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कविता

या देवि !
वीरेन डंगवाल


माथे पर एक आँख लंबवत
उसके भी ऊपर मुकुट
बहुत सारे हाथ
मगर दीखते हैं दो ही :
एक में टपकता मुंड ।
दूसरे में टपटपाता खड्ग ।
शेर नीचे खड़ा है ।
दाँत दिखाता मगर सीधा-सादा ।
बगल में नदी बह रही लहरदार ।
पहाड़ क्या हैं, रामलीला का पर्दा हैं ।
माता, मैं उस चित्रकार को प्रणाम करता हूँ
जिसने तेरी यह धजा बनाई ।

 


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हिंदी समय में वीरेन डंगवाल की रचनाएँ