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कविता

यहीं, - गहरे सन्नाटे में
राजेंद्र प्रसाद सिंह


यहीं, - गहरे सन्नाटे में, - यहीं
सिर्फ इसलिए कि यहीं आसानी है
ध्यान देने की, उस गूँज पर, जो
सारी पहचानी आवाजों की पृष्ठभूमि में
और इसीलिए उनके बगैर भी
निरंतर बजती रहती है;
जिसके आधार नहीं रहने से
कोई आवाज नहीं गूँजेगी;
यहीं, अनाहत के आहत होने पर भी,
अनहद की हदें जोड़ने पर भी
सुनेंगे हम, - प्रक्रिया की गूँज,-
अपनी धमनियों में, - यहीं
जुड़े हुए सीनों के गहरे सन्नाटे में, यहीं !

 


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