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कहानी

कैसे हो पार्टनर
नवनीत मिश्र


गुसलखाने से निकल कर जिप्पी ने कैसेट-प्लेयर बंद किया, ताँबे के पात्र में शुद्ध जल लिया, कोने में गोल करके खड़ी की गई आसनी उठाई और वराण्डे के उस कोने की ओर बढ़ गए जहाँ कुलदेवता स्थापित थे। रेशमा की गजल 'भुला दो रंज की बातों में क्या है, जरा देखो मेरी आँखों में क्या है' की अनुगूँज टेप बंद हो जाने के बाद भी दिमाग में बाकी थी। आसनी पर बैठने के बाद गदेली में पानी लिया, आचमन के बाद उचारना चाहते थे - 'ओइम नमः शिवाय', लेकिन गुनगुनाए 'जरा देखो मेरी आँखों में क्या है'। उन्होंने खुद को समेट कर जरा देर के लिए अपने आप को 'आँखों में देखने' से रोका और बुदबुदाए -'ओइम नमः शिवाय।'

कल के गणेश प्रसाद को वाया जीपी आज का जिप्पी बनने में सात साल से कम तो क्या लगे होंगे। 'धर्म अफीम है' जैसी उक्तियों की हल्की-हल्की चोटों से गणेश प्रसाद के ऊपरी साँचे को बड़ी सावधानी से तोड़ा गया तब जाकर साँचे में ढली जिप्पी नाम की मूरत सामने आ पाई।

गणेश प्रसाद को जिप्पी बनने के क्रम में धीरे-धीरे पता लगा कि समाज के जन्मजात श्रेष्ठ लोगों ने किस तरह व्यक्ति की योग्यता और श्रम को विनिमय मूल्य में बदल दिया है। यह देख कर उनके मन में खौलन सी उठने लगती कि इन श्रेष्ठ लोगों ने डॉक्टर, वकील, वैज्ञानिक और कवि सभी को तनख्वाह देकर उजरती मजदूर में बदल दिया है।

जिप्पी के सामने चेतना के नये द्वार खुल रहे थे लेकिन उस राह पर आगे बढ़ने में उन्हें सबसे पहली और सबसे बड़ी बाधा अपना नाम ही दीख पड़ती थी। लेकिन नाम के साथ वह क्या करते? हाई स्कूल से एम.ए. तक सभी जगह प्रथम श्रेणी के सुन्दर चेहरों पर गणेश उन्हें डिठौने की तरह लगा मालूम पड़ता। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वो कहते हैं न कि 'कहते-कहते दीवारें चल जाती हैं' और 'किसी भारी-भरकम पत्थर को रोज जरा-जरा सा सरकाते रहा जाए तो उसका स्थान भी बदला जा सकता है', सो कहनेवालों के इसी कहन से बल लेकर गणेश प्रसाद ने अपने आप को पहले जीपी और फिर जिप्पी जनवाये जाने के लिए भारी श्रम किया। आज हर कोई उन्हें जिप्पी के नाम ही जानता और पुकारता है। अपने इस नाम का सम्बोधन सुन कर उन्हें लगता है जैसे उन्हें चेग्वेरा जैसे किसी नाम से पुकारा जा रहा है।

जिप्पी धीरे-धीरे नये रूप में ढलते गए। दादी-नानी से सुनी अशोक वाटिका टाइप कहानियाँ उन्हें भूली तो नहीं थीं लेकिन अपनी याददाश्त के उस हिस्से के प्रति उनके मन में एक अजीब तरह का अस्वीकार भाव जैसा बनता गया था। पिता के जमाने में सत्यनारायण की कथा सुनाने आए पंडित जी से यह कहने पर कि 'आखिर वह कथा तो बताइये जिसे न सुनने की वजह से लीलावती और कलावती का अनिष्ट हुआ था और बाद में जिसे सुन लेने से कल्याण हो गया था, पिता द्वारा की गई पिटाई ने उनके भीतर के विरोध-भाव को और गहरा कर दिया था। किसी मंदिर के सामने से निकलते हुए लोगों को वह सीने पर हाथ रख कर आँखें बंद करते या आँखें बंद करके अपने कानों को छूते देखते तो मन ही मन हँसते हैं। कभी किसी मेहमान को मंदिरों में दर्शन कराने के काम में फँस जाते तो मेहमानों को मंदिर के भीतर भेज कर खुद बाहर ही प्रतीक्षा करते खड़े रहते हैं। कभी लगातार जिद किए जाने पर भीतर जाना ही पड़ जाता है तो मूर्तियों के सामने ऐसे खड़े रहते हैं जैसे आँखों में मोतियाबिंद उतर आया हो, न दुआ-न बंदगी। एक बार तो साथ गए लोगों के साथ किसी विदेशी पर्यटक का-सा कौतुक करते हुए पूछा - 'हू इज ही?' 'हनुमान जी' - किसी ने बताया। वह कंधों को उचका कर तुरन्त बोले - 'इफ आयम नॉट मिसटेकेन, ही इस द मैन हू इन्वेंटेड होमियोपैथी,इजेन्टिट?' 'ओ नो जिप्पी, ही वॉज हैनिमन, डॉक्टर सैमुअल फ्रैड्रिक हैनिमन' बतानवाले ने जिप्पी के इस प्रहसन में सहपात्र की भूमिका निभाते हुए लोटपोट होने से पहले किसी तरह मुश्किल के साथ कहा। साथ के कुछ लोग जिप्पी के इस मसखरेपन का मजा लेने लगे और कुछ लोग इसे ईश निंदा का पाप मानते हुए उनसे दूरी बना कर चलने लगे। वह मंदिर में या कहीं भी माथे पर टीका लगवाने से भरसक बचते हैं लेकिन लगा ही दिए जाने पर पसीना पोंछने के बहाने जल्दी ही उससे छुटकारा भी पा लेते हैं। हर साल वैष्णो देवी के दर्शन करने के लिए जानेवालों को देख कर सोचते हैं कि अगर उनके पास पैसा होता तो वह कहीं समुद्र के किसी बीच पर बैठ कर ठंडी बियर का मजा लेते हुए उस पैसे को स्वारथ करते। उनकी यह मौलिक स्थापना थी कि, मनुष्य की निराशा का दूसरा नाम ईश्वर है।

लेकिन पिछले कुछ समय से जिप्पी के जीवन में बड़े उलट-फेर हो गए थे। समाज से भागने के बजाय वह समाज को बदलने के जिस काम में लगे हुए थे उसे उनके बड़े भाई ने एकदम फालतू, अनुत्पादक और वाहियात बताते हुए जिप्पी की तरफ से अपना हाथ खींच लिया था। अभी तक बड़े भाई ही थे जिनकी बदौलत जिप्पी की रोजमर्रा की जरूरियात पूरी हो जाया करती थीं। मगर अब वह घोर आर्थिक संकट में घिर गए थे। जिप्पी को जब खुद रोल करके पीनेवाली सिगरेट से उतर कर बीड़ी पर आना पड़ा तो शुरू में उन्हें बहुत तकलीफ हुई। बाद में उन्होंने मन ही मन बड़े भाई के प्रति आभार-सा प्रकट किया जिनकी वजह से वह महसूस कर सके कि सिगरेट बूर्जुआ थी और बीड़ी के जरिये वह सही मायनों में सर्वहारा से जुड़ सके।

जिप्पी को तेज रफ्तार की फर्राटा दौड़ दौड़नी थी। वह नौकरी, विवाह, बच्चे और परिवार को साथ लेकर उस दौड़ को बाधा दौड़ में बदलने को तैयार नहीं थे। उनका मानना था कि लीक पर चलनेवाली, बँधी-बँधाई जिन्दगी जीने वाले देश के लाखों-करोड़ों कीड़ों-मकोड़ों की विचार सरणियों को समाज में परिवर्तन लाने के काम की तरफ मोड़ने के लिए जरूरी है कि कुछ लोग जिप्पी जैसे भी हों जो व्यक्तिगत सुखों और आराम के बारे में न सोच कर समाज के बारे में सोचे। वो जहाँ जाएँ उनका परिवार बन जाए, वो जहाँ खाएँ जहाँ सोएँ उनका घर बन जाए, सारी दुनिया जिनका घर-परिवार हो जिनमें अपने सीमित घरौंदों की चाहना न हो। जिप्पी आदमी-आदमी में भेद करना नहीं जानते थे। वह कहीं भी किसी के भी साथ अपने को खपा लेते। उनके लिए कोई गैर नहीं था, वह सबको पार्टनर कह कर बुलाते और मानते थे कुछ भी किसी का निजी नहीं है, हर चीज में सबकी हिस्सेदारी है, पार्टनरशिप है। वह निजी को ही मनुष्यता का सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे। और मजे की बात यह कि ऐसा सोचते, करते और बरतते समय जिप्पी यह नहीं सोच पाते थे कि सामनेवाला भी उन्हीं की तरह सोचनेवाला है या नहीं।

'तुम भी उन्हीं पूड़ी-पेड़ुकिया बनानेवाली औरतों की तरह सोचती हो पार्टनर, ये मैं नहीं जानता था' - उस दिन उषा की कही हुई बात का जिप्पी ने जिस तरह मजाक उड़ाया उससे दोनों के सम्बन्धों में खरोंच-सी पड़ गई।

'क्यों? ऐसा क्या कह दिया मैंने?' उषा ने तमक कर पूछा।

'हम लोग जिस बड़े उद्येश्य के लिए मिल कर चले हैं उसकी मंजिल यह 'चुटकी भर सिन्दूर' तो नहीं है।' जिप्पी ने उषा के, 'चुटकी भर सिन्दूर' को कुछ खींचते हुए कहा।

'हम लोग नहीं, सिर्फ तुम।' मैंने कभी नहीं कहा कि मुझे पति नहीं चाहिए, मैंने कभी नहीं कहा कि मुझे बच्चे नहीं चाहिए, मैंने कभी नहीं कहा कि मुझे परिवार नहीं चाहिए', उषा ने भी बात को झपट कर पकड़ा और 'हम लोग' से अपने को अलग करते हुए साफ-साफ कहा।

'नहीं पार्टनर, ये तो असंभव है', जिप्पी ने कहने से पहले सोचने में एक क्षण भी नहीं लगाया।

'तो फिर ठीक है', सिर्फ इतना कह कर उस दिन उषा गई तो फिर लौट के नहीं आई।

उषा जिप्पी को पिछले काफी समय से समझा-समझा कर हार गई थी कि इन्कलाब की मशाल लेकर आगे चल रहे लोगों ने, जिनके नाम गिनवाए बगैर जिप्पी का एक जुमला पूरा नहीं होता, पहले अपना और अपने परिवार का पक्का इन्तजाम कर लिया है तब अपना मुट्ठी बँधा हुआ हाथ ऊपर उठाया है। उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जिसके पास चार पैसे कमाने का कोई जरिया न हो। ये वही लोग हैं जिन्होंने जिप्पी जैसे सीधे-सादे नौजवानों को यह समझा कर बरगला रखा है कि नौकरी और परिवार समाज परिवर्तन की राह में सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। उषा जिप्पी की आँखों में उँगली डाल-डाल कर दिखाने की कोशिश करती रही थी कि अपनी हड्डियों की कलम बना कर मजदूरों, किसानों और कामगारों की व्यथा-कथा लिखने का संकल्प लेनेवाले डॉक्टर सूर्य एक डिग्री कालेज में रीडर हैं और रिटायर हो चुकने के बाद भी पचहत्तर से अस्सी हजार रूपये की पेंशन उनके बैंक खाते में नियम से आती रहेगी। उनकी लड़की एम.बी.ए की पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद अमरीका की एक मल्टीनेशनल कंपनी में मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव है और उनका लड़का अमरीका में रह कर कम्प्यूटर का सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने की तैयारी में है। 'पूँजीवादी व्यवस्था का नाश हो' का नारा लगा-लगा कर अपना गला बैठा लेनेवाले डॉ सूर्य ने किस सफाई, मक्कारी और दोगलेपन से अपने बच्चों को पूँजीवाद की गोद में बैठा दिया और उन्हीं डॉ सूर्य ने जिप्पी को एक आफिस की प्रतियोगी परीक्षा में बैठने से यह कह कर रोक दिया था कि पार्टी के बड़े सिद्धांतों के लिए ऐसे छोटे-मोटे बलिदान दिए जाने चाहिए। नतीजा यह है कि मजदूरों, किसानों और कामगारों की तकलीफें याद करके खून के आँसू रोनेवाले डॉक्टर सूर्य अनिद्रा के शिकार हो गए हैं और नींद लाने के लिए मजबूरी में उन्हें रोज शाम को स्कॉच पीनी पड़ती है और यह बात कभी जिप्पी ने ही बताई थी कि उसे दोनों समय खाना इसलिए मिल जाता है क्योंकि माँ उसे अपने साथ बैठा कर खिलाती हैं और माँ के सामने कोई जिप्पी के खाने का विरोध नहीं कर पाता।

उस दिन तो उषा का मन हुआ कि धरती फट जाए और उस जलालत का सामना करने से पहले वह उसमें समा जाए।

हुआ यूँ था कि जिप्पी अपने किसी परिचित के पास सहयोग राशि के रूप में कुछ माँगने गया था। जिप्पी का मानना था कि चूँकि वह समाज और दुनिया को बदलने का बड़ा काम कर रहा है इसलिए उन जैसे लोगों को पालने की पूरी जिम्मेदारी उस समाज के लोगों को उठानी होगी जिनके कल्याण के लिए वह काम कर रहा है। जाने क्या सोच कर या शायद पूँजी के समान वितरण जैसे किसी सिद्धांत को समझाने के लिए उसने उषा को साथ ले लिया। परिचित ने लगभग सवा घंटे उन दोनों को घर के बाहर वराण्डे में प्रतीक्षा करवाई, हालाँकि भीतर से उसके परिचित की अपने बच्चे के साथ खेलने की आवाजों को जिप्पी अच्छी तरह से सुन और पहचान रहा था। जब वह परिचित बाहर निकला तो उसने कुछ इधर-उधर की बातें करने के बाद जिप्पी को यह समझाना शुरू किया कि श्रम का क्या महत्व होता है। जिप्पी को किसी तरह टलता न देख परिचित ने कुर्ते की जेब से पाँच रूपये का एक नोट निकाला और जिप्पी की ओर बढ़ाते हुए बोला - 'आप कुछ करते क्यों नहीं हैं?' जिप्पी को ऐसी सलाहें सुनने की शायद आदत हो चुकी थी, बोला - 'कर तो रहा हूँ समाज के लिए काम।' और नोट को जेब में डालते हुए जोड़ा - 'आपके पास आपकी जरूरत से जो भी ज्यादा है उस पर सबका अधिकार है। आपसे मैं इससे ज्यादा की उम्मीद लेकर आया था।' लेकिन परिचित के ऊपर जिप्पी के साम्यवादी सिद्धांत का रत्ती भर प्रभाव नहीं पड़ा, उल्टे उसने कहा - 'आपका सोचना अपनी जगह ठीक हो सकता है लेकिन मेरे लिए भी हर बार सहयोग कर पाना मुमकिन नहीं हो पाएगा। आप तो पढ़े लिखे आदमी हैं...।' जिप्पी ने उनको सलाम किया, उषा का हाथ पकड़ा और वराण्डे की सीढ़ियाँ उतरने लगा। परिचित ने कहा था कि 'आप तो पढ़े-लिखे आदमी हैं', लेकिन उषा को उसमें ध्वनित हुआ कि, 'हट्टे-कट्टे तो हो कुछ मेहनत क्यों नहीं करते?'

उषा को जिप्पी से धीरे-धीरे अरुचि सी होने लगी। उसने उससे किनारा करना शुरू कर दिया और एक दिन बिलकुल अकेला छोड़ दिया। कुछ दिन बाद पता चला कि 'ज्याँ पाल सार्त्र' इन्तजार करता रहा और उसकी 'सीमोन द बोउवार' बैंक के एक प्रोबेशनरी अधिकारी के साथ शादी करके शहर से चली गई।

पहली मई को दुनिया के मजदूरों का, एक हो जाने का आह्वान करते जिस जिप्पी को अप्रैल के महीने में मरने तक की फुर्सत नहीं रहा करती थी, वह निर्जीव सा पड़ा रहता। आयोजनों की व्यस्तता में कभी-कभी रातों को घर न लौटनेवाले जिप्पी ने घर से निकलना छोड़ दिया। सवेरे से देर रात तक पर्चे बाँटने और दीवारों पर गेरू से नारे लिखने में व्यस्त रहा करने वाले जिप्पी को मुँह ढाँप कर पड़े देखती तो बूढ़ी विधवा माँ का जी कलप उठता। उसे चिंता खाए जाती कि उसकी आँखें बंद हो जाने के बाद जिप्पी का क्या होगा?

बेटे के लिए अकुलाई रहनेवाली माँ ने सन्दूक में बिछे अखबार के नीचे से गणेश प्रसाद की जराजीर्ण हो चुकी कुण्डली निकाली। कुण्डली देख और माँ के ज्योतिषी के पास चलने का प्रस्ताव सुनते ही जिप्पी भड़क उठे। बड़ी मान-मनुहार और अपने आँसुओं का वास्ता देकर बड़ी मुश्किल से माँ जिप्पी को अपने साथ चलने पर राजी कर सकीं। जिन ज्योतिषी के पास वह जिप्पी को ले जाना चाहती थीं उनकी गणना के बारे में प्रसिद्ध था कि उनकी भविष्यवाणी का पोत सात समन्दर की यात्रा में कहीं भी क्यों न हो अपनी यात्रा चाहे पूरी करके या यात्रा में कतरब्योंत करके हर हाल में उनके द्वारा घोषित तिथि पर अपने होतव्यता के तट पर अवश्य ही आ लगता था।

जैसे किसी कसाई को जिबह के लिए ले जाते समय बकरे को पूरी ताकत से खींचना पड़ता है माँ को भी जिप्पी के साथ उतनी ही मेहनत करनी पड़ी। रिक्शे से कूदे पड़ रहे जिप्पी को रोकने में माँ को पुचकारने से लेकर डाँटने तक सभी उपाय करने पड़े। 'एक बार मिल लेने में क्या हर्ज है' के माँ के हथियार डलवा देनेवाले वाक्य के बाद जिप्पी ने कोमल विरोध के साथ बाकी यात्रा शांतिपूर्वक पूरी हो जाने दी।

ज्योतिषी ने कुण्डली अपने सामने फैलाई। जैसे शतरंज का कोई माहिर खिलाड़ी मोहरा बढ़ने से पहले आगे की चालों का हिसाब लगाने के लिए काले-सफेद खानों पर अँगुलियाँ रगड़ने लगता है, कुछ उसी तरह ज्योतिषी ने कुण्डली के बारह खानों में अपनी तर्जनी रखते-उठाते गणना शुरू की। धीरे-धीरे चिंता की गहरी लकीरें उनके माथे पर उभरने लगीं जिनको उनकी एक हथेली कुछ देर सहलाती-सी रही। कौन सा ग्रह किस खाने में बैठा है और किस भाव से किस ग्रह को देख रहा है या कौन सा नीच ग्रह है जो इस देखे जाने को सह नहीं पा रहा है जैसी बातें न तो जिप्पी की समझ में आईं और न उनकी माँ को। जो बात समझ में आई वह यह थी कि जिप्पी पर एक वर्ष मारकेश का प्रबल योग है और अगर समुचित उपचार न किया गया तो अनहोनी घट सकती है। शेरो-शायरी में कहा जाए तो, 'जिक्र उस परीवश का और फिर बयाँ अपना।' एक तो मारकेश की दिल को दहला देने वाली बात और ऊपर से ज्योतिषी के उसको और भी सनसनीखेज बना कर पेश करने से जिप्पी और उनकी माँ के पैरों के नीचे की जमीन ही सरक गई। ज्योतिषी को कुण्डली दिखाई थी यह जानने के लिए कि गणेश प्रसाद नाम्नी जातक का भाग्योदय कब और कैसे होगा, लेकिन भाग्योदय की कौन कहे यहाँ तो सबकुछ अस्त होने की बात कही जा रही थी।

ज्योतिषी ने जिप्पी के लिए महामृत्युंजय स्त्रोत के रोज एक सौ आठ जप करना तजवीज किया। और उससे पहले, 'इसको भी कर लेना' और 'इसका प्रभाव भी अमंगल को काटने में सहायक होता है' कहते-कहते एक सौ आठ बार जपने के लिए पाँच-छः मंत्र और जोड़ दिए। हर मंगलवार को हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमाष्टक और श्रीहनुमत स्तवन् का पाठ ऊपर से।

आसन्न मृत्यु का ज्योतिषी ने ऐसा भयावह चित्र उपस्थित किया कि जिप्पी ने संकट टलने तक के लिए रोज लगभग दो घंटे की पूजा करना स्वीकार कर लिया।

ज्योतिषी ने पूजा का प्रारम्भ, 'ऊं गं गणपतये नमः' के आठ जाप के बाद एक सौ आठ बार गायत्री मंत्र के जाप से करना बताया था। जिप्पी ने पहले मंत्र को अँगुलियों के पोरों पर गिन के पूरा किया और फिर एक सौ आठ बार गायत्री मंत्र का जाप करने के लिए रूद्राक्ष की माला हाथ में उठा ली। जैसा कि बताया गया था उन्होंने तर्जनी को माला के स्पर्श से बचाए रखते हुए मंत्रोच्चारण के साथ माला का एक-एक मनका सटकना शुरू किया।

'ऊं भूर्व भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात' ...' ऊं भूर्व भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम 'ऊं भूर्व भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम... 'ऊं भूर्व भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम... 'ऊं भूर्व भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम... अभी दस-बारह मनके ही आगे सरके होंगे कि जिप्पी को ध्यान आया कि फिल्म 'मोहब्बतें'में अमिताभ बच्चन ने स्कूल के प्रिसिपल के रोल में छात्रों के सामने गायत्री मंत्र का पाठ करते समय जूते पहन रखे थे, इसको लेकर कितना हंगामा मचाया गया... 'ऊं भूर्व भुवः स्वः तत्सवितुर्वेण्यम'... 'ऊं भूर्व भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम...' अरे, जूते नहीं उतारे तो नहीं सही, ऐसी कौन सी प्रलय हो गई... 'ऊं भूर्व भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम... माँ की गोद में बच्चा ऐसे ही गंदे-संदे पैर लेकर चढ़ जाता है तो क्या माँ अपने बच्चे को प्यार करना छोड़ देती है? 'ऊं भूर्व भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम... फिर वह तो गायत्री माता ठहरीं। क्या इतने पर वह क्रुद्ध हो जाएँगी कि उनको याद करते हुए आदमी ने जूते क्यों पहन रखे थे? किसी न किसी बहाने ये सब भी तालिबान बनना चाहते हैं... 'ऊं भूर्व भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम...

गायत्री मंत्र के बाद जिप्पी ने अगला मंत्र शुरू किया - 'ऊं रां राहवे नमः' 'ऊं रां राहवे नमः'... 'ऊं रां राहवे नमः'... ये राहवे किसे कहा गया है? इस मंत्र का मतलब क्या है? किसको नमन किया गया है? इस तरह बिना अर्थ समझे बड़बड़-बड़बड़ करते जाना कितना वाहियात है... 'ऊं रां राहवे नमः'... 'ऊं रां राहवे नमः' ज्यातिषी जी से फोन करके इन सारे मंत्रों के अर्थ जानने चाहिए। मगर फोन कैसे किया जाए? 'ऊं रां राहवे नमः'... 'ऊं रां राहवे नमः' बड़े भइया फोन में ताला लगा कर रखने लगे हैं। उसकी चाबी उनके और भाभी के ही पास रहती है। सात-आठ किलोमीटर दूर ज्योतिषी जी के यहाँ आने-जाने का न तो कोई साधन है और न मन में कोई उत्साह... 'ऊं रां राहवे नमः 'भाई साहब दिखाते तो ऐसा हैं जैसे उनसे बड़ा विदेह कोई पैदा नहीं हुआ और छोटा भाई कहीं एक फोन न कर ले इसके लिए फोन में ताला... 'ऊं रां राहवे नमः'... 'ऊं रां राहवे नमः' उस दिन तुमको पता लगेगा कि तुम कितने छोटे हो जिस दिन तुम्हें लोग जिप्पी के बड़े भाई के नाम से जानेंगे... 'ऊं रां राहवे नमः' पाँच फुट सात की तुम्हारी लोथ सिर्फ आफिस में लेजर भरने, नटई तक भर के खाना भकोसने और रात को औरत के साथ सट कर सोने के लिए ही बनी है...

आसनी पर एक ही मुद्रा में पालथी मार कर बैठे रहने से एंड़ी के पास की हड्डी गड़ने लगी तो जिप्पी ने आसन बदला। 'ऊं अं अंगारकाय नमः'... 'ऊं अं अंगारकाय नमः' अंगार शब्द आया तो जिप्पी को ध्यान हो आया कि उषा साथ थी तो उनके जीवन में भी भरपूर ऊष्मा थी जैसे राख के ढेर के नीचे दबे अंगार में होती है। जिप्पी मन को भटकने से जितना ही रोकना चाहते हैं वह उतना ही हाथ से निकला जाता है। खासकर पूजा करते समय तो यह न जाने कहाँ-कहाँ चला जाना चाहता है।

' ऊं अं अंगारकाय नमः' उन्होंने मन को इधर-उधर जाने से रोकने के लिए आँखों को उस कागज पर केन्द्रित किया जिस पर सारे मंत्र लिखे हुए थे। मन आँखों के अधीन थोड़े ही था जिसको आँखें कहीं जाने से रोक ले जातीं। आँखें लिखा हुआ मंत्र देख रही थीं, जीभ उसका उच्चारण कर रही थी, अँगुलियाँ माला के मनके गिन रहीं थीं, लेकिन मन? वह तो उषा के साथ एक दोपहर किए गए संभोग को याद कर रहा था।

'ऊं अं अंगारकाय नमः'... ' ऊं अं अंगारकाय नमः'... तो क्या उस सब का कोई मतलब नहीं था? क्या उषा के लिए वह सारा कुछ प्यास लगने पर पानी पी लेने से ज्यादा कुछ नहीं था? 'ऊं अं अंगारकाय नमः'... ' ऊं अं अंगारकाय नमः'... मैंने तो कहीं पढ़ा था कि एक स्त्री किसी पुरूष के सामने रो ले तो वह मानसिक रूप से और कपड़े उतार दे तो आत्मिक रूप से उस पुरूष के प्रति समर्पित मानी जाती है... उंह,मनुष्य से जुड़े मनोवैज्ञानिक की जानकारी होने का दावा करनेवाले सारे विद्वान जुट जाएँ तो भी पता नहीं लगा सकते कि... कौन,कब क्या करता है और क्यूँ करता है, 'ऊं अं अंगारकाय नमः'... 'ऊं अं अंगारकाय नमः' इस बात पर तो उषा ने भी हामी भरी थी कि विवाह के हाथों हम प्रेम की हत्या नहीं होने देंगे। हम दोनों ही इस बात पर एकमत थे कि इस तरह साथ रहने में एक-दूसरे के प्रति किसी तरह की शंका नहीं होगी कि कोई किसी को कभी छोड़ कर अलग हो जाएगा। इस तरह साथ रहने में एक-दूसरे को पाने की इच्छा हमेशा नयी बनी रहेगी। एक-दूसरे से ऊबने, अविश्वास करने या एक-दूसरे के प्रति लापरवाह हो जाने की कोई जगह नहीं होगी... 'ऊं अं अंगारकाय नमः'... 'ऊं अं अंगारकाय नमः' ये बातें कोई जरूरी नहीं कि कही जाएँ तभी पता लगें। जैसे प्यार किया जाना नहीं छिपता वैसे ही उपेक्षा भी नहीं छिपती... मैं उसे प्यार करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहता था लेकिन पता लगने लगा था कि उसे अब ऐसे किसी मौके की तलाश नहीं रह गई थी...

'ऊं अं अंगारकाय नमः'... 'ऊं अं अंगारकाय नमः'... खुद तो अपने पति के साथ ऐश कर रही होगी और मुझे ऐसे रेगिस्तान में अकेला छोड़ गई जहाँ तपती रेत में मुझे अकेले ही चलना है... इससे बाहर निकलने के सारे रास्तों का पता तो उसे ही था।

यह पाखण्ड है। जब मन न लगे तो ऐसी पूजा का मतलब क्या है? भगवान, अगर वह कोई होता है, तो उसके साथ भी सौदेबाजी? महामृत्युंजय मंत्र का जाप करके क्या मैं मंत्र की शक्ति का असर जाँचने जा रहा हूँ? या मृत्यु की आशंका से सहम कर मंत्रों की शरण में आ गिरा मैं कोई लाचार आदमी हूँ? नहीं, मुझे मृत्यु से कोई डर नहीं लगता... डर नहीं लगता तो उस दिन ज्योतिषी से क्यों नहीं कह दिया यह सब तुमसे नहीं हो सकेगा क्योंकि तुम्हारा इस सब पर कोई यकीन नहीं है... तीन महीनों से तुम ये कर क्या रहे हो? होठों पर मंत्रों का जाप पूरा हो भी नहीं पाता और उषा के होठों का गीलापन वहाँ पहले तैरने लगता है। जब एक अनुष्ठान शुरू ही कर दिया है तो उसे पूरी ईमानदारी से पूरा करो नहीं तो छोड़ो - जो होना होगा देखा जाएगा।

ठीक है, जिप्पी ने मन ही मन संकल्प किया अब वह अपना सारा ध्यान पूजा पर ही केन्द्रित करने की कोशिश करेंगे।

जिप्पी ने महामृत्युंजय का पाठ शुरू किया।

'ऊं त्रयंबकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टि वर्धनम् ।

उर्वा रूक्मिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।'

'ऊं त्रयंबकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टि वर्धनम् ।

उर्वा रूक्मिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।'

उन ज्योतिषी जी ने बताया था कि महामृत्युंजय का पाठ आवश्यक नहीं कि अपने लिए ही किया जाए, इसका पाठ किसी और के प्राण बचाने के लिए भी किया जा सकता है... 'ऊं त्रयंबकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टि वर्धनम् उर्वा रूक्मिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।' ' ऊं त्रयंबकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टि वर्धनम् ।उर्वा रूक्मिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।' ये सब बेकार की बाते हैं। हिल्ले रोजी - मौत बहाना ऐसे ही थोड़ी कहा गया है। ऐसे मंत्र पढ़ने से अगर मौत को रोका जा सकता होता तो कोई कभी मरे ही नहीं... 'ऊं त्रयंबकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टि वर्धनम्... लेकिन मौत का डर ऐसा ही होता है कि आदमी कुछ भी करने पर राजी हो जाता है... 'ऊं त्रयंबकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टि वर्धनम्... अगर साथियों को पता चल जाए कि पार्टनर पूजा-पाठ में फँस गया है तो सब मिल कर मेरे ऊपर टूट ही पड़ेंगे। मैंने पार्टी के लिए उसके सिद्धांतों के लिए अपना पूरा जीवन होम कर दिया। घर, बूढ़ी माँ, उषा और अच्छे भले बन सकते कैरियर की तरफ से पीठ फेर लेने के बावजूद यह लाँछन लगते जरा देर नहीं लगेगी कि जिप्पी बाहर से कुछ और दिखता है भीतर से कुछ और है... 'ऊं त्रयंबकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टि वर्धनम्... वैसे कौन जाने वो सब भी चुपके-चुपके करते ही हों पूजा... जैसे मैं कर रहा हूँ... कौन जाने क्या? कामरेड आदित्य ने लड़की की शादी की थी तो निमंत्रण पत्र के ऊपर गणपति विराजमान ही थे... 'ऊं त्रयंबकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टि वर्धनम्... भीतर की इबारत भी 'गजाननं भूतगणादिसेवितम् कपित्थ जम्बूफल चारूभक्षणम्' से ही शुरू थी फिर अगर मैं अपने संस्कारों को पकड़े रह कर पूजा कर रहा हूँ तो कौन सा गुनाह कर रहा हूँ... 'ऊं त्रयंबकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टि वर्धनम्... नहीं, मेरे पूजा करने की बात पता न चले वही अच्छा है।

जिप्पी को ध्यान नहीं रहा कि वह मंत्र का एक सौ आठ बार से ज्यादा जाप कर गए हैं। उन्होंने माला फेरना बंद किया और देवी माँ की स्तुति के साथ पूजा समाप्ति के लिए मंत्र पढ़ना शुरू किया - 'ऊं ऐं हृीं क्लीं चामुण्डाये विच्चे... 'ऊं ऐं हृीं क्लीं चामुण्डाये विच्चे... 'ऊं ऐं हृीं क्लीं चामुण्डाये विच्चे...

तभी टेलीफोन की घंटी बजी।

'कौन? जिप्पी भइया?' माँ ने फोन पर खुद को आश्वस्त करने के लिए पूछा तो जिप्पी को पता लगा कि फोन उसके लिए है।

जिप्पी उच्चारण के साथ मंत्र पढ़ना समाप्त कर चुके थे और जैसा कि बताया गया था अब उन्हें मुँह में आचमन का जल भर कर माँ की स्तुति का मंत्र मन ही मन में बोलना था। उन्होंने जल को मुँह में ही भरे-भरे कान के पास तर्जनी को गोल-गोल घुमाते हुए जनेऊ चढ़ाने का संकेत करके माँ को समझाना चाहा कि वह फोन करनेवाले को बता दें कि जिप्पी शौचालय में हैं। संस्कारी और धर्म परायण माँ पूजा और शौचालय को जोड़े जाने तक नहीं पहुँच पाई। उनको लगा कि जिप्पी टेलीफोन के गोल डायल के आकार में तर्जनी घुमा कर यह कहने का संकेत कर रहे हैं कि जरा देर बाद उन्हें फिर फोन कर लिया जाए।

'जिप्पी भइया पूजा कइ रहे हैं, को बोलि रहा है? भइया, जरा देर बाद फिर कइ लियो', माँ ने कहा तो जिप्पी ने आचमन का मुँह में भरा पानी, पान की पीक की तरह पिच्च से एक तरफ थूक दिया और गुस्से में दाँत किटकिटाते हुए सोचा - 'औरत की जात... इशारा समझने की अकल होती तो औरत क्यों होती?


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हिंदी समय में नवनीत मिश्र की रचनाएँ