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कविता

राष्ट्र
ईमान मर्सल


इन सारे हृदयों, अंगों, जननेंद्रियों को एक सिर आदेश भेजता है बे-सिर सैनिकों की एक राष्ट्रीय सेना बनाने के लिए, एक ऐसी पीढ़ी जिसकी किसी की जरूरत नहीं, वह जन्म लेती है सार्वजनिक पुस्तकालयों को जला देने के लिए, पीछा करते हुए इस बीच उस भद्दे संगीत का जो लोकल रेडियो से गरज रहा है, जबकि राष्ट्र यह सुनिश्चित कर रहा कि सारे लोग अपने टैक्स सही समय पर चुका दें और तुरंत ही गूँजने लगते हैं राष्ट्रवादी गीत सार्वजनिक शौचालयों से सार्वजनिक चौराहों तक जहाँ विपक्ष के सम्माननीय सदस्य उन बैनरों के नीचे खड़े हैं जिन पर सामाजिक जागरूकता की नई संस्थाओं के शुभारंभ की घोषणाएँ हैं, और इन सबके दौरान तुम खिड़की पर झुकी हुई झाँक रही होती हो अंधकारमय गलियाँ, अपने नाखून चबाती हुई

 


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हिंदी समय में ईमान मर्सल की रचनाएँ