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कविता

उत्सव
ईमान मर्सल


कहानी का धागा जमीन पर गिरा और खो गया, सो मैं घुटनों के बल झुकी, हाथों पर चलती हुई उसे खोजने लगी। वह देशभक्ति के नाम पर हो रहा उत्सव था और उस तरह चलते हुए मुझे सिर्फ जूते ही जूते दिख रहे थे।

एक बार, एक ट्रेन में, एक अफगान औरत, जिसने कभी अफगानिस्तान देखा तक नहीं था, उसने मुझसे कहा, 'जीतना संभव है।' क्या वह कोई भविष्यवाणी थी? मैं पूछना चाहती थी। लेकिन मेरी फारसी नौसिखियों की किताबों की तरह थी और मुझे सुनते हुए वह मेरी ओर ऐसे देख रही थी, जैसे उस आलमारी से अपने लिए कपड़ा चुन रही हो जिसका मालिक आगजनी में जल मरा।

फर्ज कीजिए कि चौराहे पर मार तमाम जनता इकट्ठा हुई। फर्ज कीजिए कि 'जनता' कोई फूहड़ शब्द नहीं है और यह भी कि 'मार तमाम' जैसे मुहावरे का अर्थ सब जानते हैं। फिर ये सारे पुलिस के कुत्ते यहाँ क्या रहे हैं? उनके चेहरों पर किसने ये रंगबिरंगे मास्क लगा दिए? सबसे अहम बात तो यह, कि वह रेखा कहाँ है जो झंडियों और चड्ढियों को अलग करे, जो भजन और अभिशाप को अलग करे, ईश्वर और उसकी कृतियों को अलग करे - वे कृतियाँ जो टैक्स भरती हैं और पृथ्वी पर चलती हैं?

उत्सव। ऐसे कह रही, जैसे दुबारा यह शब्द कभी न कहूँगी। जैसे किसी ग्रीक शब्दकोश से निकला हुआ शब्द है, जिसमें स्पार्टा के विजेता सैनिक घर लौट रहे हों और उनके भालों और ढालों पर फारसियों का खून अभी भी गीला हो।

शायद कोई दर्द ही नहीं था, कोई भविष्यवाणी भी नहीं, कोई अफगान महिला मेरे सामने दो घंटे नहीं बैठी रही थी। कई बार, महज अपने मनोरंजन के लिए, ईश्वर हमारी स्मृतियों को बहका देता है। इस समय जहाँ हूँ मैं, जूतों ही जूतों के बीच इस जगह, इस जगह से कभी
ठीक-ठीक मैं यह जान नहीं पाऊँगी कि किसने, किस पर जीत हासिल की।

(यह कविता रॉबिन क्रेसवेल के अरबी द्वारा किए गए अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित)

 


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