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कविता

मसला
वीरेन डंगवाल


बेईमान सजे-बजे हैं
तो क्‍या हम मान लें कि
बेईमानी भी एक सजावट है ?

कातिल मजे में हैं
तो क्‍या हम मान लें कि कत्‍ल करना मजेदार काम है ?

मसला मनुष्‍य का है
इसलिए हम तो हरगिज नहीं मानेंगे
कि मसले जाने के लिए ही
बना है मनुष्‍य

 


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