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कविता

इतिहास-घड़ी
राजेंद्र प्रसाद सिंह


इतिहास की घड़ी में
सुबह के पाँच बज गए...,
घड़ी का एक काँटा तना,
- ध्रुव तारे के पाँव में चुभ गया,
दूसरा काँटा झुका,
- गर्भिणी धरती की नाभि में धँस गया,
ध्रुव तारा लंगड़ाता है,
धरती लहू न रुक पाता है,
ओ ऽऽ प्रधानमंत्रियों ऽ !
क्या... तुम (?)
ऐसे 'सर्जन' हो,-
जो एक ही छन में औ' एक ही छुरी से
पाँव के काँटे औ' गर्भ के शिशु को
निकाल ले ??
क्या तुम ऐसे 'सर्जन' हो ???

 


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