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कविता

काँपे लगैं मुदइया हो
चंद्रदेव यादव


हइया हो! हइया हो
जोर लगा के भइया हो
धक्‍का अइसन दे द जेसे
काँपे लगैं मुदइया हो

खून-पसिन्‍ना एक हो गइल
जिनिगी माटी-धूर हो गइल
चाकर होके पैदा भइलीं
आपन किस्‍मत घूर हो गइल
केतना जोर-जुलुमवा सहलीं
बन के गोरू-गइया हो

हमरे खून से सींचल जाला
ओनके सुख के बगिया हो
माई-मेहर ओनकर भइली
अँचरा लागल दगिया हो
सगरी उमिर महुरवा खइलीं
अमिरत सरग तरइया हो

बरहोमास पितरपख घर में
बड़का घरे देवारी हो
टुटही छानी गिरे कराइन
रोइ-रोइ रात गुजारीं हो
बरखा में बदरा घुसि आवे
माघे माह जोन्‍हइया हो

आपन हक हम लेके रहबै
अब ना करब गुलामी हो
घुरहू-निरहू सब केहु आवऽ
करऽ न अब नादानी हो
अपने हक के खातिर अब हम
करबै हाथा-पइया हो

तोहर कनुनिया नाहीं मनबै
जम के करब लड़इया हो
हमरी धरती हमके दे द
एहि में तोर भइलया हो
डंका देके लंका जारब
बनिहैं महल मड़इया हो

 


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