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कविता

लहरों में आग रुपहली
राजेंद्र प्रसाद सिंह


लहरों में आग रुपहली,
ओ S S पुरवाई !
एक मौन की धुन से
हार गई शहनाई ।

जामुनी अँधेरे की,
गजरीली बाँहों में,
एक नदी कैद है निगाहों में ।
रूठ नहीं पाती-
इन साँसों पर झुकी हुई परछाई ।

चाँद बिना आसमान
डूब गया धारा में,
लहक भी न उठती
तो हाय ! क्यों न बुझती
अब इन ठंडे शोलों की अंगड़ाई

 


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