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कविता

प्राण-सखा
वीरेन डंगवाल


समय कठिन
प्राण सखा आँखें मत फेर

टोक-टोक जितना भी जी चाहे टोक पर आँखें मत फेर !
इन दुबले पाँवों को
हाथों को
पकड़-जकड़
चढ़ी चली आती है अकड़ भरी
लालच की बेल
शुरू हुआ
इस नासपीटे वसंता का
सर्व अधिक कठिन खेल

आच्‍छादित हो जाएँगे खिड़की-दरवाजे
जहरीले नीले चित्‍ताकर्षक फूलों से
फूटेंगी दीवारें
सोच नहीं इससे क्‍या होना-जाना है
समय अभी
हेर-हेर-टेर
मुझे टेर
प्राण सखा !

 


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