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कविता

महापुरुष
राजेंद्र प्रसाद सिंह


ओ अकेला सूर्य ! तू कैसा उगा है !
गूढ़ अधियाली लपेटे थी जगत को,
ऊब-डूब असंख्य तारे कुलबुलाते थे घुटी सी साँस लेते,
बीतते थे क्षण, कि जैसे आप ही
गीला, बहुत ढीला, अमित काजल पसरता जा रहा हो
थिर हवा के श्याम गालों पर !
उन्ही बेचैन तारों की सदा अवरुद्ध इच्छाएँ सिमटती ही रहीं,
एक होने का, सदा बँटती रहीं,
और जब वे हो गईं मिल एक-हो उठीं साकार,
- एक रूपाधार,
- उठ पड़ा वह चाँद, जैसे मौन दिशियों का अमल आह्लाद,
तारकों का शुभ्र 'मानस-पुत्र' हास जिसका स्वप्नमय इतिहास,
चाँदनी वह, या कि छाई सृष्टि की ही प्यास !
कल्पना मन की लिए जब चाँद आया,
तारकों की पुतलियों का दाह भी वह बाँध लाया,
और, उसको ज्योति कह निज को लगा छलने,
तारकों का चाँद तबसे ही लगा ढलने !
और, तेरा दूत बन वह छिप गया निरुपाय,
वह अँधेरा भी छिपा ले नखत का समुदाय !
प्रकट केवल कर रह गया वह लोचनों का दाह जो कहला रहा आलोक,
तू तब ओ अकेला 'चक्षु-पुत्र' अशोक !
तू उगा था प्रथम ऋषि जनमा धरा पर,
देख पाया जो न, वह तम, उन सितारों को,
वह चाँदनी भी नहीं, सिर्फ शायद एक पीला चाँद,
प्रखर आशीर्वाद से अभिषिक्त करने को उसे ही, जग पड़ा है !
ओ अकेला सूर्य ! तू कैसे उगा है !
× × ×
ओ अकेला शिखर ! तू कैसे खड़ा है !
अधजमे, ताजे धरातल में हुई हलचल,
प्रकृति की उथल-पुथल अथोर, तू सिकुड़न हुआ,
पर बन गया कैसे स्वयं विभ्राट,
यह संकोच का भी रूप खूब विराट !
हिम-मुकुट तेरा सुशीतल,
छू सुलगती धूप से ही तप्त स्वर्ण हुआ समुज्ज्वल,
मणिमयी वसुधा अनेकों रत्न, कौशल, शस्य से
अभिषेक करने को तुम्हारा, सज उठी,
निर्भर-निनाद अबाध गूँजा, कीर्ति की भी विजय-दुंदुभि बज उठी !
चंद्र-चूड़ हुए स्वयं तेरी गुफा में लीन,
धर्म की गंगा मुकुट पर हो चली आसीन,
बस गई अलका तुम्हारी गोद में,
'कालिदासी' निशि-दिवस कटने लगे आमोद में !
घाटियों के तरु, लता, तृण विहग, पशु, जन,
शिला-खंड सभी हुए चिरदास,
अंग-अंग अनंग-बालाएँ लिपटतीं
बादलों में लगीं रचने इंद्रधनुषी रास !
तू उठा या प्रथम नृषति उठा धरा पर
धर्म, पौरुष धैर्य के दर्पी विनय सा,
जो सुरक्षा को उठाता ध्वंस की तलवार,
जिसने कर दिया जग को अरक्षित शंकनीय अपार !
'एक' की अधिकार-लिप्सा बन वाही तो
मनुज के उद्बुद्ध मन में भी गड़ा है !
ओ अकेला शिखर ! तू कैसे खड़ा है !
× × ×
ओ अकेला सिंधु ! तू कैसे भरा है !
तू अनादि-अनंत जग की चेतना का
ज्वार-लहरों से भरा इतिहास रे !
मनुजता के ज्योति-मंडल में तरंगित,
चिंतना का चिरअतल आवास, रे !
तू समस्त परंपराओं को ग्रहण कर
महानदियों का महासंगम हुआ,
आत्मसात सभी रसों को कर गया; पर,
बोल, क्यों खारा सदैव स्वयं हुआ !
यह अकेला स्वाद युग-युग से धरा है !
ओ अकेला सिंधु ! तू कैसा भरा है !
तू समन्वय, का अनोखे संतुलन का
रूप व्यापक,- अनल-जल, पीयूष-विष का हास !
रत्न, मणि-गण ऊर्मियों के दास !
स्थल सदा पद पूजता, वरदान बरसाता सदा आकाश !
तू प्रवाहों से सलिल को भर स्वयं में
चिंतना के ताप से बादल बनाता -
छोड़ देता उन्नयन की राह में,
वायु की संघर्ष-गति से उलझते वे,
बरस जाते कहीं नीली शून्यता की छाँह में !
पर, कभी जो वज्र गिरता छूटकर,
भूमि हाहाकार करती फूटकर,
बीज उसका बिजलियों में, बिजलियों का बीज भी -
तेरे अचेतन में, कहीं दबकर पड़ा है !
क्या इसी कारण बहुत खारा, बहुत खारा -
अकेला स्वाद युग-युग से जड़ा है !
ओ अकेला सिंधु ! तू कैसा भरा है !
तू चिरंतर, या चिरंतर विष्णु का अवतार,
अग्रदूत मनुष्यता का जो रहा साकार !
किंतु जो घिसकर सभी से और बँध कर भी
रह गया अपनी अनंत अगाधता में मर्म से एकांत,
लग नहीं पाया गले कोई लिपट कर जो सका पहचान,
पूजता ही रह गया उसका सुखद पद-प्रांत !
रस न उसका पी सका कोई पिपासु, अशांत !
स्वाद, - खारा स्वाद,
आत्म्बद्ध विशिष्टता का स्वाद,
शक्तिबद्ध स्वनिष्ठता का स्वाद,
बंधनों का एक खारा स्वाद,
दमित मन की बिजलियों का हृदय-हारा स्वाद,
स्वाद यह आतंक की दीवार बन
तेरे, जगत के, बीच निश्चल-सा अड़ा है !
ओ अकेला सिंधु ! तू कैसा भरा है !

 


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