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कविता

उषा-स्वस्ति
राजेंद्र प्रसाद सिंह


प्यार की
दूरागता पहली पुजारिन-सी
आ रही नभ में उषा !
मौन संशय की अँधेरी छाँह
घिर पड़ी धुँधले क्षितिज पर,
- दूर नावों पर ;
अब उसे सस्मित समेटे जा रही
कल्पना की दिशा !
यही सुधिमय समर्पण की घड़ी,
छाया-जगत को
यों चूमती अरुणिमा,
जैसे बरसती हो
उच्छ् वसित आसंग की माधुरी l
हाँ, चिरंतन प्रीति की प्रतिबिंब गाथा-सी
तरंगित रंगिनी गंगा;
एक डुबकी ले सहज अभिषेक को
आ गई जल में उषा !
ओ उषा !
ओ चेतना की माँ !
(ऐसी सन्निकटता के लिए करना क्षमा),
रह रहा कैसे तुम्हारा रहस और अखंड यौवन,
दिप रहा सद्यस्क अंगों में भला कैसे -
आनंद यह निस्संग ?
दे रही क्यों
जरठता को दान शैशव का ?
मैं मुसाफिर वंचना की रात का,
विश्वास भी अपमान !
लो, तभी यों हो गई ओझल
स्वयं उजला अँधेरा ओढ़कर
यह मुँहजली मेरी तृषा !
ओ डूबती जल में उषा !

 


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