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कविता

आज संस्कारों का अर्पण लो
राजेंद्र प्रसाद सिंह


आज संस्कारों का अर्पण लो !
गुहा-मनुज मुझ में चुप / प्रस्तर-युग मौन,
धातु-छंद से मुखरित / करतल-ध्वनि कौन ?
मध्ययुगी रक्त-स्नात यौवन का दर्पण लो !
आधुनिक मनुज मेरे / नख शिख में लीन,
विद्युन्मुर्च्छिता / धरा में यंत्रासीन,
'इहगच्छ, इहतिष्ठ' - अजिर का समर्पण लो ।
लो, अब स्वीकारो यह व्यापक संदेह,
अपने प्रति शंका का उद्वेलित गेह,
विगत के कुशासन पर आगत का तर्पण लो
आज संस्कारों का अर्पण लो ।"

 


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