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कविता

घरों की अवधारणा
ईमान मर्सल


मैंने सोने की दुकान में अपने कान की बालियाँ बेच दीं ताकि चाँदी के बाजार से एक अँगूठी खरीद सकूँ, और फिर मैंने उस अँगूठी को पुरानी स्याही और एक खाली नोटबुक के बदले बेच दिया। यह सब उस घटना से पहले हुआ जब मैं उस ट्रेन की सीट पर अपने कागजात भूल आई जो मुझे घर पहुँचाने वाली थी। जब भी मैं किसी शहर में पहुँचती हूँ, मुझे लगता है, मेरा घर किसी और ही शहर में है।
ओल्गा, जिसे मैंने ऊपर की कोई बात नहीं बताई थी, कहती है, 'कोई मकान उसी क्षण घर बन पाता है, जिस क्षण वह बिक रहा होता है। बगीचा कितना सुंदर है या कमरे कितने बड़े, खुले-खुले हैं, यह आपको तभी पता चलता है, जब आप उसे रियल एस्टेट एजेंट की निगाह से देखते हैं। आप अपने दुस्वप्नों को, खास अपने लिए, उन्हीं छतों के नीचे रखते हैं, और जब आप छोड़कर जा रहे होते हैं, तब उन्हें एक या बहुत हुआ तो दो सूटकेस में भर ले जाते हैं।' अचानक ओल्गा खामोश हो जाती है, फिर ऐसे मुस्कराती है, जैसे कोई महारानी अपनी प्रजा से मिलते समय, किचन में रखी कॉफी मशीन और खिड़की के बीच डोलते हुए। खिड़की, जो फूलों के दृश्य पर खुलती है।

ओल्गा के पति ने रानी का यह दृश्य नहीं देखा है, शायद इसलिए वह अब भी यह सोचता है कि जब वह अंधा हो जाएगा, तब यह मकान उसका सबसे भरोसेमंद दोस्त होगा। इसके कोने-अँतरे उसके कदमों को पहचानेंगे और इसकी सीढ़ियाँ बेहद उदारता से उसे अँधेरे में गिरने से बचा लेंगी।

मैं एक चाभी खोज रही हूँ, जो हमेशा मेरे हैंडबैग की तलहटी में खो जाती है, ओल्गा और उसका पति मुझे देख नहीं पाते, जबकि असल में मैं घरों की अवधारणा से ही मुक्त होने का अभ्यास कर रही हूँ।

जमाने-भर की धूल अपनी उँगलियों पर चिपकाए हर बार जब तुम यहाँ लौटती हो, अपने साथ लाई हुई चीजों को तुम इसकी दराजों में जमा करती हो। फिर भी तुम नकार देती हो कि यह मकान कोलाहल का भविष्य है, जहाँ मरी हुई चीजें एक पल को उम्मीद के साथ सौदेबाजी करती जान पड़ती हैं। मकान ऐसी जगह हो, जिसकी खराब रोशनी पर तुम्हारा कभी ध्यान तक न जाए, जिसके दीवारों की दरारें इतनी चौड़ी हो जाएँ कि एक दिन तुम उन दरारों को दरवाजा मान लो।

 


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