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पत्र

डॉ. रामविलास शर्मा को - 2

अमृतलाल नागर


फोन : 23501

अमृतलाल नागर

चौक, लखनऊ -3

7/9/64

परम प्रिय,

मेरा यह कार्ड पाने से पहले ही तुम मेरे अनशन की आशंका से मुक्‍त हो चुके होगे।

तुम्‍हारे मंत्र को मैंने पहले ही मन से अंगीकार कर लिया था। अलग-अलग मुहल्‍लों में जाकर प्रतिदिन सभाएँ करके मैंने यह बात स्‍पष्‍ट कर दी कि यदि मेरा अनशन पर्दा-दर-पर्दा कहीं पर भी 'पोलिटिकल स्टंट' हो तो आप मेरा साथ न दीजिए। मेरा अनशन यदि साहित्यिक दंभजनित हो तो भी मेरा साथ न दीजिए। मातृभाषा की इज्जत का सवाल हो तो जरूर ही आगे बढ़िए। जब तक आप इस ओर से नहीं चेतते हैं तब तक ही आप में से एक को - इस समय मुझको - अपना न्‍याय पाने के लिए प्राणों की बाजी लगानी ही पड़ेगी।

अनेक विधायकों ने कहा कि आजादी के बाद की परंपरा में अनशन एक विशुद्ध पोलिटिकल हथियार हो गया था, लेकिन इस अनशन के अल्‍टीमेटम को उस दृष्टि से नहीं देखा जा सकता।

भैयो, करोड़ों की मातृभाषा अपनी सहज शक्ति से आप ही जीत गई। सुचेता सरकार ने विधेयक वापस लेकर अपनी सुरक्षा और लोकमाता हिंदी की मान-रक्षा करके बुद्धिमत्‍ता का परिचय दिया, तुम्‍हारा यह कहना कि 'अगर हिंदी के नाम पर हिंदी के लेखक 50 हजार नहीं बटोर सकते तो उनके लिए चुल्‍लू भर पानी...' इत्‍यादि - मगर माई डियर, लेखक संगठन-कार्य नहीं कर सकता। संगठन करना एक अलग कला है। हाँ, वह अपनी भावनिष्‍ठा से संगठन करवा सकता है। यही मैंने किया।

अब मैं कल से मौज से अपने पान और विजया के 'कोटे' पर पूर्ववत् राशन ग्रहण करने लगा, पेट सफाई, सूक्ष्‍माहार आदि कार्यक्रम बंद हुए और आज से फिर अपने उपन्‍यास पर बैठ गया हूँ। भैयो, जय भोले कहो। सौ. भाभी और तुम्‍हें राम राम। बच्‍चों को असीस।

अमृत

बॉटनिस्‍ट को प्‍यार -

चाचा

डॉ. रामविलासजी शर्मा

30, न्‍यू राजामंडी, आगरा


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