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कविता

बुखार
वीरेन डंगवाल


मेरी नींद में अपना गरम थूथन डाले
पानी पीती थी एक भैंस ।

मैं पकता
हवा से सिहरते गेहूँ की तरह
धूप के खेत में ।
नींद सा कुछ दबाता
पलकों को

कलेजे को दबाती
एक मसोस ।

 


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