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विमर्श

लखनऊ
अमृतलाल नागर


यशस्वी साहित्यकार अमृतलाल नागर की अमर कृति 'गदर के फूल' सत्तावनी क्रांति संबंधी स्मृतियों और किंवदंतियों का प्रामाणिक दस्तावेज है। भारत की स्वतंत्रता के लिए 1857 में क्रांति की एक चिनगारी भड़की थी जिसे अंग्रेजों ने 'गदर' का नाम दिया था। उस काल के व्यक्ति अब छीजते जा रहे हैं। उन्हीं स्मृतियों को नागर जी ने 'गदर के फूल' में सँजोया है। अवध में घूम-घूमकर, उस काल के प्रत्यक्षदर्शी लोगों के संस्मरणों के माध्यम से तथा अन्य उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों को आधार बनाकर नागर जी ने इस पुस्तक की सामग्री का संचयन किया है। यहाँ प्रस्तुत है गदर के फूल से एक बेहद महत्वपूर्ण अंश...

लेफ्टिनेंट मेजर मॅक्‍लाड ईनिस आर.ई.वी.सी. ने अपनी पुस्‍तक 'लखनऊ एंड अवध इन द म्‍यूटिनी' में उस समय के नगर की संक्षिप्‍त रूपरेखा प्रस्‍तुत की है और विशेष रूप से फूलों और मार्गों का उल्‍लेख किया है। पुराने लखनऊ के बने रंगीन और जानदार वर्णनों के रहते हुए भी मैंने ईनिस का रेखाचित्र ही काम का समझकर चुना है। ईनिस लिखता है :

"लखनऊ नगर लगभग साढ़े पाँच मील लंबा और ढाई मील चौड़ा है। यह विशेष रूप से गोमती के तट पर बसा है तथा अन्‍य तीन दिशाओं में एक बड़ी और गहरी नहर इसे घेरे हुए है। नगर के पश्चिमी भाग में घनी आजादी है, इसी प्रकार पूर्व की बस्ती में दक्षिणी अंश भी घना आबाद है। इसका उत्तरी पूर्वी भाग महलों बंगलों, कोठियों, उनके साथ लगे हुए बगीचों, मकबरों और कब्रों से भरा है। जहाँ नगर के पश्चिमी और पूर्वी अर्द्धांश विलग होते हैं, वहाँ गोमती पर एक पुराना पत्‍थरा का पुल है। उससे एक मील जागे नदी के बहाव की दिशा में अर्थात पूरब की और एक नया पुल लोहे का बना है। इन दोनों पुलों से होकर मंड़ियांव छावनी, जो उत्तर में दो मील दूर स्थिर है; आ-जा सकते हैं। दक्षिण में कानपुर मार्ग लोहे के पुल से आरंभ होकर, रेजिडेंसी के किनारे से होता हुआ चारबाग में नहर के ऊपर से होकर जाता है। मच्‍छी भवन और रेजिडेसी नदी के दक्षिण तट क्रमशः पत्‍थर के पुल और लोहे के पुल के एकदम निकट स्थिर है।"

ये सारे मार्ग आज से सौ और निन्‍यानबे वर्ष पूर्व, क्रांति के दिनों में अत्यंत महत्‍वपूर्ण रहे हैं। उन दिनों लखनऊ की शानदार इमारतों पर आमतौर से ध्‍यान नहीं जाता था; ये राहें ही देखी जाती थीं। उस समय की शानदार इमारतें खंडहर हो गईं, बहुत-सी नेस्‍तनाबूद हो गईं, मगर ये राहें अब भी चल रही हैं।


वाजिदअली शाह ने अपना तख्‍त व ताज गँवाकर कानपुर मार्ग से ही यह कहकर सफर किया था -

''दरो दीवार पे हसरत से नजर करते हैं।
     खुश रहो अहलेवतन हम तो सफर करते हैं।''

लेकिन अंग्रेजी अमल में अहलेवतन खुश न रह सके। 11 फरवरी, सन 1856 को, लखनऊ गजेटियर के अनुसार, अवध के कंपनी राज्‍य में मिला लिए जाने की घोषणा हुई। नवाबी सरकार के बड़े-बड़े हाकिम अमले नई व्‍यवस्‍था में सत्‍ताहीन हो गए; उनकी छातियों पर साँप लोटना स्‍वाभाविक था। नवाबी दरबार उजड़ा तो महाजनों-दुकानदारों का धंधा उजड़ गया; इनके पेट में चूहे कूदने लगे। शाही सेनाएँ तोड़ दी गई थीं, इसलिए शहरों में शोहदों का हंगामा भी बढ़ गया था।

प्रजा अंग्रेजों की न्‍याय-व्‍यवस्‍था से बुरी तरह चिढ़ती थी। वाजिदअली शाह के शासन-काल में ही अवध के रेजिडेंट कर्नल स्‍लीमैन ने अवध के उन भागों में, जो नवाब सआदत अली खाँ के समय में ही अंग्रेजी अमल में आ गए थे, नई न्‍याय व्‍यवस्‍था के प्रति प्रजा का असंतोष देखा था। वह लिखता है कि ''लोग या ज्यादातर लोग हमारे द्वारा शासित जिलों में रहने के बजाय अवध राज्‍य में रहना पसंद करते हैं। हमारे विभिन्‍न न्‍यायालयों की कड़ियों से होकर गुजरना, हमारे गुत्‍थीदार कानून से बँधना, हमारे न्‍यायालयों के घमंडी और लापरवाह अफसरों को, तथा मुकद्दमा लड़ाने के लिए उभयपक्षों की ओर से नियुक्‍त होनेवाले नए न्‍यायपंडितों की रिश्‍वतखोरी और अन्‍याय को बर्दाश्‍त करना, फिर पास हो जाने पर डिगरी करवाना उन्‍हें बड़ा परेशान करता है। अवध निवासियों के यदि वोट लिए जाएँ तो सौ में निन्‍यानबे लोग हमारी गुत्थियों वाली न्‍याय-प्रणाली के बजाय अपनी पुरानी प्रणाली के पक्ष में ही वोट देंगे।''

अंग्रेजी अमल आते ही तरह-तरह के टैक्‍सों की भरमार हो गई। खाने-पीने की चीजों के भाव टैक्‍स के कारण चढ़ गए। नवाबी लखनऊ को अफीम के दाम चढ़ जाना तो बेहद खला। धार्मिक दृष्टि से 'कदम रसूल' नामक पवित्र स्‍थल में अंग्रेजों द्वारा बारूद-भंडार (मेगजीन) स्‍थापित किया जाना भी लोगों के दिलों में आग लगा गया। पुराना राजा कैसा भी हो, अपना था। उसके महलों में नए शासकों को देख-देखकर जनता मन ही मन कुढ़ती थी। छतर मंजिल में गोरे साहब रहते थे, खुर्शीद मंजिल में उनकी भोजनशाला थी। चौपड़ अस्‍तबल में उन्‍होंने अपनी एक पल्‍टन रखी थी तो उसके आसपास के अच्‍छे मकान फौजी अफसरों के लिए ले लिए गए थे। तारा कोठी जिसमें आजकल स्‍टेट बैंक की स्‍थानीय शाखा है, वेधशाला से कचहरी बन गई। इसके आसपास की तमाम कोठियाँ बड़े-बड़े गोरे अफसरों ने हथिया लीं। आसफी दौलतखाना और शीश महल भी गोरी फौजों के अड्डे बन गए। इससे करीब ढाई-तीन मील आगे मूसाबाग में भी कंपनी की सेना रहने लगी। अंग्रेजों ने अपनी समझ से तो नगर को खूब घेर रक्‍खा था। उत्‍तर में शहर से ढाई-तीन मील दूर मंड़ियांव छावनी थी, उसके आगे मुदकीपुर में थी, शहर से सिकंदर बाग के पास चक्‍कर वाली कोठी में थी - फौजें कहाँ नहीं थीं? नगर की प्रजा को आतंकित किए रखने का पूरा प्रबंध था। अंग्रेजों से लखनऊ निवासी प्रसन्‍न नहीं थे। गाजीउद्दीन हैदर के समय लखनऊ की यात्रा करने वाले अंग्रेज महापादरी आर्कबिशप हेब्‍बर ने अपने यात्रा वृत्तांत में लिखा है कि अंग्रेजों को शहर में हाथी पर सवार होकर दस-पाँच सिपाहियों के साथ ही शहर में निकलना चाहिए, इक्‍का-दुक्‍का घोड़े पर सवार अंग्रेज यहाँ कत्‍ल कर दिए जाते हैं।

अंग्रेजी अमल होने पर शहर के अंदर लोगों ने अंग्रेजों को किराए पर मकान देने से इनकार कर दिया था। अफसरों ने परेशान होकर चीफ कमिश्‍नर हेनरी लारेंस से दरख्‍वास्‍त की और रहने की जगह पाने के लिए गोरों को कानून का कोड़ा चलाना पड़ा।

यह नगर की मनोदशा थी !

फरवरी सन 1857 ई. तक मौलवी अहमदुल्‍ला शाह भी लखनऊ में ही थे। वे घसियारी मंडी में रहते थे। लखनऊ के बहुत से बड़े-बड़े उन्‍हें आज भी डंकाशाह मौलवी के नाम से जानते हैं। सैयद कमालुद्दीन हैदर ने लिखा है कि 'नक्‍कारशाह' के नाम से मशहूर थे। हो सकता है कि पढ़े-लिखे शुरफा लोगों ने अपनी प्रांजल भाषा में डंके को नक्‍कारा पुकारना उचित मान अपने वर्ग में यही नाम प्रचलित कर लिया हो। शैदा बेगम ने जानेआलम वाजिदअली शाह को पत्र लिखते हुए शहर का, मौलवी साहब का हाल यों लिखा है : ''पिया जानेआलम, जबसे आप लखनऊ से सिधारे ख्‍वाब हराम है। रोना-धोना मुदाम है यहाँ शबोरोज अहोबुकां में गुजरती है, मगर दूसरी मेरी हमजिन्‍सें खुश-खुश इठलाती फिरती हैं। आपके बाद से फिरंगियों के खिलाफ जहर उगला जा रहा है। नई-नई बातें सुनने में आ रही हैं। दिल को हौल है कि देखिए फलक क्‍या-क्‍या रंग दिखलाता है। घास मंडियों में मौलवियों का जमाव है। सुना है कि एक सूफी अहमदुल्‍लाशाह आए हुए हैं। नवाब चीनाटीन के साहब‍जादे कहलाते हैं। आगरे से आए हैं। ये भी सुना है कि उनके हजारहाँ मुरीद हैं और वो पालकी में निकलते हैं। आगे डंका बजता होता है। पीछे अजदहाँ बड़ा होता है। वहशतनाक खबरों की गर्म-बाजारी है।'

मौलवी साहब के शिष्‍यों के संबंध में मैंने यह भी सुना है कि वे लोग भीड़ के सामने अंगारे चबाया करते थे, मौलवी साहब कहते थे कि जो आज अंगारे चबा रहे हैं कल वे ही आग उगलेंगे। उन्‍हीं को जन्‍नत मिलेगी। उनके चमत्‍कार, अमीरुज्जिनात के साथ उनका गठबंधन, अल्‍लाह के साथ उनकी बातें - कहते हैं रात के बारह बजे वे अपनी कोठरी बंद करके अँधेरे में बैठ जाते थे। फिर कोठरी में हजारों गैस बिजलियों को मात करने वाला खुदाई नूर फैल जाता था और बादल की घड़घड़ाहट, और बिजली की कड़क होती थी। ऐसे में मौलवी साहब की अल्‍ला मियाँ से बातें होती थीं। उनके खास-खास मुरीद दरवाजे के बाहर कान लगाए खड़े रहते थे और फिर सबको बताते थे।

फरवरी में मौलवी साहब फैजाबाद गए। श्री सुंदरलाल की 'भारत में अंगरेजी राज' पुस्‍तक के अनुसार 18 अप्रैल को नाना साहब अपने साथियों सहित लखनऊ आए थे। उनका बड़ा भव्‍य स्‍वागत हुआ। हर वर्ग के लोगों ने उनके स्‍वागत में सहयोग दिया। मैंने सुना है कि चौक के सर्राफों ने सोने के आभूषणों से सजे द्वार बनाए थे।

नाना साहब निःसंदेह यहाँ के हाल-चाल लेने, सूबेदारों से, पुराने राजवंश के लोगों से मिलने, क्रांति की योजना फैलाने ही आए होंगे। नाना यद्यपि यहाँ आकर अपनी नीति के अनुसार अंग्रेज हाकिमों से भी मिठबोला कर गए।

18 अप्रैल जो नाना साहब के भव्‍य स्‍वागत का दिन है, वही साह‍बे आलीशान चीफ कमिश्‍नर सर हेनरी लारेंस के अपमान का दिन भी है। साहबे आलीशान बग्घी पर सवार शाम की सैर को निकलते थे, किसी शहरी आदमी ने उन पर कीचड़ उछाली।

इससे कुछ दिन पूर्व छावनी में एक बड़ी घटना और हो चुकी थी। अप्रैल के प्रारंभ में 48वीं देशी पल्‍टन के अंग्रेज डाक्‍टर वेल्‍स अस्‍पताल का औषधि-भंडार देखने गए। उनकी तबीयत भी कुछ गड़बड़ थी, एक बोतल उठाकर मुँह से लगा ली और एक खुराक पीकर फिर डाट लगाकर वहीं रख दी। हिंदुओं में छुआछूत का इतना अधिक विचार था कि यह आंग्‍ल अविचार खुले विद्रोह का कारण बन गया। सिपाहियों ने कह दिया कि हम इन दवाओं को व्‍यवहार में नहीं लाएँगे। इसकी खबर कर्नल पामर को पहुँची। उन्‍होंने सब देशी अफसरों को बुलाया। उनके सामने वह बोतल नष्‍ट हो गई। डाक्‍टर वेल्‍स को सबके सामने खूब डाँटा। मगर तब भी संतोष नहीं हुआ। दो-तीन दिन बाद एक रात डॉक्‍टर का बँगला फूँक दिया गया। यह स्‍पष्‍ट होने पर भी कि काम 48वीं पल्‍टन का ही है, किसी को दंड नहीं दिया गया।

आटे में हड्डियों का चूरा मिला होने की अफवाह धीरे-धीरे पीछे से आने लगी थी।

फौज के देशी अफसर नवाब सआदत अली खाँ के पुत्र नवाब रुकनुद्दौला और वाजिदअली शाह के बड़े भाई मिर्जा मुस्‍तफा अली खाँ (पिता द्वारा नालायक साबित होकर ताजदार न होने के कारण नंगे सिर रहते और कहते थे कि जब पहनूँगा तो ताज ही पहनूँगा) से शाही वंश के संरक्षण और नेतृत्‍व करने की बातें चला रहे थे। पुलिस के जासूसों ने अंगरेज सरकार को इसकी रिपोर्ट भी दी थी।

अप्रैल का महीना लखनऊ में बड़ी सरगर्मी का रहा।

2 मई, सन 1857 ई. को मूसाबाग के सैनिक प्रशिक्षण केंद्र में 7वीं अवध इर्रेगूलर सेना के सामने वे कारतूस आए जिन्‍होंने मंगल पांडेय को स्‍वतंत्र सत्‍तावन का प्रथम स्‍वर प्रदान किया था।

7वीं इर्रेगुलर के अवधी जवानों ने नए कारतूस लेने से इनकार कर दिया। अफसरों ने उन्‍हें बहुत समझाया-बुझाया, मगर 'मर्ज बढ़ता गया, ज्‍यों-ज्‍यों दवा की।' एक भी जवान नई इन्‍फील्‍ड राइफलें और उनके दाँतों से खोले जाने वाले कारतूस लेने के लिए अपनी जगह से एक कदम आगे न बढ़ा। तब अनुशासन की सख्‍त कार्रवाई करने की धमकी दी गई। अब तक तो सैनिक मौन थे पर जब धमकियों की विवशता सीमा लाँघने लगी तो एक जवान दीवाना हो पंक्ति से बाहर निकलकर चिल्‍ला उठा, ''दीन ! फिरंगी के दीन से बचाओ।''

इस एक आवाज ने सनसनी फैला दी। वह सिपाही फौरन पकड़ लिया गया; और भी पकड़े गए। उन्‍हें लाइन से अलग कर औरों को 'डिस्‍पर्स' होने का आदेश दिया गया। एक हजार जवानों ने न तो उन्‍हें ही जाने दिया और न आप ही पंक्ति से हटे। एक हजार भाई इकट्ठा जीना-मरना चाहते थे - केवल तीस भाइयों को ही अलग ले जाकर मारा नहीं जा सकता था। उस समय सूबेदार, सिपाही हिंदू, मुसलमान - भारतीय मात्र एक था।

अब तो सैनिक अनुशासन की दृष्टि से बहुत ही बड़ी समस्‍या उपस्थित हो गई थी। कुछ बिचौलिए सामने आए, कहा, हुजूर समझाने-बुझाने का मौका दिया जाए। इससे हुजूर की लाज भी बच गई। दिन में दोनों ओर कल के लिए तैयारी होने लगी। सिपाही अपनी इस अवज्ञा का परिणाम जानते थे। अपनी तैयारी करते हुए उन्‍होंने हथियार और गोला-बारूद अपने अधिकार में कर लिए। इतना ही नहीं उन्‍होंने अपने से ऊँची मंड़ियांव की 48वीं रेजीमेंट के 'बड़े भाइयों' के नाम एक पत्र भी लिखा। स्‍वधर्म रक्षा के लिए अरदास की। 48वीं रेजिमेंट के एक सूबेदार, एक हवलदार और एक सिपाही ने, जिनके हाथ यह चिट्ठी लगी, सर हेनरी लारेंस के हाथों में उसे रख दिया। कुछ दिन पहले इसी 48 नंबर ने विद्रोह किया था।

दूसरे दिन हेनरी लारेंस गोरी पल्‍टन के 1500 सवार और तोपखाना लेकर पहुँच गए। चारों ओर से घेरकर इमारत पर तोपों की मार शुरू की। सिपाहियों ने समर्पण कर लिया। फौरन परेड की गई। अंग्रेजी तोपखाना उनके सामने लाया गया। गोला-बारूद भरकर ज्‍योंही एक सार्जेंट ने पलीता लगाया कि 7वीं अवध सेना के जवान हिल उठे। चारों ओर भगदड़ पड़ गई। सिपाही हथियार छोड़-छोड़कर भागे। कल्‍पना करता हूँ कि मूसाबाग की जगह-जगह से ध्‍वस्‍त चहारदीवारी में थर्राए हुए इनसान इधर-उधर बेतहाशा भाग रहे होंगे और अंग्रेज घुड़सवार उन्‍हें उसी तरह धर-धरकर दबोचते होंगे जैसे जंगल में जानवरों को शिकारी कुत्ते दबोचते हैं। एक हजार में 120 मर्द डटे रहे। उनसे हथियार गिरवाकर कानूनी खानापूरी की गई, अर्थात वह सेना भंग कर दी गई। उन 120 सिपाहियों में से कुछ छोड़ दिए गए, तीस को फाँसी की सजा दी और चालीस आदमियों को आजन्‍म की मशक्‍कत कैद। फाँसियाँ लक्ष्‍मणपटीले के पास मच्‍छी भवन के फाटक के सामने खुलेआम दी गईं। इनका फाँसी देने का तरीका भी घोर राक्षसी था। सुबह की फाँसी लगाई लाश दिन भर लटकी रहती, शाम को दूसरा कैदी लटकता, पहले की लाश जिसे दिन-भर चील गिद्ध नोच-नोचकर खाते भी थे, शाम को वहीं दफना दी जाती।

शहर की साँस - सलाख-सी खड़ी हो गई। लोगों के मुँह से आपस में बात करते भी बोले नहीं फुटते थे। एक बार तो ऐसा आंतक बैठ गया कि अंग्रेजों का मर्दार हेनरी लारेंस भी स्‍वयं अपने रौब को देखकर सकुचा गया। उसने देखा कि चारों ओर अंग्रेजों का भय आवश्‍यकता से बहुत अधिक बढ़ गया तो उसे जरा कम करने के लिए उपाय सोचने लगा। इसी बीच 13 नंबर पल्‍टर के एक सिपाही ने बड़ी मुस्‍तैदी से शहर के उन तीन व्‍यक्तियों को गिरफ्तार करा दिया जो उसे एक षड्यंत्रकारी कार्य में सम्मिलित करना चाहते थे। सर हेनरी लारेंस अपनी इन दो सेनाओं के ऐसे जवानों से बड़ा प्रसन्‍न हुआ। जनता में विशेष रूप से भारतीय सैनिकों में आश्‍वासन जगाने के लिए सर हेनरी ने एक दरबार कर स्‍वामिभक्‍त सैनिकों को पुरस्‍कृत करने का विचार मन से धारण कर तदनुसार घोषणा भी करवा दी।

12 मई को दरबार हुआ। सब मुल्‍की और जंगी अफसर आए। शहर के बड़े बड़े लोग बुलावा पाकर आए। सेना के भारतीय अफसरों को भी बैठने के लिए कुर्सियाँ दीं। सर हेनरी ने खालिस हिंदुस्‍तानी जबान और इंगलिस्‍तानी लहजे में स्‍पीच दी। सर हेनरी ने कहा कि पहले जमाने में आलमगीर ने और फिर हैदर अली ने हजारों की संख्‍या में हिंदुओं को मजबूरन मुसलमान बनाया। उनके मंदिरों को तोडा, घरेलू मुर्तियों को नष्‍ट किया। अपने ही जमाने को लीजिए, इस जलसे में शरीफ होने वाले ज्‍यादातर साहबान यह अच्‍छी तरह से जानते होंगे कि रंजीत सिंह ने अपनी मुसलमान रियाया को उनके मजहबी हुकूक नहीं दिए, लाहौर की मस्जिदों की मीनारों से मुअज्जिन की अजान कभी नहीं सुनाई पड़ती थी। एक साल पहले तक लखनऊ में कोई हिंदू शिवाला बनवाने की जुरअत नहीं कर सकता था। कंपनी बहादुर की सरकार आप लोगों के साथ माई-बाप जैसा बरताव रखती है। हिंदू और मुसलमानोंके साथ एक-सा इनसाफ होता है।

इस तरह की स्‍पीच देकर सर हेनरी ने 48वीं और 13वीं रेजीमेंटों के सूबेदार सेवक तिवारी, हवलदार हीरालाल दुबे, सिपाही रामनाथ दुबे और सिपाही हुसैनबख्‍श को स्वामिभक्ति के पुरस्‍कारस्‍वरूप खिलअतें और थैलियाँ भेंट कीं। दरबार बरखास्‍त होने पर अंग्रेज और देशी अफसर छोटी-छोटी मंडलियों में बातें करने लगे। बहुत से देशी अफसरों ने सर हेनरी की स्‍पीच ओर हुजूर कंपनी बहादुर की इनसाफपसंदी की दाद देते हुए अपनी राजभक्ति का प्रमाण दिया। मगर आमतौर पर भारतीय सेना का रुख न बदला।

यह आश्‍चर्य की बात है कि जिस 48वीं पल्‍टन में अप्रैल में सबसे पहले विद्रोह का स्‍वर मुखर किया, उसी ने मई में अपने भूसाबाग के भाइयों का पत्र पकड़वा दिया। इस स्वामिभक्ति के लिए उसे 12 मई को पुरस्‍कार मिला; 13वीं पल्टन वाले ने भी इनाम पाया, फिर उन्‍होंने ही 30 मई को मंड़ियांव छावनी में विद्रोह किया और फाँसी पाई। तो क्‍या इन रेजीमेंटों ने किसी नीतिवश 7वीं इरेंगुलर का पत्र और क्रांतिकारियों के दूतों को पकड़वा दिया था? यह हो सकता है; अगर सेना ने सार्वभौमिक विद्रोह करने के लिए कोई तिथि निश्चित कर रक्‍खी थी तो उसके पहले अंग्रेजों को आखिरी दम तक धोखे में रखने के लिए नीति-वश भी राजभक्ति का प्रदर्शन किया जा सकता है। मगर यहाँ फिर एक प्रश्‍न यह उपस्थित होता है कि राजभक्ति के प्रदर्शन के लिए क्‍या अपने एक हजार तीन भाइयों का गला फँसा देना उचित था? सूबेदार तिवारी, हवलदार दुबे और हिंदू-मुसलमान सिपाही यह तो अच्‍छी तरह जानते होंगे कि अंग्रेज हाकिम 7वीं इरेंगुलर के सिपाहियों और षड्यंत्रकारी नागरिकों को कड़ी से कड़ी सजा देंगे। हो सकता है, उन्‍होंने इतने भयंकर दंड की कल्‍पना न की हो या उनकी धारणा यह रही हो कि कुछ लोगों को दंड मिलने से अधिक लोगों में स्‍वतः बड़ी उत्तेजना फैल जाएगी।

जो हो, गदर संबंधी साहित्‍य पढ़ते हुए जगह-जगह इस बात के प्रमाण मुझे मिले हैं कि विद्रोह के आरंभ में जगह-जगह भारतीय सिपाहियों ने प्रायः सविनय अवज्ञा की की थी। उनका व्‍यवहार आरंभ में अधिकतर अहिंसात्‍मक की रहा था। गोले-गोलियों के सामने अंगद की तरह अडिग खड़े रहनेवाले वे एक सौ बीस वीर सत्‍याग्रही उस सत्‍याग्रही भारत के पुरखे थे जो वर्षों बाद गांधी नेतृत्‍व के सामने आने वाला था। हिंसा का दोष अंग्रेजों को ही दिया जाएगा। अहिंसा के उत्तर में सर हेनरी लारेन्‍स ने जो राक्षसी तांडव दिखलाया, उसकी प्रतिक्रिया में त्रस्‍त और उत्तप्‍त भारतीय हृदयों में प्रतिहिंसा की आग यदि भड़की तो उसके लिए उन्‍हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। हाँ, इसी दृष्टि से मैं डा. बेल्‍स का बँगला जला देने को भी बुरा मानता हूँ - पर हमें ईंट को जवाब पत्‍थर ही नहीं पहाड से दिया गया।

खैर, इसी तरह लखनऊ नगर, उसके आसपास कस्‍बों और छावनियों में दिन पर दिन गर्मी और तेजी से बढ़ती ही गई। हर हिंदुस्‍तानी के चेहरे पर षड्यंत्रकारिता का गुपचुपवाला भाव और कसाब देखने को मिलता था। लोगों की आँखों में क्रांति की चिनगारियाँ चमकती थीं। हालाँकि आमतौर पर यह कोई न जानता था कि क्रांति कब होगी, कैसे होगी - क्‍या होगा? छावनी में बँगलों पर बाणों के साथ जलते पलीते फेंके जाने लगे। शहर में जगह-जगह इश्तिहार चिपकाए जाने लगे कि दीन धर्म के शत्रुओं - फिरंगियों - को मारना हर हिंदू-मुसलमान का मजहबी फर्ज हैं।

अंग्रेजों में सर हेनरी लारेंस बड़ा चतुर और दूरदर्शी कमांडर था। मेरठ, दिल्‍ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई नगर और जिले स्‍वतंत्र हो चुके थे; लखनऊ के रंग-ढंग अच्‍छे नजर नहीं आते थे। भारतीय फौजों का रुख भी समझ में नहीं आता था। यह सब देखकर सर हेनरी ने अपनी सैनिक शक्ति को नए सिरे से संगठित किया। मच्‍छी भवन का किला पाँच दिन में दिन-रात मरम्‍मत लगाकर युद्ध के अनुकूल बनवाया, रेजीडेन्‍सी पर मोर्चे बनाए, दोनों जगहों के आसपास इमारतें तुड़वा दीं। अच्‍छे-अच्‍छे पेड़ कटवाकर मैदान साफ कर लिए, तोपें चढ़ा दीं और बाजार से बेतहाशा अन्‍न-धान आदि दैनिक आवश्‍यकता की सामग्री खरीदना शुरू कर दिया। उन दिनों सर हेनरी को बस एक ही धुन चढ़ी हुई थी, जो भी हिंदुस्‍तानी रईस अपनी खैरख्‍वाही जताने के लिए चीफ कमिश्‍नर और कमांडर सर हेनरी लारेन्‍स के पास आता और चलते वक्‍त अपने लायक खिदमत पूछता, उसी से वे घी, गेहूँ अनाज आदि की फरमाइश कर बैठते थे।

26 मई को मलीहाबाद वालों ने एक उम्‍दा मजाक किया। सर हेनरी के पास खबर पहुँची कि मलीहाबाद सरकश हो रहा है। सर हेनरी ने कप्‍तान बेस्‍टन के नेतृत्‍व में पल्‍टन भेजी। पल्‍टन के नजदीक पहुँचते ही महिलाबाद में चारों ओर अपूर्व शांति छा गई। फौजवालों को कहीं इस बात का अनुभव ही हो पाया कि यहाँ कहीं अशांति के लक्षण प्रगट ही रहे है - किस पर गोली चलाते? किसकी पकड़ा-धकड़ी करते? झक मारकर लौट आए।

मई के अंतिम दिनों में ही सर हेनरी लारेन्‍स ने शहर के अनेक अमीर और उमरा और महाजनों की बुलवाया। अर्थ कमिश्‍नर मार्टिन गबिन्‍स के पास भी कई पैसेवाले लोग पहुँचे। नवाब अहमद खाँ, मुनौवरुद्दीला, वाजिदअली शाह के चचिया ससुर मिर्जा हुसैन खाँ, इकरामुद्दौला, भूतपूर्व मंत्री मुहम्‍मद इब्राहीम शरफुद्दौला, बहू-बेगम के पोते मिर्जा हैदर, गुलाम रजा, नवाब मु‍हसिनुद्दौला, भूतपूर्व दीवान बालकृष्‍ण, नवाब मुमताजुद्दौला आदि जितने औले-औले थे, वे सब अंग्रेज सरकार माई-बाप के पास पहुँचे। नगर के कई एक महाजन भी अपनी सुरक्षा का प्रबंध करवाने की दरख्‍वास्‍त लेकर गए। अंग्रेजों ने इन लोगों की सुरक्षा के लिए सिपाही रखने की सलाह दी।

24 मई, ईद का दिन था, अंग्रेज उस दिन यहाँ गड़बड़ी होने की आशंका कर रहे थे, परंतु कुछ न हुआ। फिर भी हवा में सनसनी रोज-बरोज बढ़ रही थी। मंड़ियांव छावनी के गोरे, विशेष रूप से सर हेनरी लारेन्‍स से सतर्क थे।

भारतीय सिपाही भी पूरी तैयारी पर थे। उनका संकेत बँध चुका था। 30 मई को रात 9 बजे तोप के दगते ही रात की हाजिरी के लिए परेड में उपस्थित सिपाहियों ने गोलियाँ दागनी शुरू कर दी। गबिन्‍स लिखता है: ''रात की तोप दगते ही 71वीं देवी पल्‍टन की लाइट कंपनी के सिपाहियों ने गोलियाँ दागनी शुरू कर दीं, और लगभग चालीस आदमियों की एक टोली रेजीमेंट के भोजनालय की और बढ़ी ज्‍यों ही उन्‍होंने छावनी के फाटक में प्रवेश किया, 7वीं लाइट घुड़सयारों की एक टुकड़ी फाटक को भी घेर लिया। इस प्रकार यह दिखला दिया कि अफसरों का नाश करने की योजना सोच-समझकर बनाई गई थी। परंतु अफसर वर्ग सावधान था, पहली गोली की आवाज पर ही वह भोजनालय छोड़कर जा चुका था। नंबर 71 का भोजनालय नष्‍ट कर डाला गया।

सर हेनरी लारेन्‍स बहुत होशियार और दूरदर्शी व्‍यक्ति थे। बहुत पहले से ही उन्‍होंने तोपखाना देशी लोगों से ले लिया था। जब विद्रोह मूर्तिमान हुआ तो कई अंग्रेज अफसर अपने मातहत सिपाहियों को समझाने-बुझाने के लिए बाहर निकल आए परंतु उस समय किसी का वश नहीं चल पाता था। सर हेनरी ने तोपों की मार शुरू की। साधारण हथियारों वाले सैनिक भला इस मार के आगे कैसे ठहरते? वे भागे; परंतु भागना कोरा घबराहट का भागना नहीं मालूम पड़ता क्‍योंकि अधिकतर लोग मुदकीपुर की ओर भागे थे। मुदकीपुर में भी एक छावनी थी। वहाँ भी रात-भर जोश गरमाता रहा। दूसरे दिन सुबह सात नंबर का रिसाला मुदकीपुर भेजा गया। रिसाले को दूर से आते देख एक विद्रोही सूबेदार ने अपनी तलवार ऊँची उठाई। यह देख आती हुई फौज के कुछ आदमी भी निकलकर देशभक्‍तों की पंक्ति में खड़े हो गए। कुल मिलाकर एक हजार स्‍वदेशी दल के लोग वहाँ मौजूद थे। वे भले ही बहुत बहादुरी से लड़े, परंतु सर हेनरी की भारी तोपों की मार से उनका मुकाबला अधिक देर तक होना असंभव ही था। स्‍वदेशी दल को मोर्चा छोड़कर भागना पड़ा। हेनरी लारेन्‍स ने उनका पीछा किया। उन्‍होंने घोषणा की कि जो व्‍यक्ति विद्रोहियों को गिरफ्तार या कत्‍ल करेगा उसे आदमी पीछे सौ रुपया इनाम दिया जाएगा। कुछ देश-भक्‍त वीर पकड़े गए, अनेक मारे भी गए।

सेना के इस आंदोलन का प्रभाव नगर के लोगों पर भी स्‍वाभाविक रूप से पड़ा। सैयद कमालुद्दीन हैदर, जो पहले अवध की शाही सरकार के नौकर और बाद में अंग्रेज सरकार के पेन्‍शनर रहे, अपने इतिहास ग्रंथ 'सवानहाल-ए-सलातीन ए-अवध' में लिखते हैं, ''इस अरसे में मफदीन ने शहर में तरफ हंगामा बरपा किया, और शरीफ सिपाही बागी हुए। मुहल्‍ला मन्‍सूर नगर, सआदतगंज मशक-गंज से निशान मुहम्‍मदी उठाकर ऐशबाग में जमा होना शुरू किया। सैकड़ों ने छावनी की राह ली कि हम फौज में जाकर शरीक होंगे। जब खबर सबके भागने की सुनी, हर तरफ अपनी राह ली... आगा मिर्जा एक शख्‍स मशहूर कंबलपोश... उस दिन से हर तरफ लोगों को गैरत दिलाकर भड़का रहा था। सरचंद्र पेश्‍तर एक खुदा तरस ने उसे समझाया था कि तुम कभी ऐसी हरकत न करना, मगर वह कब सुनाता था... वजह इसकी यह थी कि एक कुत्ता आगा मिर्जा का साहब ने मार डाला था। साहब ने भी जवाब सख्‍त दिया, गोली खाली गई। आगा मिर्जा और उसके साथियों ने घर में घुसकर उसे मार डाला, घर-असबाब लूट लिया; यह पहल हुई। छोटे खाँ एक रंगपोश साकिन दोगावाँ व एवजअली वगैरह बदमाश और ऐसे ही बा शोरिश शामिल किए गए।''

ऐशबाग से एक बहुत बड़ी भीड़ छावनी की ओर चली। बड़ी बेतरतीब भीड़ थी। लड़ने का साजो-सामान भी पास न था। भाले, तलवारें, कटारें, लाठियाँ, टोपीदार बंदूकें - जो जिसके पास था वह लेकर चल दिया। इस भीड़ में व्‍यवस्थित सैनिक केवल दो सौ थे। सैयद कमालुद्दीन हैदर साहब ने इन्‍हें बदमाशों की भीड़ लिखा है। प्रमाणों के अभाव में यह कैसे कहूँ कि ये बदमाश नहीं थे; परंतु सन 1942 ई. की जन-क्रांति जगाने वालों को भी तत्‍कालीन सरकारी विज्ञापनों में गुंडों और लुटेरों के लकब से संबोधित किया गया था। कमालुद्दीन के इतिहास-ग्रंथ का कमाल यह है कि वे अवध के बादशाहों के नाम पर दरअसल 'साहब ने आलीशान' अर्थात् अंग्रेजों की प्रशस्तियों का पोथा है। सत्‍तावनी क्रांति का स्‍वदेशी रूप कमालुद्दीन को सख्‍त नापसंद था। 'बेगमाते अवध के खूतूत' से भी यह जाहिर होता है कि बहुत-सी बेगमों को इस हौलनाक हंगामे से चिढ़ थी। लखनऊ के पुराने नवाब वंश के वर्तमान बुजुर्गों से मिला हूँ, अधिकतर बुजुर्ग 'सत्‍तावनी बलवे' से चिढ़े नजर आए। इसलिए मैं सैयद कमालुद्दीन साहब पर यह दोष तो नहीं लगाता कि अंग्रेजों की पेन्‍शन खाने के कारण ही उन्‍होंने स्‍वातंत्र्य संग्राम में सम्मिलित होने वाली भीड़ को बदमाशों की भीड़ कहा; पर यह अवश्‍य मानता हूँ कि किसी भी क्रांति में आगे बढ़कर हिस्‍सा लेने वालों में सबसे आगे वह सर्वहारा वर्ग ही होता है, जिंसे हम सफेदपोश असभ्‍य, गुंडा, आबारा, बदमाश आदि नामों से पुकारते हैं। इसे क्रांति की मजबूरी समझिए या विशेषता, कि वह उच्‍च माने जाने वाले उदारचेता मनुष्‍यों के मस्तिष्‍क से उदय होती है और असभ्‍य माने जानेवाले निम्‍न वर्ग के सहयोग से ही कार्यान्वित है। उसकी सफलता-असफलता की बात न्‍यारी है।

खैर, ये मुजाहिदीन नारे लगाते इमामबाड़े की दीवार के नीचे से गुजरते हुए गऊघाट पहुँचे। वहाँ से गोमती पार कर मंड़ियांव गए। मंड़ियांव में धरा ही क्‍या था? लौटे तो हुसैनाबाद में अटके। पहले तो सब्जी वालों को लूटा, कच्‍चे शाकों से भूख मिटाई; फिर पहरेदार बरकंदाजों से उलझते, उनके हथियार छीने; फिर हुसैनाबाद के दौलतखाना आसफी के देशी तिलंगों को ललकारा और फिर जोशे जेहाद में आखिर भिड़ ही गए। नतीजा जो चाहिए था वही हुआ, यानी भीड़ बुरी तरह मारी गई। बहुत-से लोग इमामबाड़े में घुस गए। वहाँ गोरों ने घुसकर कत्‍लेआम मचाया।

दो दिनों तक शहर में ये मुजाहिदीन अंग्रेजी राजा के विरुद्ध विद्रोह करते रहे।

2 जून को कारनेगी साहब फौज लेकर मंसूरनगर गया, दूसरे मुहल्‍लों में भी पकड़ा-धकड़ी जोर से शुरू हुई। मैं अपनी स्‍मृति से एक पुरानी सुनी हुई बात यहाँ नोट कर रहा हूँ - मैंने सुना था कि गोरे हर किसी को पकड़कर फाँसियाँ देते थे। अब यह तो नहीं कर सकता कि यह घटना लखनऊ की पराजय होने के बाद कत्‍लेआम के समय की है अथवा पहले की; परंतु जहाँ तक मेरा अनुमान है, सार्वजनिक फाँसियों के इसी दौर में अंग्रेजों के द्वारा यह अन्‍याय हुआ होगा। जो हो, फाँसियों का वही राक्षसी कृत्‍य फिर से दुहराया गया। लक्ष्‍मण टीले, अकबरी दरवाजे और भी दो-चार जगहों पर फाँसी लगाने का कार्यक्रम उसी घृणित तरीके से चलने लगा।

11 और 12 जून को क्रमशः मिलिटरी पुलिस के सवारों और पैदलों ने विद्रोह किया। गोरों के बँगले लूटे-फूँके और चल दिए। इनका पीछा किया गया। मुँह मेल लड़ाई हुई। उसके बाद ये सिपाही नानाराव की सेवा में चले गए।

अंग्रेजों द्वारा इतनी बर्बरता प्रदर्शन होने पर भी अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय सेनाओं को भड़काने का काम जारी था। काकोरी के मुंशी रसूलबख्‍श और उनके बेटे हाफिज जी स्‍वदेशी दल में छिपे तौर पर मिल जानेवाले सैनिकों की मार्फत अंग्रेज पक्ष की भारतीय सेनाओं में विद्रोह की आग भड़का रहे थे। एक दिन हुसैनाबाद के तालाब के पास एक शहतूत के पेड़ के नीचे, मुंशी जी के भेजे हुए दो व्‍यक्त्‍िा नादरी पल्‍टन के सूबेदार करम खाँ को समझा-बुझा रहे थे। सूबेदार ने देखा कि कोई व्‍यक्ति सुन रहा है। उसने डरकर साहब से रिपोर्ट कर दी। दूसरे दिन जब वे दोनों व्‍यक्ति सूबेदार के पास आए तो सूबेदार उनके नेता से बात करने के बहाने उनका घर देखने चला। जासूस भी पीछे-पीछे था। दोनों व्‍यक्ति सूबेदार को राजा टिकैतराय के बाजार में राजा हुलासराय के यहाँ ले गए। मुंशी जी, उनके बेटे और दो-एक लोग वहाँ बैठे थे। एक वृद्ध सज्‍जन मीर खलील अहमद भी यों ही आकर बैठ गए थे। मकान के पड़ोस में ही काशी के किन्‍हीं संकठा प्रसाद खत्री की बारात भी टिकी हुई थी। जासूस द्वारा स्‍थान देख लिए जाने पर मेजर कारनेगी और महमूद खाँ कोतवाल ने ससैन्‍य आकर पूरा इलाका घेर लिया। बराती भी पकड़े गए। बाद में लक्ष्‍मण टीले के सामने मुंशी रसूल बख्‍श, उनके पुत्र, मीर अब्‍बास थानेदार और इनके साथ बेचारा बेगुनाह वृद्ध मीर खलील अहमद भी फाँसी पर लटका दिया गया। काशी के बराती बाद में छोड़ दिए गए। मुंशी जी की फाँसी का बदला मलीहाबाद वालों ने लिया।

यह पहले ही कहा जा चुका है कि भारतीय फौजी अफसर लखनऊ के शाही वंश से अंग्रेज सरकार विरोधी सैनिकों के संरक्षण की बात चला रहे थे। पुलिस को इसकी सूचना भी मिल चुकी थी। अंग्रेज सरकार ने शाही मंसूरियां वंश के वयोवृद्ध, नवाब सआदत अली खाँ के पुत्र नवाब मुहम्‍मद हसन खाँ रुक्‍नुद्दौला तथा वाजिदअली शाह के बड़े भाई मिर्जा मुस्‍तफाअली खाँ को बंदी बना लिया। दिल्‍ली के शाही घराने के मिर्जा हैदर शिकोह और मिर्जा हुमायूँ शिकोह को, जो काफी अरसे से लखनऊ में ही रहते थे, दूसरे दिन कैद कर लिया गया। इन सबको मच्‍छी भवन में रक्‍खा गया। तुलसीपुर का जवान राजा कुछ अरसे से बेलीगारद में नजरबंद था, उसे भी वहाँ पहुँचा दिया गया। मच्‍छी भवन रेजिडेंसी की अपेक्षा अधिक सुरक्षित था। इसीलिए अंग्रेजों ने अपना खजाना, बारूद भंडार, महत्‍वपूर्ण कैदी आदि वहीं रखे। जिस भूमि पर आज मेडिकल कॉलेज, अस्‍पताल और होटल इत्‍यादि बने हैं; वहाँ सौ वर्ष पहले सदियों पुरानी गढ़ी लखना उर्फ मच्‍छी भवन की इमारत विद्यमान थीं।

इस प्रकार शहर में अंग्रेजों ने फिर से अपना आतंक जमा दिया, परंतु इस बार सख्तियों के बावजूद आग बुझ न सकी।

30 से जो लखनऊ में सैनिक विद्रोह आरंभ हुआ तो अवध में जगह-जगह आग भड़क उठी। सीतापुर, मुहम्‍मदी, औरंगाबाद, सेकरौरा, गोंडा, बहरा-इच, मल्‍लापुर, फैजाबाद, सुल्‍तानपुर, सलोन, बेगमगंज दरियाबाद - सभी जगह अंग्रेज स्त्रियों, बच्‍चों और पुरुषों को बड़े-बड़े संकटों का सामना करना पड़ा। अवध का कोना-कोना अंग्रेजों की प्रभु-सत्ता से मुक्‍त हो गया था, केवल उसकी राजधानी-लखनऊ पर उनका कब्‍जा था परंतु यह कब्‍जा एक तरह से बेमानी था। अंग्रेज अपने बचाव की चिंता में ही इतने डूबे हुए थे कि उन्‍हें शहर के शासन-प्रबंध की ओर कदाचित आँख उठाकर देखने का अवकाश भी न था। विद्रोही सेना के बेकार तिलंगे ऊधम मचा रहे थे। उनकी लूट-पाट से नागरिक दुखी थे।

25 जून को लखनऊ के अंग्रेजों ने भी लंबा हाथ मारा। शाही जमाने में अलीरजा खाँ शहर लखनऊ का कोतवाल था। वाजिदअली शाह के विश्‍वास-पत्र व्‍यक्तियों में उसकी गिनती होती थी। अंग्रेजी अमल होते ही उनका खैरख्‍वाह बनने में उसे उतनी देर भी न लगी जितने में गिरावट अपना रंग बदलता है। अंग्रेजी राज में अलीरजा खाँ डिप्‍टी कलक्‍टर बना दिया गया था। उसने फाइनेंस कमिश्‍नर मार्टिन गबिन्‍स को कैसरबाग के गुप्‍त शाही खजाने का पता दे दिया। फौरन ही मेजर बैक्‍स ने फौज के साथ जाकर घेर ली। तेईस बहुमूल्‍य शाही ताज, बेनिस और स्‍पेन के बने कीमती आभूषण, नायाब हीरे-जवाहरात के बाईस संदूक, रत्‍नजटित सिंहासन आदि करोड़ों का धन अंग्रेज लूटकर ले गए।

इस बीच अवध ही नहीं उत्तराखंड में क्रांति की ज्‍वाला भड़क चुकी थी - कहीं अत्‍याधिक, कहीं कम, कहीं और कम। आजमगढ़, गोरखपुर शाहजहाँपुर और कानपुर जो अवध के आसपास पूरे जोश पर थे। अवध की सेनाएँ यत्र-तत्र से आकर नवाबगंज बाराबंकी में एकत्र हुई। 28 जून को ही उन्‍नाव जिले के डौंलिया खेड़ा में अंग्रेजों की नाव रेत में फँस गई। राव रामबख्‍श के सिपाहियों ने उनको घेरा और कइयों को मार डाला।

लखनऊ के अंग्रेजों को चारों ओर से बुरी-बुरी खबरें ही मिल रही थी। इनकी डाक व्‍यवस्‍था तो 10 जून के बाद ही समाप्‍त हो गई थी परंतु इनके जासूस अच्‍छा काम कर रहे थे।

29 जून को स्‍वदेशी सेनाएँ लखनऊ से लगभग छह सात मील की दूरी पर चिनहट में आकर जमा गई। मलीहाबाद के अफ्रीदी भी आकर मिल गए। यह खबर मिलते ही सर हेनरी ने तुरंत अपनी सेनाओं को कूच का आदेश दिया। स्‍वदेशी दल की सेनाओं के नगर में प्रवेश करने से पूर्व सर हेनरी उन्‍हें युद्ध देकर नगर के भाग्‍य का निर्णय कर लेना चाहते थे।

स्‍वदेशी दल की सेनाओं के कमांडर बरकत अहमद थे। चिनहट की ऐतिहासिक जीत का सेहरा इन्‍हीं के सिर बँधा। सूबेदार शहाबुद्दीन और सूबेदार घमंडी सिंह की सेनाएँ भी बड़ी बहादुरी से लड़ीं। इस युद्ध में अंग्रेज-परस्‍त सेनाएँ ऐसी घिरी कि उन्‍हें छठी का दूध याद आ गया। शत्रु रण क्षेत्र छोड़कर भागे, उनकी चार तोपें और बहुत-सा गोला-बारूद स्‍वदेशीदल के हाथ लगा।

चिनहट की जीत का समाचार पाते ही दौलतखाना की इरेंगुलर पल्‍टनों तथा इमामबाड़े की मिलटरी पुलिस ने विद्रोह कर अपने गोरे अफसरों का मालमत्ता लूट लिया।

विजयी स्‍वदेशी सेनाओं ने अंग्रेजों की खदेड़ना शुरू किया। लोहे के पुल तक अंग्रेज सैनिक बेतहाशा भागते ही चले गए। वहाँ रेजिडेंसी की तोपों ने बिकट मार मारी। पत्थर वाले पुल के पास स्वदेशी सैनिकों को मच्छी भवन की तोपों का सामना करना पड़ा। स्‍वदेशी सेनाओं ने भी अपनी तोपों के मोर्चें साधे। देखते-देखते ही स्‍वदेशी सेनाएँ सारे नगर पर छा गई। कोठी फरहत बख्‍श, छतर-मंजिल, बादशाह बाग, शाद मंजिल, खुर्शीद मंजिल, मुबारक मंजिल, कोठी रसद-खाना, हजरतगंज, दिलकुशा, मुहम्‍मद बाग, आसफी इमामबाड़ा - जिधर देखिए उधर ही विजयोल्‍लास मग्‍न भारतीय सैनिक दिखलाई पड़ रहे थे। जब कोठी फरहत बख्‍श और छतर मंजिल में पड़ाव डाला तो बेगमों में खलबली पड़ी, बड़ी हाय-तोबा मची। सिपाहियों ने कहा कि आप लोग न घबराएँ, हम सुबह होते ही यहाँ से चले जाएँगे।

रेजिडेंसी घिर चुकी थी। उसके आसपास के घरों में घुस, दीवारों में बंदूक के लिए छेद बनाकर रात होने के पहले ही सिपाही रेजिडेंसी में गोलियाँ बरसाने लगे। रेजिडेंसी में तो चिनहट की हार के समाचार आते ही बेतहाशा भगदड़ और कोहराम मच गया था। अंग्रेज जन-समूह प्राणों के भय से बावला हो गया था, जो ऐसी दशा में किसी के लिए भी स्‍वाभाविक है।

दूसरी ओर जीत की खुशी में जनता का मनमाना हो जाना भी स्‍वाभाविक है। दूसरे दिन सुबह अर्थात 1 जुलाई सन 1857 के दिन सबेरे ही लोगों को खबर लगी कि कोतवाली इमामबाड़ा और मुसाफिर खाना वगैरह सरकारी जगहों के रखवाले सिपाही इत्‍यादि जाग गए हैं, सरकारी माल-असबाब, हरबे-हथियार सब कुछ खुला पड़ा है। खबर मिलने की देर थी, फैलते देर न लगी और थोड़ी देर में जनता शिवजी की सेना-सी इन जगहों पर चढ़ दौड़ी। सरकारी सामान की लूट-पाट, फेंक-फाँक, तोड़-फोड़ शुरू की। यह देख : ''इन शोहदों में से रूमी दरवाजे के एक शोहदे ने अपने खास की गाली देकर ललकारा, तुम लूट न मचाओ, यह तोपें खींचकर मच्‍छी भवन पर लगाओ, इसमें हम तुम सब का बड़ा नाम होगा। सभी ने कबूल किया।''('सवानहात-ए-सलातीन अवध' से)

तोप लगाई गई। कुछ सिपाही चिनहट की लूट में कुछ गोले पा गए थे। वे भी इस भीड़ के स्‍वतंत्रता-संग्राम में शामिल हो गए। दो तोपें नक्‍कारखाने के कोठे पर लगाई गईं। दुकानदारों के तखत उठाकर उनकी झाँकियाँ बनाईं और बाढ़ें दगने लगीं। मच्‍छी भवन से तोपें पड़ती थीं, खाली जाती थीं। यह देख जनता के हौसले बढ़ गए लोगों ने रूई की बहुत-सी गाँठें इकट्ठा कीं और उनमें आग लगाकर आधी रात में मच्‍छी भवन के फाटक को जलाने का आयोजन किया।

परंतु आधी रात को मच्‍छी भवन के संबंध में अंग्रेज कमांडर सर हेनरी लारेंस भी एक योजना बना चुके थे। सर हेनरी ने देखा कि दो-दो जगहों पर घिरकर अंग्रेज तबाही के सिवा और कुछ भी हासिल न करेंगे, इसलिए कर्नल पामर को वह मच्‍छी भवन स्थित सेना, खजाना, स्‍त्री-बच्‍चे, कैदी आदि लेकर आधी रात में रेजिडेंसी चले आने का आदेश भेजना चाहते थे। परंतु कोई साधन न था। एक आदमी को एक हजार रुपये इनाम देकर भेजा भी, पर वह शायद मारा गया। सेमाफोर द्वारा बार-बार संकेतादेश भेजे गए। बार-बार संकेतों द्वारा यह आदेश दुहराया जाता कि आधी रात के समय अनावश्‍यक सामान छोड़कर तथा बारूद-भंडार में आग लगाकर चले आओ। सर हेनरी को विश्‍वास नहीं था कि उनका आदेश कर्नल पामर को मिल गया होगा, परंतु अंग्रेजों के भाग्‍य से पामर ने सूचना प्राप्‍त कर ली और आधी रात को अक्षरशः सर हेनरी का आदेश पालन कर बाहर निकल आए।

हमारी ओर के लोगों ने अंग्रेजों की इस चाल की स्‍वप्‍न में भी कल्‍पना नहीं की थी। ''अचानक आसमान को छूता हुआ लपटों का फौवारा फूट पड़ा, धरती पत्‍ते की तरह डोलने लगी, काले धुएँ के बादल छा गए।'' जब तक कि लोग इस धमाके के बाद होश में आएँ-आएँ, अंग्रेजी फौज निकल गई। सैयद कमालुद्दीन ने लिखा है : ''हसनबाग की तरफ से बइंतजाम हलका फौज में तोपें आगे-पीछे रक्‍खे निकले। शहजादे के मकान के दरवाजे से दाखिल बेलीगारद हो गए। दफातन एक तोप चली तो मुलजिम गोलंदाज राह में अपनी जानें लेकर भागे। उनमें दो-चार साहब या गोरे भी शहर की गलियों में फँस गए, मारे गए, उनके नाम नामालूम हैं। फौज बागी जाबजा मोर्चों पर थी, मुँह देखती रह गई।''

इसके बाद मुख्‍य घटना के रूप में हमारे इतिहास का कलंक प्रकट होता है चिनहट की जीत से अंग्रेजों के घिर जाने से हमारे सिपाहियों का हौसला बहुत बढ़ गया। मच्‍छी भवन के नाश होने पर भी इन्‍होंने यही समझा कि अंग्रेज हमारे डर से मोर्चा छोड़कर भाग गए। यह हौसला यदि उचित नेतृत्‍व पा जाता तो बात कुछ की कुछ हो जाती। रेजिडेंसी पर मौलवी अहमदुल्‍ला शाह की कमान में पहली जुलाई को धावा हुआ था। मौलवी साहब बड़ी बहादुरी से बेलीगारद के फाटक तक पहुँच गए लेकिन औरों ने पैर पीछे कर लिए। दूसरी जुलाई को फिर जबर्दस्‍त धावा हुआ। सर हेनरी लारेंस जिस कमरे में बैठे थे उस पर ही गोला गिरा और सर हेनरी को बुरी तरह जख्‍मी किया। 4 जुलाई को उनका स्‍वर्गवास हुआ।

सर हेनरी लारेंस उस काल को दृष्टि में रखते हुए हमारे शत्रु भले ही रहे हों लेकिन वे अपने चरित्रबल का अनुपम आदर्श उपस्थित कर गए हैं। बुरी तरह जख्‍मी होकर, अपना दुखदर्द भूलकर वे भविष्‍य के लिए अनेक आयोजनाएँ प्रस्‍तुत करते रहे। बीच में अपने डॉक्‍टर से पूछा कि मेरी मृत्‍यु होने में कितनी देर है? डॉक्‍टर ने अपना अनुमान बतलाया। उस समय को ध्‍यान में रख सर हेनरी तेजी से अपना काम करवाने लगे। अपने अंतिम क्षण तक वे स्‍वदेश बंधुओं की सेवा करते रहे। यह गुण त्रिकाल में श्रद्धेय है।

इधर हमारे तिलंगे सिपाही नेतृत्‍व के स्‍वभाव में उच्‍छृंखल और उद्दंड होने लगे। वे अब तक किसी के नौकर नहीं हुए थे, उनके सामने भविष्‍य का कोई नक्‍शा नहीं था, इसलिए शहर लूटने पर तुल गए। जिस-तिस रईस के यहाँ हुल्‍लड़ मचाते हुए पहुँच जाते, कहते, तुम्‍हारे यहाँ दुश्‍मन छिपे हैं। तिलंगों ने मुहसिनुद्दौला का सामान लूटा, शरफुद्दौला अमीनुद्दौला, हकीम मीर अली-कइयों के घर लूटे। मुहल्‍ला बाग टोला, चौक के सोने वाली कोठी पर भी बागियों का हमला हुआ था। मेरे पितामह के मित्र बाबू जयनारायण की टंडन - उक्त सोने वाली कोठी के एक स्‍वामी - ने अपनी कोठी का फाटक दिखलाया था जिसका एक किवाड़ काफी हद तक टूटा और फिर से तख्‍ते ठोककर दूरूस्‍त किया हुआ है। वह तिलंगों की ही स्‍मृति है। जब ऊपर से अशर्फियों के तोड़े फेंके गए तब वे आगे बढ़े। नेतृत्‍वहीन जन-जोश यों ही भस्‍मासुर होकर आत्‍म संहार करता है।

जब जनता बहुत त्रस्‍त हुई तो मौलवी अहमदउल्‍ला शाह ने जगह-जगह दूसरी पलटनों के पहरे बिठला दिए। और सेनाओं के अफसर पुराने शाही वंश के किसी व्‍यक्ति को गद्दी पर बिठालने का आयोजन करने लगे।


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हिंदी समय में अमृतलाल नागर की रचनाएँ