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कविता

विरजपथ
राजेंद्र प्रसाद सिंह


इस पथ पर उड़ती धूल नहीं ।
खिलते-मुरझाते किंतु कभी
तोड़े जाते ये फूल नहीं ।

खुलकर भी चुप रह जाते हैं ये अधर जहाँ,
अधखुले नयन भी बोल-बोल उठते जैसे;
इस हरियाली की सघन छाँह में मन खोया,
अब लाख-लाख पल्लव के प्राण छुऊँ कैसे ?
अपनी बरौनियाँ चुभ जाएँ,
पर चुभता कोई शूल नहीं ।

निस्पंद झील के तीर रुकी-सी डोंगी पर
है ध्यान लगाए बैठी बगुले की जोड़ी;
घर्घर-पुकार उस पार रेल की गूँज रही,
इस पार जगी है उत्सुकता थोड़ी-थोड़ी ।
सुषमा में कोलाहल भर कर
हँसता-रोता यह कूल नहीं ।

इस नए गाछ के तुनुक तने से पीठ सटा
अपने बाजू पर अपनी गर्दन मोड़ो तो,
मुट्ठी में थामें हो जिस दिल की चिड़िया को
उसको छन-भर इस खुली हवा में छोड़ो तो ।
फिर देखो, कैसे बन जाती है
कौन दिशा अनुकूल नहीं ?
इस पथ पर उड़ती धूल नहीं ।

 


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