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कविता

गप्प-सबद
वीरेन डंगवाल


आँधी में उड़ियो न सखी, मत आँधी में उड़ियो।
ओ३म लिखा स्कूटर दौड़ा राम लिखा कर कार
लेकिन पप्पी दी गड्डी पर न्यौछावर संसार
उन्हीं का होना है संसार
बस न तू आँधी में उड़ियो

धक्-धक्-धक्-धक् काँपे हियरा थर-थर-थर-थर पैर
अलादीन को बेढब सूझी बेमौसम यह सैर
बिना चप्पू-लंगर यह सैर
जरा आँधी में मत उड़ियो

खाना खा लेटी ही थी झाँसी की रानी थोड़ा
वहीं खाट के पास बँधा था उस का मश्की घोड़ा
बड़ी देर से मक्खी उसको एक कर रही तंग
खिसियाई रानी ने जब देखे उस के ढंग
चीखी, 'नुचवा दूँगी मैं तेरे ये चारों पंख
तुड़ा दूँगी मैं आठों पैर
अरी, फिर आँधी में उड़ियो।'

देस बिराना हुआ मगर इस में ही रहना है
कहीं ना छोड़ के जाना है, इसे वापस भी पाना है
बस न तू आँधी में उड़ियो। मती ना आँधी में उड़ियो।

 


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