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कविता

क्या करूँ
वीरेन डंगवाल


क्‍या करूँ
कि रात न हो

टीवी का बटन दबाता जाऊँ
देखूँ खून-खराबे या नाच-गानों के रंगीन दृश्‍य

कि रोऊँ धीमे-धीमे खामोश
जैसे दिन में रोता हूँ

कि सोता रहूँ
जैसे दिन-दिन भर सोता हूँ

कि झगड़ूँ अपने आप से
अपना कान किसी तरह काट लूँ
अपने दाँत से

कि टेलीफोन बजाऊँ
मगर आँय-बाँय-शाँय कोई बात न हो

 


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हिंदी समय में वीरेन डंगवाल की रचनाएँ