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कविता

बाकिर
अष्‍टभुजा शुक्‍ल


भलहीं हमहन के पसेने नहाय के पड़े
बाकिर केहू के तेल ना लगावे के पड़े
आधा खाए के पड़े, आधा पहिरे के पड़े
आधा सूते के पड़े
बाकिर कवनो राजा के दाब में ना रहे के पड़े
जूता सीए के पड़े, पालिस करे के पड़े
बाकिर कवनो साहेब के गोड़ में
जूता ना पहिरावे के पड़े
भलहीं सेब छुए के ना मिले
अँगूर चिखे के ना मिले
बाकिर इमली के आम ना कहे के पड़े
आँखि से बोले के पड़े
चमड़ी से साँस लेबे के पड़े
बाकिर तोहरा से प्यापर खातिर मुँह ना खोले के पड़े।

 


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