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कविता

1857 के डेढ़ सौवें वर्ष में
पंकज राग


कॉलेज में मेरे एक प्रोफेसर कहा करते थे
कि अगर संघ लोक सेवा आयोग वाले मल्टिपल च्वाइस प्रश्नों में
पूछें कि 1857 क्या था
क्या वह एक सिपाही विद्रोह था, क्या वह धर्म को लेकर लड़ा गया?
क्या वह जनसाधारण की लड़ाई थी या क्या वह राजसत्ता की वापसी का युद्ध था?
और आपको इनमें से सिर्फ एक चुनना हो तो आप क्या करेंगे?
क्या आप इतिहास के अच्छे विद्यार्थी की तरह एक विकल्प की अनिवार्यता पर
उँगली उठाते हुए चारों को चुनेंगे
या फिर प्रतियोगिता में सफलता के लिए
इतिहास को तिलांजलि देकर किसी एक पर निशान लगाएँगे?

मुझे याद है उस दिन हममें से कोई कुछ नहीं बोला
जब आप सब जानते हों कि आप ऐसी स्थिति में क्या करेंगे
पर ऐसा करने में थोड़ी शर्म भी महसूस हो
तो, फिर आप बोल नहीं पाते
हाँ, क्लास के बाहर मेरे कुछ दोस्तों ने ठहाका भी लगाया
और कहा कि कोई गधा ही होगा जो चारों को टिक करेगा
जानबूझ कर एक पूरे सवाल के अंक कौन खोना चाहेगा
वह भी सही इतिहास के नाम पर।
कुछ दोस्त असमंजस में भी रहे
कुछ ने थोड़ी कोफ्त से कहा कि आखिर ऐसे बेतुके सवाल सेट भी
तो इसी तरह के प्रोफेसर करते हैं
इस तरह 1857 उस दोपहर हमारी चर्चा में रहा
हम 1857 पर ही बातें करते-करते पुरानी दिल्ली के रिज की तरफ निकल गए
शायद उन स्थानों के बहुत करीब जहाँ यह लड़ाई लड़ी गई थी
हमारे पास से गुजरने वाले लोगों की बातों में इतिहास दूर-दूर तक नहीं था
हमारी बातों में भी अगर था
तो शायद सिर्फ इसलिए क्योंकि उससे हमारा अपना भविष्य जुड़ गया था
हमारे सामने एक परीक्षा थी
जिसमें हमें बैठना था और सफल होना था
और इसके लिए एक व्यापक बहुआयामी इतिहास को छोटा कर
एक सीमित विकल्प चुनने के अपने निर्णय पर
बहस करके भी हम अडिग थे
हम शायद जायज भी थे क्योंकि प्रश्नपत्रों की सत्ता को हम चुनौती नहीं दे सकते थे
पर यहीं 1857 के तमाम प्रतिभागियों से हम छोटे भी रहे जिन्होंने
चाहे कैसे भी या किसी भी कारण से
उस समय की औपनिवेशिक सत्ता को ललकारा था।

वैसे कुछ भी न चुनना भी एक विकल्प हो सकता है
और चुनने और न चुनने के बीच भी
एक ऊबर-खाबड़ जमीन हो सकती है
जिसके मध्य भी समतल हिस्से बन जाया करते हैं
कौन जानता है सिपाहियों द्वारा जोखन बाग में गोरों के कत्लेआम के बाद भी
झाँसी की रानी फरवरी 1858 तक अंग्रेजों को चिट्ठियाँ लिखकर
ऐसे कौन से हिस्से तलाश रही थी
और इस जमीन पर फिर ऐसी क्या हलचल हुई
कि उसी रानी में लोगों ने अपनी आवाज ही नहीं
और भी न जाने क्या-क्या ढूँढ़ लिया
वह खुद गुड़धानी खाकर भी सिपाहियों को पेड़ा जलेबी खिलानेवाली हो गई
और बुंदेलखंडी विवाह गीतों में
उसकी लड़ाई सत्य और झूठ के बीच की लड़ाई का गाली गीत बनकर गूँजती रही।

हरबोलों की मिरजई और मँजीरों की वे बातें
1857 के इस डेढ़ सौवें वर्ष में फिर याद तो आईं
पर याद आना कोई विकल्प नहीं था
याद को संदर्भों से न जोड़ने का विकल्प इस समय तक
बहुत सुविधाजनक हो गया है हम सबके लिए
और 1857 के इस डेढ़ सौवें वर्ष तक तो
शायद कॉलेज के हम सभी दोस्त
अपनी-अपनी जमीनों में दूर तक धँस चुके हैं।
खतरा अगर साफ नहीं हो तो वक्त बीतते देर नहीं लगती
बहुत धीमे बीते थे अठारह सौ सत्तावन और अट्ठावन के वे दो वर्ष
क्योंकि खतरा सिर्फ गद्दियों और ओहदों
या जमीन और जायदाद का नहीं था
लगान का बोझ हो, अफीम या नील की थोपी हुई मारक खेती हो
या रिवाजों और कायदों की जगह ऊँचे खंभे वाली अदालतें हों
सभी कुछ-कुछ अजीबोगरीब और ऐसा था
जैसा पहले कभी देखा न था
न हुनर की कद्र, न पुश्तैनी रवायतों की परवाह, न खानदानी इज्जत की फिक्र
मानो एक औपनिवेशिक झोंका हो जो बढ़ता जा रहा हो
और पूरी संस्कृति ही हिल गई हो।

1857 के बारे में कितना कुछ लिखा गया जो हमने पढ़ा भी था
पर शायद यह नहीं समझ पाए
कि यदि संस्कृति की आम परिभाषा जीवन शैली होती है
तो इसी संस्कृति की खास परिभाषा संघर्ष भी हो सकती है
समझ जाते तो शायद दुनिया तो न बदल पाते

पर इतने धँसे भी न होते कि निकलना गैर जरूरी मान लें
हमसे अधिक 1857 को तो साथ लेकर चले हैं वही उपनिवेशी ताकत
जो अब सभी आडंबर छोड़ पूरे निवेशी हैं
भौतिक जगत से लेकर अंतर्चेतना तक चलता है निवेश का खेल
तभी तो अब खतरे साफ नहीं नजर आते
वक्त इतनी तेजी से बीतता है खिलौनों के बीच
कि विचार बन नहीं पाते, नजरें टिक नहीं पातीं
जीवन शैली का अर्थ मानो एक क्षण हो गया हो
और क्षण से क्षण की कुलाँचों में पूरी पृथ्वी को नाप लेना ही माद्दा हो
क्योंकि पृथ्वी अब एक-सी होने का आभास देती है।
पर पृथ्वी एक है कहाँ?
न कभी थी न है
जब-जब यह अहसास जागता है तो 1857 जैसी कोई चीज होती है
जब-जब यह अहसास मरता है तो 2007 बीतता चला जाता है
और 1857 के एक सौ पचास वर्ष बाद
इलाहाबाद की सड़कों पर चलते हुए हम भूल जाते हैं कि तीखा संघर्ष ऐसा होता है
कि इसी शहर में किसी साधारण विद्रोही द्वारा
न सिर्फ कोयले के गोदाम को ब्रिटिश सत्ता का प्रतीक मानकर जलाया गया
बल्कि कोयले को भी लूटा नहीं वहीं स्वाहा कर डाला गया
हमें याद नहीं आता भोजपुर के धोबियों का वह भावुक-सा बिरहा
कि बाबू कुँअर सिंह के राज बिना अब कपड़ों को केसरिया से न रँगाएँगे
हमें मिट्टी में रची बसी वह रागात्मक धुनें भी नहीं याद रहतीं जिसमें
छोटे-छोटे जाने-पहचाने प्यार कैमूर की पहाड़ियों,
पिता जैसे जंगल और कुँअर सिंह के भर-भर कटोरा दूध पीने वाले बछड़ों से लिपटते हैं
हमें होली की उस ऊपर को नीचे और नीचे को ऊपर कर देने वाली
अर्थव्यंजकता भी याद नहीं
जब देवर-भाभी की ठिठोली लोक गीत में मूर नामक एक अंग्रेज अधिकारी के सिर को
काट कर भाभी के पास लाने का रूप धर
हास्य से बढ़ कर एक बड़ी ताकत का बड़ा उपहास बनकर सामने आई थी
छोटी-छोटी ऐसी कितनी ही बातें हमें याद नहीं
छोटी बातों से बनी बड़ी-बड़ी बातें भी शायद इसीलिए
बिना पत्तों के पेड़ सरीखे लगने लगी हैं
और शहरों में पेड़ यूँ भी कम हो चले हैं
रहते तो भी उन पर खुले आम फाँसी तो अब दी नहीं जा सकती
जमाना बदल गया है
अब भी मौत कलेवरों में छुप छुपाकर आती तो जा रही है
पर उसकी आहटें नहीं आतीं
और लगता है जैसे समय बहुत जल्दी बीत रहा है।

इतनी ही जल्दी ढहते जा रहे हैं 1857 के कई-कई अवशेष
जिन्हें आज तक स्मारक घोषित नहीं किया गया
अभिलेखागारों की संभ्रांत नस्तियों में जो न मिले
उसकी विश्वसनीयता हमारे इतिहास में संदिग्ध हो जाती है
पुराने पीले कागजों की महक को प्रामाणिक मानने का एक अर्थ यह भी रहा है
कि ऐसी कई आवाजें जिन्होंने कहा कि सब कुछ लाल हो जाएगा
उनकी तलाश मुल्तवी रखी गई
और जब अंततः शुरू की गई
तो उनकी अनुगूँज बड़ी धूमिल हो चुकी थी
मंडला के उन जंगलों के बहुत सारे पेड़
दुखनू और मंगनू गोंड की यादों को लिए हुए ही जा चुके थे
चिड़ियों को प्रशिक्षित करके संदेश भेजने की कला,
गोखरू से अंग्रेज सिपाहियों को फँसाने का फन
खैरी में भेड़ों के गले में लालटेन बाँध कर अंग्रेजों को छकाने का मजा
इन भावनाओं को इतिहास में शामिल कराने की
ताकत नहीं है उन आदिवासियों के पास
उनकी संस्कृति में ऐसे गीतों की गुनगुनाहट तो है
पर वह गुनगुनी धूप बन कर निखरती नहीं
वह चाँदनी रात में ही भीमा भीमा का खेल खेलती है
बिना खिलौनों के
सिर्फ इस आशा के साथ कि भीमा नायक फिर आएगा, उसे फिर आना है
भीमा को आवनो से, दुख सारा कोटी जोसे
आज भी गाते हैं निमाड़ के भील
1857 को डेढ़ सौ वर्ष बीत चुके हैं
कुछ दुख अभी तक नहीं बीते।

गौर करें तो 1857 के दुखों की कहानी बहुत बड़ी है
गरीबी के दुख, अमीरी के दुख
सचमुच के दुख, कुछ पाले हुए दुख
सच्ची भूख से व्याकुल दुख
झूठी शान से परेशान दुख
वह कई दुखों को जोड़कर लड़ी गई एक लड़ाई थी
तो वह कुछ दुखों को छोड़ कर भी लड़ी गई एक लड़ाई थी
कमजोर जोड़ों को बाँधता एक दुश्मन था
कुछ दुख इसलिए नहीं बीते कि दुश्मन शक्तिशाली था
और कुछ दुख जैसे कभी बीतते नहीं
फिर भी लड़े क्योंकि उम्मीद जिंदा थी
उम्मीद भी तो नहीं बीतती
खतरों से विचलित उम्मीद तो बिल्कुल नहीं
खतरे साफ हों तो उम्मीद जिंदा रहती है
आग सुलगती है बुझती नहीं
पर खतरों को देखना जरूरी है
1857 के डेढ़ सौ वर्ष बाद भी नजर आने चाहिए खतरे
स्पष्ट दिखाई न दें तो उन्हें खोजना चाहिए, आशंकाओं की पदचाप के सहारे
उस अंग्रेज सिपाही की तरह जो अवध की रातों में
तुम कहाँ छुपे ओ बेनीमाधो के गीत गाते हुए
सुबह का इंतजार करता था।

वैसे सोचिए तो गाँव से गाँव रोटियों को क्रम से बाँटते जाना
आशंका को यथार्थ की जुबान देने की एक अजीब परंपरा थी
जैसे कुछ बोलिए न बोलिए पर कुछ होने वाला हो
जैसे महामारी के समय होता था
एक ऐसे समाज में
जहाँ रोटियाँ मुहाल थी और आशंकाएँ भरपूर
जहाँ रोटी आशा थी
और यह यकीन था कि यथार्थ से ही आशा की लहर बहती है।

पर यह लहर आगे नहीं पीछे जाती थी
कारतूस की चर्बी, आटे में हड्डियों का चूरा, मिलावट की ढेर सारी अफवाहों के पीछे
अपनी परछाइयों से चिपकने का मोह इतना था
कि सिर्फ बाप दादों के जमाने ही सुनहरे लगते थे
उसकी बातें ही नैतिक लगती थीं
मलाल शायराना हो या सैनिकाना
पर अंग्रेजों की खिलाफत के हर पहलू के पीछे
पवित्रता और प्रदूषण की नानियों और दादियों की वही पुरानी कहानियाँ थीं
जिन्हें सुन कर गाँव-गाँव के सवर्ण
बचपन से ही बड़े-बूढ़ों जैसी बातें करने लगते थे।

ऐसी कहानियों ने कुछ तबकों को हमेशा अलग ही रखा है
कुछ पारंपरिक सामंती आचारों से विभेद का दंश कम तो हो सकता था
पर मिट नहीं सकता था
लड़े वे तबके भी कहीं-कहीं
कई बार अनुचरों के रूप में
कभी-कभी सत्ता के स्वायत्त प्रतिरोध की तरह भी
पर पवित्रता को बचाने के उस युद्ध में
उनकी अस्पृश्यता का निजात नहीं था
जिस दुनिया को वापस लाए जाने की लड़ाई थी
वहाँ वे अछूत ही रहते

शायद अंग्रेजों से भी अधिक
जिन व्यवहारों, आचारों और नैतिकताओं को धर्म मान कर लड़ा गया
उनकी खड्ग पूजा में
युद्ध के पहले भी शामिल होने की मनाही थी उन्हें
और अगर जीतते तो भी जूठन ही मिलती, प्रसाद नहीं।
शायद इसलिए भी सब कुछ लाल नहीं हुआ 1857 में
पौरुष और मर्दानगी की तमाम लोकोक्तियों के बीच
जाति और गोत्र के समस्त गठबंधनों के बीच
धर्म और प्रतिष्ठा की सामाजिक मान्यताओं के बीच
गढ़ियाँ और किले बिखरते चले गए
अवध, बुंदेलखंड और भोजपुर के गाँवों में घूमते हुए
उनके पत्थर आज भी मिल जाएँगे
और आपसे कहेंगे कि बड़ी लड़ाइयाँ ऐसे मुहावरों से नहीं जीती जा सकतीं
आज तो और भी नहीं
जब द्रुत चलायमान छवियों के बीच से ही दुश्मन पर नजर ठहरानी हो
और समर्थन लेने के लिए
गति के भ्रम में चल रहे समुदायों को एक खास दिशा दिखाना हो।

आज 1857 के इस डेढ़ सौवें वर्ष में
जब उस विद्रोह की तहें हम ढूँढ़ते हैं
तो बहुत उलझा-उलझा लगता है सब
हमारी आँखों में बीते डेढ़ सौ वर्षों की छायाएँ भी लहरा जाती हैं
इन छायाओं के अपने ताने बाने हैं
और आजादी अपनी भिन्न आकृतियों में कभी चमकती तो कभी बेहद धूमिल दिखती है
लेकिन छायाओं के इस खेल में भी
1857 एक लड़ाई के रूप में गंभीर बना रहता है
भले ही शरीर कमजोर हो
मन भले ही अपनी सीमाओं के अंदर जकड़ा हो
पर चेहरे की गंभीरता को नकारा नहीं जा सकता
लड़ना भी बड़ी बात होती है
यह एक उठा हुआ कदम होता है
और हार भी इसे वापस जमीन में उस तरह धँसा नहीं पाती
जैसे आज आभासों के मायाजाल में विचरते हुए भी हम आप धँसे हैं
राणा बेनीमाधव की अपनी सीमाएँ थीं, सच है
उस जमाने की भी अपनी सीमाएँ थीं
कर्म को भी धर्म के मुहावरे दिए जाते थे
पर यह भी सच है कि 1857 ने ईश्वर और भाग्य को भी संघर्ष से ही जोड़ा,
निष्क्रियता से नहीं
वरना इस खुले-खुले देश में तो आज हम अपने रहनुमाओं से
इतना भी नहीं कह पाते कि
'तुम तो जाए मिल्यो गोरन से हमका है भगवाना'

 


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