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कविता

माँ की याद
वीरेन डंगवाल


क्या देह बनाती है माँओं को ?
क्या समय ? या प्रतीक्षा ? या वह खुरदरी राख
जिससे हम बीन निकालते हैं अस्थियाँ ?
या यह कि हम मनुष्य हैं और एक
सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा है हमारी
जिसमें माँएँ सबसे ऊपर खड़ी की जाती रही हैं
बर्फीली चोटी पर,
और सबसे आगे
फायरिंग स्क्वैड के सामने ।

 


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हिंदी समय में वीरेन डंगवाल की रचनाएँ