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कविता

शरद गीत
राजेंद्र प्रसाद सिंह


शरद की स्वर्ण किरण बिखरी !
दूर गए कज्जल घन, श्यामल -
अंबर में निखरी !
शरद की स्वर्ण किरण बिखरी !

मंद समीरण, शीतल सिहरण, तनिक अरुण द्युति छाई,
रिमझिम में भींगी धरती, यह चीर सुखाने आई,
लहरित शस्य-दुकूल हरित, चंचल अंचल-पट धानी,
चमक रही मिट्टी न, देह दमक रही नूरानी,

अंग-अंग पर धुली-धुली,
शुचि सुंदरता सिहरी !
राशि-राशि फूले फहराते काश धवल वन-वन में,
हरियाली पर तोल रही उड़ने को नील गगन में,
सजल सुरभि देते नीरव मधुकर की अबुझ तृषा को,
जागरूक हो चले कर्म के पंथी ल्क्ष्य-दिशा को,

ले कर नई स्फूर्ति कण-कण पर
नवल ज्योति उतरी !
मोहन फट गई प्रकृति की, अंतर्व्योम विमल है,
अंधस्वप्न फट व्यर्थ बाढ़ का घटना जाता जल है,
अमलिन सलिला हुई सरी,शुभ-स्निग्ध कामनाओं की,
छू जीवन का सत्य, वायु बह रही स्वच्छ साँसों की,

अनुभवमयी मानवी-सी यह
           लगती प्रकृति-परी !

 


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