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कविता

एक जलती-बुझती खुशी
वीरेन डंगवाल


जैसे तारों की टिमक
जैसे ब्याह वाला घर
जैसे फूट पड़ते फव्वारे का उल्लास
जैसे एक निराशा घनघोर
मैं आजिज आ चुका हूँ इससे
मुझे यह और चाहिए ।

 


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