
जुलूस ने किये दृढ़ संकल्प
अन्याय के विरुद्ध उठी आवाज

मानवाधिकार के बिना नहीं है शांति
पड़ोस में आग लगी बुझाएँगे.
तभी हम अपना घर बचाएँगे
पडोसी भूखा हो शांति कहाँ पाएँगे?

बेमेल विवाहितों की तरह
हाथ पर हाथ बांधे
राह ताकते कि अभी आ जाएँगे राम,
दरगाह से निकल कर मौला कोई,
पोछ लेंगे आँसुओं कि धार
बह रही है बार-बार
सूजी आँखों का बनी श्रृंगार

नहीं अब और राम नहीं आएँगे?
विवेक ज्ञान की गंगा बहाएँगे
प्रेम के दीप हम जलाएँगे
अन्याय - अंधकार को मशाल से
जीवन से दूर हम भगाएँगे


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