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कविता

पत्रकार महोदय
वीरेन डंगवाल


'इतने मरे'
यह थी सबसे आम, सबसे खास खबर
छापी भी जाती थी
सबसे चाव से
जितना खू़न सोखता था
उतना ही भारी होता था
अखबार।

अब संपादक
चूँकि था प्रकांड बुद्धिजीवी
लिहाजा अपरिहार्य था
जाहिर करे वह भी अपनी राय।
एक हाथ दोशाले से छिपाता
झबरीली गरदन के बाल
दूसरा
रक्त-भरी चिलमची में
सधी हुई छ्प्प-छ्प।

जीवन
किंतु बाहर था
मृत्यु की महानता की उस साठ प्वाइंट काली
चीख के बाहर था जीवन
वेगवान नदी सा हहराता
काटता तटबंध
तटबंध जो अगर चट्टान था
तब भी रेत ही था
अगर समझ सको तो, महोदय पत्रकार !

 


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