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कविता

मुक्ति-क्षण
राजेंद्र प्रसाद सिंह


कुछ ऐसा खुलकर खुलना चाह रहा मन
इस क्षण
कि अँगूठी भी बंधन लगती है;
लूँ इसे निकाल,
छिपा लूँ कहीं बगल में,-
इसलिए
कि सारे बंधन छिपा-छिपाकर
आदमी सदा
अनुभूति जगाता रहता,
जिंदगी कभी जिससे जीवित लगती है !
तो...
इस उन्मुक्त निमिष में
अंतर नहीं अमृत औ' विष में,
जितनी मादक -
मुसकान मधुर लगती है,
उतनी मोहक -
पीड़ा लगती क्षण-दिशि में !
इस उन्मुक्त निमिष में -
मेघ-भरे दिन का धूमिल मुख
गीला-गीला,
रूखे-सूखे पेड़ों का रुख
पीला-पीला,
धूल-भरी भूली बेखौफ हवा के झोंके...
कौन विकल गाने की उमड़ती धुन को रोके -
"तुझे ओ बेवफा, हम जिंदगी का आसरा समझे,
बड़े नादान थे हम हाय ! समझे भी तो क्या समझे ?"
- बहुत भारी
भरे इस आसमाँ के
बहुत नीचे, बहुत हल्की हवा में -
उलझती साँस की घन जालियों से
कढ़ी आती हृदय में तान तीखी, -
किसी की धड़कनों के स्वप्न की
लपटों सरीखी, -
कहीं मानस-क्षितिज के पार की
अमराइयों से;
नहीं जो ठीक से अब तक कभी
इस पार दीखी !
बहुत निर्बंध होना चाहता मन, -
दिलाने को यकीं फिर से उसे गहराईयों का,
छिपाए है जिसे अब तक प्रतीक्षा का पठार
कि होगा तो कभी साकार खुद
विश्वास का आधार !
बंधनों के पार थमना चाहता मन...,
आज, इस क्षण, आज खुलना चाहता मन !

 


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