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कविता

देखकर फिर गैर को
राजेंद्र प्रसाद सिंह


देखकर फिर गैर को
अपने लिए कुछ जगा,
जैसे प्यार कोई ठूँठ...
जो आदि से चल अंत तक आया नहीं;
मन बँधा चुप्पी से, रहेगा लौटता...!

कल्पना के
शिखर से उतरी अपर धारा,
त्वरा से दौड़ती
कोई स्वचालित उ...ष्मा...
देखता हूँ, - पथ नहीं
गंतव्य का सहचर,
न होगा अस्तु
कोई अनलिखा आदेश;
छंद है हिमसार-शीतल बंध,
वस्तु-व्यापी कौन हो ?

अग्रिम क्षमा की नियति क्या ?
मेरी सुकैशी हँस रही, -
नयनाभिराम प्रगामिनी...
नि शेष द्रुत संगीत कोई - मूक,
रेखांकन नहीं होगा - प्रवर्त्तन का,
जिजीविष के लिए निरपेक्ष ही,
         विश्रब्ध ही,
         जीना-जिलाना
              मार्ग;
यही है सृष्टि, ...बड़ी महार्घ !

 


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