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कविता

कविताएँ
भगवत रावत


हमने उनके घर देखे

करुणा

इतनी बड़ी मृत्यु

मेधा पाटकर

थक चुकी है वह

बदलते हुए मौसम का मिजाज

वे इसी पृथ्वी पर हैं

लौटना

समुद्र के बारे में

चिड़ियों को पता नहीं

बिटिया

आँच

उसकी थकान

उसका जाना

शरीर से ज्यादा

उसने सोचा

लिखते हुए

जहाँ तुमने

कहाँ-कहाँ

चट्टानें

बलात्कार

प्यारेलाल के लिए विदा-गीत

इस पराए शहर में

प्याज की एक गाँठ

हे बाबा तुलसीदास

सोच रही है गंगाबाई

कचरा बीनने वाली लड़कियाँ

अतिथि कथा

आग पेटी

बैलगाड़ी

वह कुछ हो जाना चाहता है

मनुष्य

हमने चलती चक्की देखी

अपने देश में

किसी तरह दिखता भर रहे थोड़ा-सा आसमान

पल-पल के हिसाब वाले इन दिनों

जब कहीं चोट लगती है

बच्चा

 

 

 

हमने उनके घर देखे

हमने उनके घर देखे

घर के भीतर घर देखे

घर के भी तलघर देखे

हमने उनके

डर देखे।

 

करुणा

सूरज के ताप में कहीं कोई कमी नहीं

न चंद्रमा की ठंडक में

लेकिन हवा और पानी में जरूर कुछ ऐसा हुआ है

कि दुनिया में

करुणा की कमी पड़ गई है।

इतनी कम पड़ गई है करुणा कि बर्फ पिघल नहीं रही

नदियाँ बह नहीं रहीं, झरने झर नहीं रहे

चिड़ियाँ गा नहीं रहीं, गायें रँभा नहीं रहीं।

कहीं पानी का कोई ऐसा पारदर्शी टुकड़ा नहीं

कि आदमी उसमें अपना चेहरा देख सके

और उसमें तैरते बादल के टुकड़े से उसे धो-पोंछ सके।

दरअसल पानी से हो कर देखो

तभी दुनिया पानीदार रहती है

उसमें पानी के गुण समा जाते हैं

वरना कोरी आँखों से कौन कितना देख पाता है।

पता नहीं

आने वाले लोगों को दुनिया कैसी चाहिए

कैसी हवा कैसा पानी चाहिए

पर इतना तो तय है

कि इस समय दुनिया को

ढेर सारी करुणा चाहिए।

 

इतनी बड़ी मृत्यु

इतनी बड़ी मृत्यु

आजकल हर कोई, कहीं न कहीं जाने लगा है

हर एक को पकड़ना है चुपके से कोई ट्रेन

किसी को न हो कानों कान खबर

इस तरह पहुँचना है वहीं उड़ कर

अकेले ही अकेले होता है अखबार की खबर में

कि सूची में पहुँचना है, नीचे से सबसे ऊपर

किसी मैदान में घुड़दौड़ का होना है

पहला और आखिरी सवार

इतनी अजीब घड़ी हैं

हर एक को कहीं न कहीं जाने की हड़बड़ी है

कोई कहीं से आ नहीं रहा

रोते हुए बच्चे तक के लिए रुक कर

कहीं कोई कुछ गा नहीं रहा

यह केवल एक दृश्य भर नहीं है

बुझ कर, फेंका गया ऐसा जाल है

जिसमें हर एक दूसरे पर सवार

एक दूसरे का शिकार है

काट दिए गए हैं सबके पाँव

स्मृति भर में बचे हैं जैसे अपने घर

अपने गाँव,

ऐसी भागमभाग

कि इतनी तेजी से भागती दिखाई दी नहीं कभी उम्र

उम्र के आगे-आगे सब कुछ पीछे छूटते जाने का

भय भाग रहा है

जिनके साथ-साथ जीना-मरना था

हँस बोल कर जिनके साथ सार्थक होना था

उनसे मिलना मुहाल

संसार का ऐसा हाल तो पहले कभी नहीं हुआ

कि कोई किसी को

हाल चाल तक बतलाता नहीं

जिसे देखो वही मन ही मन कुछ बड़बड़ा रहा है

जिसे देखो वही

बेशर्मी से अपना झंडा फहराए जा रहा है

चेहरों पर जीवन की हँसी कही दिख नहीं रही

इतनी बड़ी मृत्यु

कोई रोता दिख नहीं रहा

कोई किसी को बतला नहीं पा रहा

आखिर

वह कहाँ जा रहा है।

 

मेधा पाटकर

करुणा और मनुष्यता की जमीन के

जिस टुकड़े पर तुम आज भी अपने पाँव जमाए

खड़ी हुई हो अविचलित

वह तो कब का डूब में आ चुका है

मेधा पाटकर

रँगे सियारों की प्रचलित पुरानी कहानी में

कभी न कभी पकड़ा जरूर जाता था

रँगा सियार

पर अब बदली हुई पटकथा में

उसी की होती है जीत

उसी का होता है जय-जयकार

मेधा पाटकर

तुम अंतत: जिसे बचाना चाहती हो

जीवन दे कर भी जिसे जिंदा रखना चाहती हो

तुम भी तो जानती हो कि वह न्याय

कब का दोमुँही भाषा की बलि चढ़ चुका है

मेधा पाटकर

हमने देखे हैं जश्न मनाते अपराधी चेहरे

देखा है नरसंहारी चेहरों को अपनी क्रूरता पर

गर्व से खिलखिलाते

पर हार के कगार पर

एक और लड़ाई लड़ने की उम्मीद में

बुद्ध की तरह शांत भाव से मुस्कुराते हुए

सिर्फ तुम्हें देखा है

मेधा पाटकर

तुम्हारे तप का मजाक उड़ाने वाले

आदमखोर चेहरों से अश्लीलता की बू आती है

तुम देखना उन्हें तो नर्मदा भी

कभी माफ नहीं करेगी

मेधा पाटकर

ऐसी भी जिद क्या

अपने बारे में भी सोचो

अधेड़ हो चुकी हो बहुत धूप सही

अब जाओ किसी वातानुकूलित कमरे की

किसी ऊँची-सी कुर्सी पर बैठ कर आराम करो

मेधा पाटकर

सारी दुनिया को वैश्विक गाँव बनाने की फिराक में

बड़ी-बड़ी कंपनियाँ

तुम्हें शो-केस में सजा कर रखने के लिए

कबसे मुँह बाए बैठी हैं तुम्हारे इंतजार में

कुछ उनकी भी सुनो

मेधा पाटकर

खोखले साबित हुए हमारे सारे शब्द

झूठी निकलीं हमारी सारी प्रतिबद्धताएँ

तमाशबीनों की तरह हम दूर खड़े-खड़े

गाते रहे दुनिया बदलने के

नकली गीत

तुम्हें छोड़ कर

हम सबके सिर झुके हुए हैं

मेधा पाटकर।

 

थक चुकी है वह

इतनी थक चुकी है वह

प्यार उसके बस का नहीं रहा

पैंतीस बरस के

उसके शरीर की तरह

जो पैंतीस बरस-सा नहीं रहा

घर के अंदर

रोज सुबह से वह

लड़ती-झगड़ती है बाजार से

और बाजार में रोज शाम

घर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते खो जाती है।

रोटी बेलते वक्त अक्सर वह

बटन टाँक रही होती है

और कपड़े फींचते वक्त

सुखा रही होती है धूप में

अधपके बाल।

फिरकी-सी फिरती रहती है

पगलाई वह

बच्चों को डाँटती-फटकारती

और बिना बच्चों के सूने घर में

बेहद घबरा जाती है।

कितना थक चुकी है वह।

मैं उसे एक दिन

घुमाने ले जाना चाहता हूँ

बाहर

दूर...

घर से बाजार से

खाने से कपड़ों से

उसकी असमय उम्र से।

 

बदलते हुए मौसम का मिजाज

जब से भूमंडल नहीं रहा भौगोलिक

चढ़ गया है भूमंडलीकरण का बुखार

जब से गायब होना शुरू हुई उदारता

फैला प्लेग की तरह

उदारतावाद

जब से उजड़ गए गाँवों, कस्बों और शहरों के खुले मैदानों के बाजार

घर-घर में घुस गया नकाबपोश

बाजारवाद

यह अकारण नहीं कि तभी से प्रकृति ने भी

ताक पर रख कर अपने नियम-धरम

बदल दिए हैं अपने आचार-विचार

अब यही देखिए कि पता ही नहीं लगता

कि खुश या नाराज हैं ये बादल

जो शेयर दलालों के उछाले गए सेंसेक्स की तरह

बरसे हैं मूसलाधार इस साल

जैसे कोई अकूत धनवान

इस तरह मारे अपनी दौलत की मार

कि भूखे भिखारियों को किसी एक दिन

जबरदस्ती ठूँस ठूँस कर तब तक खिलाए सारे पकवान

जब तक वे खा-खा कर मर न जाएँ

जैसे कोई जल्लाद केवल अपने अभ्यास के लिए

बेवजह मातहतों पर तब तक बरसाए

कोड़े पर कोड़े लगातार

जब तक स्वयं थक-हार कर सो न जाए

दूसरी तरफ देखिए यह दृश्य

कि ऐसी बरसात में, नशे में झूमती,

अपनी ही खुमारी में खड़ी हैं अविचलित

ऊँची-नीची पहाड़ियाँ

स्थिति-प्रज्ञों की तरह अपने ही दंभ में खड़े हैं

ऊँचे-ऊँचे उठते मकान

और दुख से भी ज्यादा दुख में

डूबी हुईं है सारी की सारी निचली बस्तियाँ

बह गए जिनके सारे छान-छप्पर-घर-बार

इन्हें ही मरना है, हवा से, पानी से, आग से

बदलते हुए मौसम के मिजाज से

कभी प्यास से, कभी डूब कर

कभी गैस से

कभी आग से।

 

वे इसी पृथ्वी पर हैं

इस पृथ्वी पर कहीं न कहीं कुछ न कुछ लोग हैं जरूर

जो इस पृथ्वी को अपनी पीठ पर

कच्छपों की तरह धारण किए हुए हैं

बचाए हुए हैं उसे

अपने ही नरक में डूबने से

वे लोग हैं और बेहद नामालूम घरों में रहते हैं

इतने नामालूम कि कोई उनका पता

ठीक-ठीक बता नहीं सकता

उनके अपने नाम हैं लेकिन वे

इतने साधारण और इतने आमफहम हैं

कि किसी को उनके नाम

सही-सही याद नहीं रहते

उनके अपने चेहरे हैं लेकिन वे

एक दूसरे में इतने घुले-मिले रहते हैं

कि कोई उन्हें देखते ही पहचान नहीं पाता

वे हैं, और इसी पृथ्वी पर हैं

और यह पृथ्वी उन्हीं की पीठ पर टिकी हुई है

और सबसे मजेदार बात तो यह है कि उन्हें

रत्ती भर यह अंदेशा नहीं

कि उन्हीं की पीठ पर

टिकी हुई यह पुथ्वी।

 

लौटना

दिन भर की थकान के बाद

घरों की तरफ लौटते हुए लोग

भले लगते हैं।

दिन भर की उड़ान के बाद

घोंसलों की तरफ लौटतीं चिड़ियाँ

सुहानी लगती हैं।

लेकिन जब

धर्म की तरफ लौटते हैं लोग

इतिहास की तरफ लौटते हैं लोग

तो वे ही

धर्म और इतिहास के

हत्यारे बन जाते हैं।

ऐसे समय में

सबसे ज्यादा दुखी और परेशान

होते हैं सिर्फ

घरों की तरफ लौटते हुए लोग

घोंसलों की तरफ लौटती हुई

चिड़ियाँ।

 

समुद्र के बारे में

आँख खुली तो

खुद को समुद्र के किनारे पाया

इसके पहले

मैंने उसे पढ़ा था किताबों में

आँखों में फैले

आसमान की तरह

वह फैला था

आकर्षक

अनंत

मैं उसमें कूद पड़ा

खूबसूरत चुनौती के उत्तर-सा

पर वह

जादुई पानी की तरह

सिमटने लगा

देखते-देखते

दिखने लगी तल की मिट्टी

दरकते-दरकते

वह मुर्दा चेहरों में

तब्दील हो गई

उन चेहरों में एक चेहरा मेरा था

मैं भागते-भागते

किताबों के पास गया

उनके उत्तर के पृष्ठ

गल कर गिर चुके थे

और स्कूलों में

समुद्र के बारे में

वही पढ़ाया जा रहा था

जो कभी

मैंने पढ़ा था।

 

चिड़ियों को पता नहीं

चिड़ियों को पता नहीं कि वे

कितनी तेजी से प्रवेश कर रही हैं

कविताओं में।

इन अपने दिनों में खास कर

उन्हें चहचहाना था

उड़ानें भरनी थीं

और घंटों गरदन में चोंच डाले

गुमसुम बैठ कर

अपने अंडे सेने थे।

मैं देखता हूँ कि वे

अक्सर आती हैं

बेदर डरी हुईं

पंख फड़फड़ाती

आहत

या अक्सर मरी हुईं।

उन्हें नहीं पता था कि

कविताओं तक आते-आते

वे चिड़ियाँ नहीं रह जातीं

वे नहीं जानतीं कि उनके भरोसे

कितना कुछ हो पा रहा है

और उनके रहते हुए

कितना कुछ ठहरा हुआ है।

अभी जब वे अचानक उड़ेंगी

तो आसमान उतना नहीं रह जाएगा

और जब वे उतरेंगी

तो पेड़ हवा हो जाएँगे।

मैं सारी चिड़ियों को इकट्ठा करके

उनकी ही बोली में कहना चाहता हूँ

कि यह बहुत अच्छा है

कि तुम्हें कुछ नहीं पता।

तुम हमेशा की तरह

कविताओं की परवाह किए बिना उड़ो

चहचहाओ

और बेखटके

आलमारी में रखी किताबों के ऊपर

घोंसले बना कर

अपने अंडे सेओ।

न सही कविता में

पर हर रोज

पेड़ से उतर कर

घर में

दो-चार बार

जरूर आओ-जाओ।

 

बिटिया

लगभग चार बरस की बिटिया ने

माँ से

हाथ फैलाते हुए कहा -

दीदी की किताब में

इत्ता बड़ा समुद्र है

माँ ने आश्चर्य जताते हुए कहा -

अच्छा!

हाँ

बिटिया ने कहा -

देखो मैंने उसमें उँगली डाली

तो भीग गई।

 

आँच

आँच सिर्फ आँच होती है

न कोई दहकती भट्टी

न कोई लपट

न कोई जलता हुआ जंगल

किसी अलाव की सी आँच की रोशनी में

चेहरे

दिन की रोशनी से भी ज्यादा

पहचाने जाते हैं।

 

उसकी थकान

कोई लंबी कहानी ही

बयान कर सके शायद

उसकी थकान

जो मुझसे

दो बच्चों की दूरी पर

न जाने कब से

क्या-क्या सिलते-सिलते

हाथों में

सुई धागा लिए हुए ही

सो गई है।

 

उसका जाना

 

जाते हुए

उसकी पीठ नहीं

उसका

चेहरा

देखा था।

 

शरीर से ज्यादा

शरीर से ज्यादा

वह एक आकृति थी

उसे छूना

कुछ रेखाओं को अनुभव करना होता

उँगलियों के पोरों पर

छूते ही

वह हिल उठती

और जाते ही

जैसे कोई

निकल कर...चला...जाता दूर...।

 

उसने सोचा

कमरे के बाहर

और कमरे के अंदर के दृश्य को

साँसों में भरते हुए

उसने सोचा

आँधी होती

तो निकल गई होती अब तक

उड़ाती हुई धूल

अपने साथ

तूफान होता

तो जा चुका होता

बहुत कुछ

तोड़-फोड़ कर

बस वह

चुपचाप आई

और फैल गई

आस-पास।

 

लिखते हुए

एक चेहरा वक्ष से सटा हुआ

कटा हुआ अपने आप से

देख रहा है सूनी छत लगातार

सुनो

मैं यहाँ हूँ

छाती के बिल्कुल करीब

साँसें सुनते हुए

और

लिखते हुए।

 

जहाँ तुमने

आज की तारीख वाले

इस पन्ने पर

मैं लिखूँगा एक कविता

कुछ इस तरह

कि मैं पहुँच जाऊँगा

वहाँ

जहाँ तुमने

एक कुर्सी के बराबर

जगह छोड़ रखी है ।

 

कहाँ-कहाँ

आखिरकार एक दिन

लौटना ही होगा

उस दरवाजे तक

जिसकी चौखट पर

मेरे नाम की तख्ती लगी है

कहाँ-कहाँ लिखा गया है मेरा नाम।

 

चट्टानें

चारों ओर फैली हुईं

स्थिर और कठोर चट्टानों की दुनिया के बीच

एक आदमी

झाड़ियों के सूखे डंठल बटोर कर

आग जलाता है।

चट्टानों के चेहरे तमतमा जाते हैं

आदमी उन सबसे बेखबर

टटोलता हुआ अपने आपको

उठता है और उनमें किसी एक पर बैठ कर

अपनी दुनिया के लिए

आटा गूँधता है।

आग तेज होती है

चट्टानें पहली बार अपने सामने

कुछ बनता हुआ देखती हैं ।

अंत में आदमी

उठ कर चल देता है अचानक

उसी तरह बेखबर

चट्टानें पहली बार अपने बीच से

कुछ गुजरता हुआ

महसूस करती हैं।

 

बलात्कार

अपनी पूरी ताकत के साथ

चीखती है

एक औरत

अपने बियाबान में

और

खामोश हो जाती है

कहीं दूर

एक पत्ता टूट कर गिरता है

सन्नाटे को चीरता

छटपटा कर गिरता है

कहीं एक पक्षी

और दूर-दूर तक

खामोशी छाई रहती है

यह मेरा समय है

और यह मेरी दुनिया है।

 

प्यारेलाल के लिए विदा-गीत

कोई नहीं

जो नब्ज पर हाथ धरे

जिए या मरे

प्यारेलाल

नहीं किया कुछ तब

जब जवान थे

भाग दौड़ सकते थे

भर लेते घर उस समय

थोड़ी देर को

धर देते लोक-लाज

कोने में

झुक जाते थोड़ा-सा

झुके-झुके ऊपर उठ कर

झंडे-सा फहराते

डरे क्यों नहीं

क्यों हरे बाँस-से खड़े रहे

बेहद अकेले हो इस समय

कोई नहीं है पास

कहाँ गए दोस्त यार

क्या हुआ

सबको अपना समझने का

भरम खा गए

छूट गए सब रिश्ते

सब कट कर निकल गए

पता नहीं चला

कब चलते-चलते

सूनी सड़क पर आ गए

समझ से नहीं लिया काम

ठीक-ठीक

किया नहीं हिसाब

भाषा पढ़ते रहे

गणित में गच्चा खा गए

अकेले बलबूते पर

उम्र भर लड़े

किसी ने नहीं दिया साथ

क्रोध में निकली गालियों को हर तकलीफ की

दवा समझते रहे

और

असली दुश्मन पहचानने में

चूक गए

मंच पर अकेले

फिरते रहे निहत्थे

जोश में भरे-भरे

गिरे

तो हर बार

मत पेटी में गिरे

सुखी हो जाओ

यह तो कहेंगे लोग

मत

दान कर

मरे

प्यारेलाल

दुखी मत होओ

यह दुखी होने का समय नहीं

तुम्हें शांति चाहिए

तो ऐसे समय में

गीता का प्रसिद्ध श्लोक

याद करो

और

खुशी-खुशी मर जाओ

तुमने तो किया था कर्म

फल जिसने चाहा था

उन्हें मिला

प्यार जो किया तुमने

सारी दुनिया से

जी खोल कर

किसी ने कहा तो नहीं था तुमसे

खुद से क्यों नहीं किया

तो फिर अब

इस तरह मत मरो

प्यार से मरो

प्यारेलाल

चलो

देर मत करो

देखो

तुम्हारे रथ के घोड़े

बाहर हिनहिना रहे हैं

सारी तैयारी है

बड़े-बड़े लोग

परेशान हैं

तुम्हारे गुण गाने को

नियम के मुताबिक

तुम्हारे जीते जी वे

ऐसा नहीं कर सकते

देरी करने से कोई लाभ नहीं

उनकी मजबूरी समझो

जल्दी करो

मरो

मरो

प्यारेलाल।

 

इस पराए शहर में

कुछ लोग

आहत हो कर निकले थे घर से

कहानी सुनाते हुए कहते हैं लोग

कि पानी पीने को

लोटा डोर तक नहीं थी

उनके पास

न कुछ से जिंदगी शुरू की उन्होंने

पराए शहरों में

और तन-मन लगा कर

कमाया धन

धन से मान

मान से नाम

इस तरह वे एक दिन

नगर सेठ हुए

जिए पूरी उम्र

सफलताओं की पताका फहराते हुए

वे गाजे-बाजे के साथ

स्वर्गवासी हुए

इरादों के पक्के

वे कभी लौट कर नहीं गए

अपने घरों की तरफ

घर ही आया उन तक

उन्हें प्रणाम करने

और धन्य हुआ

हर किले का

जिस तरह होता है एक

बड़ा-सा दरवाजा

जिससे

किला खुलता है

उसी तरह

हर शहर के पास हुआ करता था

कोई न कोई ऐसा ही

बड़ा-सा किस्सा

जिससे खुला करती थीं

शहर की

अंतर्कथाएँ

वे दिन ही कुछ और थे

कहते-कहते लोग

उदास हो जाते हैं

और वक्त से पिटते-पिटते

ऐसी ही किसी न किसी

कहानी की दीवार से

पीठ टिका देते हैं

सैकड़ों सालों से

हजारों की तादाद में

हो कर बेघरबार

हर साल

निकल पड़ते हैं लोग

शहरों की टूटी-उखड़ी सड़कें

बुलाती हैं उन्हें

पराए रसोईघरों के बरतन

उनकी आस लगाए रहते है

प्लेटों की जूठन

उन्हें पुकारती है

नर्म बिस्तर

बिछने को उनके हाथों का

इंतजार करते हैं

और जब लौटते हैं वे

घरों की तरफ

उन्हें फिर से बसाने

फिर कोई आग लग जाती है

फिर कोई पानी भर जाता है

फिर कोई जानवर

दिन-दहाड़े घुस जाता है

उनके घरों में

कई साल पहले

अपने समय के

तमाम जवान लड़कों की तरह

मैं भी निकला था घर से

झोले में कुछ कागज डाल कर

पर छोड़िए

इस कहानी में कुछ भी नया नहीं है

आप बतलाइए

आप कब और क्यों आए

इस पराए शहर में।

 

प्याज की एक गाँठ

चार रुपए किलो प्याज

आवाज लगाई

बशीर भाई ने

मैं चौंका

वे हँस कर बोले

ले जाइए साहब

हफ्ते भर बाद

यही भाव याद आएगा

अल्लाह जाने

यह सिलसिला

कहाँ तक जाएगा

जेब में हाथ डालते हुए

मैंने कहा

आधा किलो

सुन कर बशीर भाई कुछ बोले नहीं

और एक की जगह

आधा किलो तौलते हुए मेरे लिए

ऐसा लगा

जैसे कुछ मुश्किल में पड़ गए

उनकी तराजू का

भारी वाला पलड़ा

हमेशा की तुलना में

आज कुछ कम नीचे झुका

प्याज की एक गाँठ

और उतारें या न उतारें

इस सोच में

उनका हाथ

ग्राहक से रिश्ता तय करता था

एक क्षण को

हवा में रुका

और आखिरकार

बशीर भाई जीत गए

मैं रास्ते भर

झोले में डाली

प्याज की उस एक गाँठ को

आँखों में लिए-लिए

घर लौटा।

 

हे बाबा तुलसीदास

(तुलसीदास के एक प्रसिद्ध कवित्त को याद करते हुए)

चोर की चोरी

साहूकारी साहूकार की

दासता दास की

और अफसर की अफसरी

बेईमानी बेईमान की

दरिद्रता स्वाभिमानी की

गरीब की गरीबी

और तस्कर की तस्करी

दिन दूनी रात चौगुनी

फल फूल रही

कमाई कुकरम की

और अजगर की अजगरी

मजे में हैं यहाँ सब

हे बाबा तुलसीदास

कविताई ससुरी अब

कहाँ जाय का करी।

 

सोच रही है गंगाबाई

सिर्फ एक ही बेटा है गंगाबाई का

छोड़ गया था बाप जरा-सा उसे गोद में

कैसे काटी फूँक-फूँक बच-बचा कर

अपनी कठिन उमर गंगाबाई ने

वही जानती

बरतन-झाड़ू-पोंछा करके

किसी तरह बेटे को दसवाँ पास कराया

पर जब से उसका बेटा लग गया काम से

सबके चेहरे बदल गए हैं

गंगाबाई का लड़का अब

जब पैंट और बुश्शर्ट पहन कर

बालों में अच्छे से कंघा-वंघा करके

कार चलाता है सरकारी

तो पड़ोस के लोगों की आँखें

ऐसे जलने लगती हैं जैसे

सरकारी गाड़ी दहेज में घर आई हो

सारे लोग मोहल्ले भर के

मन ही मन ऐसे रहते हैं जैसे

गंगाबाई ने कोई अपराध किया हो

लड़का भी कुछ कम अकड़ैलू है

सबसे अलग रहता है

सभी जगह कहता फिरता है

उसे नहीं परवाह किसी की

गंगाबाई नहीं चाहती उसके बेटे को

लगे किसी की नजर-बद्दुआ

अब तक जैसे सबसे मिल-जुल कर

रहती आई गंगाबाई

गंगाबाई वही चाहती

लेकिन जिस दिन से उसके बेटे ने

साफ कह दिया

अम्मा, अब तू कभी किसी साले के घर का

झाड़ू-पोंछा नहीं करेगी

घर बैठेगी आखिर मेरी भी इज्जत है

बस, उस दिन से उसके

पास, पड़ोस, जात-बिरादरी वाले मुँह बिचका कर

आपस में गंगाबाई को

कहने लगे गंगा महारानी

अब महारानी जैसी गाली सुन कर

गंगाबाई इतना खौली... इतना खौली

कि आखिर में उसने भी कह डाला

हाँ... हूँ महरानी

पर उस दिन से

उसके मन को चैन नहीं है

मन ही मन बड़-बड़-बड़-बड़ करती रहती है

और इधर गंगाबाई ने जबसे

सभी घरों का झाड़ू-पोंछा छोड़ दिया है

बड़े घरों की सभी औरतें

जब-जब जुटती हैं दुपहर में

अक्सर गंगाबाई की चर्चा करने लगती हैं

कोई कहती

छोटी जात जरा में कितना इतरा जाती

कोई कहती

गंगाबाई ने ही एक अनोखा श्रवणकुमार जना है

सोच रही है गंगाबाई

उसके लोगों की आँखों में

खटक रहा क्यों उसका बेटा

ऊपर वालों की आँखों में

खटक रहा क्यों उसका बेटा

दोनों की दोनों आँखों में

खटक रहा क्यों उसका बेटा

किससे बोले गंगाबाई

किसको अपना दुख बतलाए

उसने कभी नहीं सोचा था

ऐसा दिन भी आ सकता है

उसने ऐसी क्या गलती की

सोच रही है गंगाबाई।

 

कचरा बीनने वाली लड़कियाँ

आपने अपने शहर में भी

जरूर देखी होंगी

कचरा बीनने वाली लड़कियाँ

मोहल्ले भर के कूड़े के ढेर पर

चौपायों-सी चलती-फिरती

कचरे में अपने आप पैदा हो गई

नहीं लगतीं

ये कचरा बीनने वाली लड़कियाँ?

जगह-जगह फटे

अपने कपड़ों जैसे टाट के बोरे में

भरती हैं वे बीन-बीन कर

हमारे आपके रद्द किए कागज के टुकड़े

टूटे-फूटे टीन और प्लास्टिक के डिब्बे

जब कोई छपा हुआ फोटू

या साबुत डिब्बा मिल जाता है उन्हें

तो वे रख देती हैं अलग सँभाल कर

और उस समय तो आप

उन्हें देख नहीं सकते जब वे

कचरे में से जाने क्या उठा कर

चुपचाप मुँह में रख लेती हैं

अपने आस पास

घूमते सुअरों के बीच कैसी लगती हैं

ये कचरा बीनने वाली लड़कियाँ?

यह सवाल

समाजशास्त्र के कोर्स के बाहर का है

और सौंदर्यशास्त्र उनके लिए

अभी बना नहीं

हाँ, आजकल कलात्मक फोटोग्राफी के लिए

मसाला जरूर हो जाती हैं

ये कचरा बीनने वाली लड़कियाँ

अपनी त्वचा पर

कालिख की परतों पर परतें चढ़ाती

बालों को जट-जूटों की तरह

फैलाती-बढ़ाती

बिना शरम-लिहाज

शरीर को चाहे जहाँ खुजलाती

पसीने और पानी के छीटों से बनी

मैल की लकीरों वाले चेहरे पर

पीले दाँतों से

न जाने किसको मुँह चिढ़ाती

आठ-नौ बरस से

बीस-पच्चीस तक की उमर की

पता नहीं कब कैसे

किस कूड़ेघर से

अपने पेट में

बच्चे तक उठा ले आती हैं

ये कचरा बीनने वाली लड़कियाँ

मर तो चुकी थीं सारी की सारी

चौरासी की गैस में

अब किससे पूछें

फिर कहाँ से उग आई हैं

ये कचरा बीनने वाली लड़कियाँ?

किसी रजिस्टर में इनका नाम नहीं लिखा

ढूँढने पर भी इनके बाप का पता नहीं मिलता

इनका कहीं कोई भाई नहीं दिखता

यहाँ तक कि खुद ही

अपनी माँ होती हैं

ये कचरा बीनने वाली लड़कियाँ।

 

अतिथि कथा

उस दिन

अचानक आ गए कल्लू के जजमान

ठीक ठिए पर ही जा पहुँचे जहाँ

कल्लू और रामा

करते थे सफाई

पहाड़ी के नीचे वाली

कलारी के पास

अब ऐसे में क्या करता कल्लू

उसने तुरंत अपनी पगड़ी उतार

जजमान के पाँवों से लगाई

फिर गले मिले

दोनों समधी

देखा रामा ने दूर से

तो डलिया-झाड़ू वहीं रख पहुँची पास

घूँघट किया समधी को

पूछी बेटी-जमाई की

कुसलात

फिर कलारी के पास चट्टान पर बैठे तीनों जने

बैठ गए आसपास दोनों घर दोनों गाँव

दोनों परिवार

दोनों समधी आमने-सामने

और लाज-शरम की आड़ में

बगल तरफ रामा

कल्लू ने बीड़ी सुलगाई

दाहिनी कोहनी को हाथ लगा आदर से

जजमान को गहाई

बस, इतने में

रामा पता नहीं कहाँ गई

पता नहीं कहाँ से क्या-क्या प्रबंध किया उसने

कि थोड़ी देर बाद एक हाथ में चना-मुरमुरा-खारे की पुड़िया

दूसरे हाथ में गरम-गरम

भजिए-मुँगोड़े लिए हुए आई

और फिर फैला कर अखबार का कागज

बिछा दिए उसने चट्टान पर जितने हो सकते थे

सारे पकवान

थोड़े ही देर में

मछली बेचने वाला भोई का लड़का

ला कर रख गया उनके सामने

तीन गिलास और गुलाब की अद्धी

जैसे सचमुच का

सम्मान

तीनों ने शिकवों-शिकायतों

रिश्तों-नातों की जन्म-जन्मांतरों की

मर्म भरी कथाओं के साथ

खाली की अद्धी गुलाब की

खूब-खूब हिले-जुले तीनों जने

तीनों ने खूब-खूब कसमें खाईं

बात-बात पर दी गई भगवान की दुहाई

ऐसी बही तिरबेनी प्रेम की

कि बिसर गईं पिछली भूलें-चूकें

बह गया सारा दुख

धुल गया सारा मैल

सारा मलाल

जनम सफल हुआ

बन गए बिगड़े काज

कल्लू ने समधी को खिलाया पान

एक साथ के लिए बँधवा दिया

फिर बस में बिठाया

बस चलने को हुई तो तीनों के गले भरे हुए थे

बस के हिलते ही जजमान ने भारी आवाज में कहा

हमारे मन में कौनऊँ मैल नइयाँ

आनंद से रहियौ

आप लोगन ने खूब रिश्तेदारी निभाई

प्रिय पाठको

इस तरह उस दिन भोपाल नगर में पहाड़ी के नीचे

कलारी के पास वाली चट्टान पर हुआ शानदार स्वागत

कल्लू के जजमान का

कार्यक्रम समाप्त होते-होते शाम हो चुकी थी

अँधेरा घिर आया था

चाँद-तारे और वनस्पतियाँ साक्षी हैं

देवता यह दृश्य ईर्ष्या से देख रहे थे

और आकाश से

फूल नहीं बरसा रहे थे।

 

आग पेटी

फिर से खाया धोखा इस बार

रत्ती भर नहीं आई समझदारी

ले आया बड़े उत्साह से

सीली हुई बुझे रोगन वाली दियासलाई घर में

समझ कर सचमुच की आग पेटी

बिल्कुल नए लेबिल नए तेवर की ऐसी आकर्षक पैकिंग

कि देखते ही आँखों में लपट-सी लगे

एक बार फिर सपने के सच हो जाने जैसे

चक्कर में आ गया

सोचा था इस बार तो

घर भर को डाल दूँगा हैरत में

साख जम जाएगी मेरी अपने घर में

जब दिखाऊँगा सबको सचमुच की लौ

और कहूँगा कि लो छुओ इसे

यह उँगलियाँ नहीं जलाती

सोचा था इस बार घर पहुँचते ही

बुझा दूँगा घर की सारी बत्तियाँ

फिर चुपके से एक काड़ी जलाऊँगा

और उसकी झिलमिल फैलती रोशनी में देखूँगा

सबके उत्सुक चेहरे

सोचा था इस बार तो निश्चय ही

बहुत थक जाने के बाद

पिता के बंडल से एक बीड़ी अपने लिए

चुपचाप निकाल कर लाऊँगा

और सुलगा कर उसे इस दियासलाई की काड़ी से

उन्हीं की तरह बेफिक्र हो कुर्सी की पीठ से टिक जाऊँगा

और भी बहुत कुछ सोचा था

लेकिन...

दुखी हो जाते हैं मुझसे घर के लोग

भीतर ही भीतर झुँझलाने लगते हैं मेरी आदत पर

उनकी आँखें और चेहरे

मुझसे कहते से लगते हैं

कि जिससे चूल्हा नहीं जला सके कभी

उसके भरोसे कब तक सपने देखोगे

मैं भी कुछ कह नहीं पाता

और घर में एक सन्नाटा छा जाता है

कोई किसी से कुछ नहीं बोलता

बड़ी देर तक यह सूरत बनी रहती है

फिर धीरे-धीरे मन ही मन सब एक दूसरे से

बोलना शुरू करते हैं

कोई एक आता है और चुपचाप एक गिलास पानी रख जाता है

थोड़ी देर बाद कोई चाय का कप हाथ में दे जाता है

इस तरह अँधेरा छँटने लगता है

मैं देखता हूँ, मैं अपने घर में हूँ

घर में दुख इसी तरह बँटता है।

बैलगाड़ी

एक दिन औंधे मुँह गिरेंगे

हवा में धुएँ की लकीर से उड़ते

मारक क्षमता के दंभ में फूले

सारे के सारे वायुयान

एक दिन अपने ही भार से डूबेंगे

अनाप-शनाप माल-असबाब से लदे फँसे

सारे के सारे समुद्री जहाज

एक दिन अपनी ही चमक-दमक की

रफ्तार में परेशान सारे के सारे वाहनों के लिए

पृथ्वी पर जगह नहीं रह जाएगी

तब न जाने क्यों लगता है मुझे

अपनी स्वाभाविक गति से चलती हुई

पूरी विनम्रता से

सभ्यता के सारे पाप ढोती हुई

कहीं न कहीं

एक बैलगाड़ी जरूर नजर आएगी

सैकड़ों तेज-रफ्तार वाहनों के बीच

जब कभी वह महानगरों की भीड़ में भी

अकेली अलमस्त चाल से चलती दिख जाती है

तो लगता है घर बचा हुआ है

लगता है एक वही तो है

हमारी गतियों का स्वास्तिक चिह्न

लगता है एक वही है जिस पर बैठा हुआ है

हमारी सभ्यता का आखिरी मनुष्य

एक वही तो है जिसे खींच रहे हैं

मनुष्यता के पुराने भरोसेमंद साथी

दो बैल।

 

वह कुछ हो जाना चाहता है

वह कुछ हो जाना चाहता है

तमाम उम्र से आसपास खड़े हुए

लोगों के बीच

वह एक बड़ी कुर्सी हो जाना चाहता है

अंदर ही अंदर

पल-पल

घंटी की तरह बजना चाहता है

फोन की तरह घनघनाना चाहता है

सामने खड़े आदमी को

उसके नंबर की मार्फत

पहचानना चाहता है

वह हर झुकी आँख में

दस्तखत हो जाना चाहता है

हर लिखे कागज पर

पेपरवेट की तरह बैठ जाना चाहता है

वह कुछ हो जाना चाहता है।

 

मनुष्य

दिखते रहने के लिए मनुष्य

हम काटते रहते हैं अपने नाखून

छँटवा कर बनाते-सँवारते रहते हैं बाल

दाढ़ी रोज न सही तो एक दिन छोड़ कर

बनाते ही रहते हैं

जो रखते हैं लंबे बाल और

बढ़ाए रहते हैं दाढ़ी वे भी उन्हें

काट छाँट कर ऐसे रखते हैं जैसे वे

इसी तरह दिख सकते हैं सुथरे-साफ

मनुष्य दिखते भर रहने के लिए हम

करते हैं न जाने क्या-क्या उपाय

मसलन हम बिना इस्तरी किए कपड़ों में

घर से बाहर पैर तक नहीं निकालते

जूते-चप्पलों पर पालिश करवाना

कभी नहीं भूलते

गमी पर भी याद आती है हमें

मौके के मुआफिक पोशाक

अब किसी आवाज पर

दौड़ नहीं पड़ते अचानक नंगे पाँव

कमरों में आराम से बैठे-बैठे

देखते रहते हैं नरसंहार

और याद नही आता हमें अपनी मुसीबत का

वह दिन जब हम भूल गए थे

बनाना दाढ़ी

भूल गए थे खाना-पीना

भूल गए थे साफ-सुथरी पोशाक

भूल गए थे समय दिन तारीख

भूल जाते हैं हम कि बस उतने से समय में

हम हो गए थे कितने मनुष्य।

 

हमने चलती चक्की देखी

हमने चलती चक्की देखी

हमने सब कुछ पिसते देखा

हमने चूल्हे बुझते देखे

हमने सब कुछ जलते देखा

हमने देखी पीर पराई

हमने देखी फटी बिवाई

हमने सब कुछ रखा ताक पर

हमने ली लंबी जमुहाई

हमने देखीं सूखी आँखें

हमने सब कुछ बहते देखा

कोरे हड्डी के ढाँचों से

हमने तेल निकलते देखा

हमने घोका ज्ञान पुराना

अपने मन का कहना माना

पहले अपनी जेब सँभाली

फिर दी सारे जग को गाली

हमने अपना फर्ज निभाया

राष्ट्र-पर्व पर गाना गाया

हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई

आपस में सब भाई-भाई।

 

अपने देश में

पानी जब नहीं बरसता तो नहीं बरसता

आप चाहे जितना पसीना बहाएँ

सूखे गले से चाहे जितना चीखें चिल्लाएँ

एक एक बूँद के लिए कितना भी तरस-तरस जाएँ

पानी नहीं बरसता तो नहीं बरसता

लेकिन जब बरसता है तो बरसने के पहले ही बाढ़ आ जाती है

हर बरस हमारी ब्रह्मपुत्र ही सबसे पहले खबर देती है

कि बरसात आ गई

जब तक हमें खबर होती है तब तक सैंकड़ों गाँव

जलमग्न हो चुके होते हैं

जब मैं स्कूल में पढ़ता था, उन दिनों

अखबार में छपी, बाढ़ग्रस्त इलाके का मुआयना करती

किसी हेलिकाप्टर की तस्वीर से पता चलता था

अब इधर सुविधा हुई है

अब हम घरों में कुर्सी पर बैठे-बैठे डूबते गाँवों के

जीते-जागते दृश्य देख कर जान जाते हैं

कि बरसात आ गई है

हम हर साल इसी तरह बरसात के

आने का इंतजार करते हैं

 

किसी तरह दिखता भर रहे थोड़ा-सा आसमान

किसी तरह दिखता भर रहे थोड़ा-सा आसमान

तो घर का छोटा-सा कमरा भी बड़ा हो जाता है

न जाने कहाँ-कहाँ से इतनी जगह निकल आती है

कि दो-चार थके-हारे और आसानी से समा जाएँ

भले ही कई बार हाथों-पैरों को उलाँघ कर निकलना पड़े

लेकिन कोई किसी से न टकराए।

जब रहता है, कमरे के भीतर थोड़ा-सा आसमान

तो कमरे का दिल आसमान हो जाता है

वरना कितना मुश्किल होता है बचा पाना

अपनी कविता भर जान!

 

पल-पल के हिसाब वाले इन दिनों

पल-पल के हिसाब वाले इन दिनों

यह अचरज की बात नहीं तो और क्या

कि आपकी बेटी के ब्याह में आपके बचपन का

कोई दोस्त अचानक आपके बगल में

आ कर खड़ा हो जाए।

न कोई रिश्तेदारी, न कोई मतलब

न कुछ लेना-देना, न चिट्ठी-पत्री

न कोई खबर

न कोई सेठ, न साहूकार

एक साधारण-सा आदमी

पाटता तीस-पैंतीस से भी ज्यादा बरसों की दूरी

खोजता-खोजता, पूछता-पूछता घर-मोहल्ला

वह भी अकेला नहीं, पत्नी को साथ लिए

सिर्फ दोस्त की बेटी के ब्याह में शामिल होने चला आया।

मैंने तो यूँ ही डाल दिया था निमंत्रण-पत्र

याद रहे आए पते पर जैसे एक

रख आते हैं हम गणेश जी के भी पास

कहते हैं बस इतना-सा करने से

सब काम निर्विघ्न निबट जाते हैं।

खड़े रहे हम दोनों थोड़ी देर तक

एक दूसरे का मुँह देखते

देखते एक दूसरे के चेहरे पर उग आई झुर्रियाँ

रोकते-रोकते अपने-अपने अंदर की रुलाई

हम हँस पड़े

इस तरह गले मिले

मैं लिए-लिए फिरता रहा उसे

मिलवाता एक-एक से, बताता जैसे सबको

देखो ऐसा होता है

बचपन का दोस्त।

तभी किसी सयाने ने ले जा कर अलग एक कोने में

कान में कहा मेरे

बस, बहुत हो गया, ये क्या बचपना करते हो

रिश्तेदारों पर भी ध्यान दो

लड़की वाले हो, बारात ले कर नहीं जा रहे कहीं।

फिर जरा फुसफुसाती आवाज में बोले

मंडप के नीचे लड़की का कोई मामा आया नहीं

जाओ, मनाओ उन्हें

और वे तुम्हारे बहनोई तिवारी जी

जाने किस बात पर मुँह फुलाए बैठे हैं।

तब टूटा मेरा ध्यान और यकायक लगा

कैसी होती है बासठ की उम्र और कैसा होता है

इस उम्र में तीसरी बेटी को ब्याहना।

खा-पी कर चले गए रिश्तेदार

मान-मनौवले के बाद बड़े-बूढ़े मानदान

ऊँचे घरों वाले चले गए अपनी-अपनी घोड़ा गाडि़यों

और तलवारों-भालों की शान के साथ।

बेटी को विदा कर रह गया अकेला मैं

चाहता था थोड़ी देर और रहना बिलकुल अकेला

तभी दोस्त ने हाथ रखा कंधे पर

और चुपचाप अपना बीड़ी का बंडल

बढ़ा दिया मेरी तरफ

और मेरे मुँह से निकलते-निकलते रह गया

अरे, तू कब आया?

 

जब कहीं चोट लगती है

जब कहीं चोट लगती है, मरहम की तरह

दूर छूट गए पुराने दोस्त याद आते हैं।

पुराने दोस्त वे होते हैं जो रहे आते हैं, वहीं के वहीं

सिर्फ हम उन्हें छोड़ कर निकल आते हैं उनसे बाहर।

जब चुभते हैं हमें अपनी गुलाब बाड़ी के काँटे

तब हमें दूर छूट गया कोई पुराना

कनेर का पेड़ याद आता है।

देह और आत्मा में जब लगने लगती है दीमक

तो एक दिन दूर छूट गया पुराना खुला आँगन याद आता है

मीठे पानी वाला पुराना कुआँ याद आता है

बचपन के नीम के पेड़ की छाँव याद आती है।

हम उनके पास जाते हैं, वे हमें गले से लगा लेते हैं

हम उनके कंधे पर सिर रख कर रोना चाहते हैं

वे हमें रोने नहीं देते।

और जो रुलाई उन्हें छूट रही होती है

उसे हम कभी देख नहीं पाते।

 

बच्चा

अलमुनियम का वह दो डिब्बों वाला

कटोरदान

बच्चे के हाथ से छूट कर

नहीं गिरा होता सड़क पर

तो यह कैसे पता चलता

कि उनमें

चार रूखी रोटियों के साथ-साथ

प्याज की एक गाँठ

और दो हरी मिर्चें भी थीं

नमक शायद

रोटियों के अंदर रहा होगा

और स्वाद

किन्हीं हाथों और किन्हीं आँखों में

जरूर रहा होगा

बस इतनी-सी थी भाषा उसकी

जो अचानक

फूट कर फैल गई थी सड़क पर

यह सोचना

बिल्क़ुल बेकार था

कि उस भाषा में

कविता की कितनी गुंजाइश थी

या यह बच्चा

कटोरदान कहाँ लिए जाता था

 


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हिंदी समय में भगवत रावत की रचनाएँ