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कविता

यथार्थ के खून के छींटे किसी पर नहीं पड़े
ईमान मर्सल


जब मैं भीतर घुसी, मेरे दादाजी कोने में खड़े अपनी कॉफी उँड़ेल रहे थे। सामने की दीवार पर नसीर के नाक-नक्श धुँधले पड़ रहे थे क्योंकि पुरानी छत ऐसी नहीं थी कि बारिश की बूँदों को रिसने से रोक सके। वह प्रतिभाशाली कारीगर जिसने वह रेखांकन किया था (हालाँकि उसे कभी भी कृषि-सुधारों का लाभ नहीं मिल पाया), पिछले हफ्ते किसी सरकारी अस्पताल में मर गया। मेरे दादाजी ने मुझे एक गठरी दी। उसे खोला तो भीतर एक शिशु था, जो अभी भी माँ के गर्भ के द्रव से गीला था। मैंने कहा, यह तो मेरा ही बेटा होना चाहिए। मैंने उसका नाम मुराद रख दिया। जो नाल हम दोनों को जोड़े रखती थी, मैंने वह काट दी ताकि उसका खुद का एक वजूद हो। उसके पेट पर नाभि के आकार में उदासी का एक बीज बन गया। मैंने उसे लैपटॉप के बैग में रखा और अपनी टोयोटा कोरोला चलाते हुए रॉकीज तक गई। रास्ते भर में कुरान से यूसुफ वाला अध्याय सुनती रही। मैं लंबी दूरी के उन टैक्सी ड्राइवरों के बारे में सोचने लगी, जो यूसुफ वाले अध्याय को बहुत चाव से सुनते हैं। आखिर सुनें भी क्यों न, उसमें सेक्स का सीन जो है। मैंने तय किया कि मैं खून से पुती कमीजों और घृणा के सौंदर्यशास्त्र पर एक लेख लिखूँगी।

पहाड़ बर्फ से ढके हुए थे, और कुछ कदम चलते ही धरती बीच से फट गई और उसमें से एक कॉफी हाउस प्रकट हो गया। मैं एक बार इस कॉफी हाउस में जा चुकी हूँ। मेरी एक सहेली (जिसने एक कीड़े से शादी की थी और वह कीड़ा उसे खा गया था) और मैं, हम दोनों ही भूखे थे। एक झुका हुआ बूढ़ा हमारे लिए डबलरोटी और नमक ले आया। वह बूढ़ा अब इस कॉफी हाउस में नहीं है, लेकिन उसकी विधवा आती है और मेरे उन तीन दोस्तों के बीच से गुजर जाती है, जिन्हें अभी कुछ बरस पहले ही बड़ी सरकारी नौकरी मिली है और जो अब भी, उसी तरह, वही, बातें करते हैं, जैसी बरसों पहले किया करते थे। मुझे पता चला कि हमारा चौथा दोस्त अपने पिता की कब्रगाह में है और हमारा पाँचवाँ दोस्त रोटरडम में एक चर्च के सामने तूतनखामन का मुखौटा पहनकर बैठता है और राहगीर उसकी टोपी में छुट्टे पैसे डाल जाते हैं। मेरे दोस्तों का ध्यान मेरी गठरी की तरफ गया और उन्होंने पूछा, 'यह तुमने कहाँ से पा लिया?' और तभी नजदीक की एक झील से हमें लोरी-सोहर की आवाजें सुनाई देने लगीं। हमने वहाँ बच्चे के जन्म के जश्न में सुब्बू मनाया। जश्न, दावत और नाच के उन्माद के बीच मैंने देखा, अचानक वहाँ दादाजी पहुँच गए हैं, अपनी शॉल, छड़ी और दीवार पर बने नसीर का चेहरा लेकर (बारिश तब तक उस चेहरे को पूरी तरह धो नहीं पाई थी)। उन्होंने मुझसे गठरी ले ली और वापस चले गए।

 


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