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संस्मरण

बाबा
जगमोहन फुटेला


मैं यूपी के एक बड़े अखबार से सम्बद्ध था। पंतनगर में पढ़ाई के दौरान मेरे मित्र हो गए एक बुद्धिजीवी महाबीर प्रसाद कोटनाला मिले। उन ने बताया कि प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी दीक्षांत समारोह पर आने को हैं और उपकुलपति ने एडमिन ब्लाक के पिछवाड़े से दीवार तोड़ कर इंदिरा जी का समारोह स्थल पर जाने का रास्ता बदल दिया है। अब वे खुली तरफ से आएँगी और सीनेट से पास कराए बिना बहुत जल्दबाजी में एडमिन ब्लाक के सामने लायब्रेरी के ऊपर लिफ्ट के नाम से एक और ऊँची छत डाल दी गई है। अगर कोई वहाँ से उन्हें निशाना बनाना चाहे तो इंदिरा जी कम से दस मिनट तक उस के निशाने पर होंगी।

कोटनाला क्लर्क थे। एक्टिविस्ट किस्म के आदमी। हम जुट गए जानकारियाँ जुटाने में। और जो जानकारियाँ मिलने लगीं, वे बहुत चौंकाने वाली थीं। हमने एक दिन इंदिरा जी के समारोह स्थल पर प्रवेश के संशोधित किये गए प्रवेश मार्ग से देखा। पाया कि वे उस छत पे अगर कोई शूटर हो तो उसके निशाने पर होतीं। समारोह एडमिन ब्लाक के पिछवाड़े होना था। लायब्रेरी एडमिन ब्लाक के सामने थी। अव्वल तो आसानी से शक ही नहीं होता कि गोली आई कहाँ से? होता भी तो एडमिन ब्लाक के पिछवाड़े से भाग कर तब तक लायब्रेरी की भीड़ में खोये या वहां से भी भाग निकले शूटर को पकड़ पाना आसान नहीं होता।

हमने थोड़ी और मेहनत की तो जानकारियाँ जैसे अपने आप मिलने लगीं। हमें पता लगा कि यूनिवर्सिटी के एक शोध के साथ दो ऐसे विदेशी प्रोफेसरों को सम्बद्ध किया गया था जिनका उस विषय विशेष पर कोई अध्ययन ही नहीं था। लेकिन इस शोध में सहयोग के बहाने वे आते-जाते रहे थे। उनके यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस के बजाय उपकुलपति के घर पर रुकने के प्रमाण भी मिले। ऐसा इसलिए किया होगा कि उस दिन उनकी आमद को छुपाया जा सके। ऐसी भी जानकारी मिली कि उन्हें लाने के लिए जो कार भेजी गई उसकी लागबुक नहीं भरी गई।

समरोह स्थल पर इंदिरा जी के प्रवेश मार्ग में बदलाव, लायब्रेरी की छत पर छत, ये शोध, बिना लागबुक के आमद और निवास। धीरे-धीरे सब समझ आने लगा था। एक दिन अचानक एक रिटायर्ड पुलिस आफिसर मिल गए किसी परिचित बुजुर्ग के घर पर। वे खुफिया तंत्र में रह चुके थे। संयोग से कुछ जानकारी उन्हें भी थी। उनने बताया कि वह उपकुलपति खुफिया एजेंसियों के राडार में होने और इसकी जानकारी ऊपर तक भेजी जा चुकी होने के बावजूद अपने पद पर था। उनने बताया कि उनकी जानकारी के मुताबिक वह एक विदेशी खुफिया तंत्र के लिए काम करता है। इस पूर्व अधिकारी ने मुझे दो वैज्ञानिकों के नाम बताये जो उस विदेशी खुफिया तंत्र के आदमी थे और जिन्हें उपकुलपति शोध के बहाने यूनिवर्सिटी में बुलाता रहता था। ये नाम ठीक वही थे जो मुझे और कोटनाला को अपनी छानबीन के दौरान मिल चुके थे।

आप प्रधानमंत्री जैसी हस्ती की हत्या की साजिश का आरोप यूँ ही नहीं लगा दे सकते किसी पर भी। खासकर जब वह उपकुलपति जैसा आदमी हो। और आपकी अपने शक को यकीन में बदलने के लिए उनकी लागबुक जैसी चीजों तक पहुँच भी न हो। लेकिन मैं तथ्यों की सीसीटीवी जैसी पुष्टि होने तक उतने बड़े हत्याकांड के हो जाने का इंतजार भी नहीं कर सकता था। मेरा पंतनगर में पढ़े होना और कोटनाला का उससे भी पहले से वहाँ रह रहे होना काम आया। हमने कार की उस लागबुक को ढूँढ़ निकाला जिस कार में वे दोनों रामपुर रेलवे स्टेशन से लागबुक में एंट्री के बिना लाये गए थे। उनसे एक गलती यह हो गई कि वे पंतनगर आने से पहले रामपुर में एक अधिकारी के रुके और वहाँ चाय पी थी। ये हमें ड्राइवर ने बताया और फिर किसी बहाने से एक पत्रकार के रूप में मैंने उस अधिकारी के स्टाफ और फिर खुद उस अधिकारी से इसकी पुष्टि भी कर ली। हमने ये भी पता लगा लिया था कि उन दोनों के उस विषय का ज्ञाता न होने के बावजूद उस शोध से सम्बद्ध करने पर स्वयं यूनिवर्सिटी के उस विभाग में हैरानी और नाराजगी थी। कुछ जानकारी हमें हल्द्वानी के एक कालेज से भी मिली जो अपरोक्ष रूप से उस देश की आर्थिक मदद से चलाया जाता माना जाता था।

मैंने रिपोर्ट लिखी। लेकिन जिस अखबार के लिए मैं काम करता था उसने और पुख्ता तथ्यों का एतराज लगाके छापने से इनकार कर दिया। एक-दो और अखबारों ने भी। हम चिंतित थे। दिक्कत यह थी कि पत्रकारिता में मैं तब इतना बड़ा नाम भी नहीं था कि आँख मूँदके भरोसा कर ले। और हम इंदिरा जी को जानते-बूझते मरने भी नहीं दे सकता थे। मुझे डर था कि अगर इस जानकारी का खुलासा मैंने कहीं खुदा न खास्ता वह सब हो जाने का बाद किया तो पत्रकारिता मुझे धिक्कारेगी और पुलिस शायद घसीट- घसीट के राज फाश न करने के कारण पूछती फिरे। दरअसल ये डर था कि दो विकल्पों पर सोचने के लिए मजबूर कर रहा था। एक कि किस तरह कहीं स्टोरी छाप जाने की व्यवस्था करें और दो कि बाकायदा भारतीय खुफिया एजेंसियों को इसकी सूचना दे दें, ताकि हम खुद सुरक्षित हो जाएँ। हमें डर था कि वैसा अनर्थ हो जाने की सूरत में जिन- जिनसे हम मिल चुके थे इस बारे में, वे सब हमें बताये होने का जिक्र करेंगे पुलिस से और हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा कि जानकारी होने के बावजूद हम चुप क्यों रहे।

मैंने बरेली में मिले उन रिटायर्ड अधिकारी से बात की। वे बोले क्यों भोले बनते हो। भारतीय खुफियाएजेंसियों को क्या पता नहीं है इस उपकुलपति की असलियत का? वे बोले या तो छाप दो कहीं, या मस्त हो जाओ। कोटनाला का दिमाग चला। उनने कहा, भाई, इस देश में एक ही है माई का लाल जो इस खबर को छाप सकता है, कमलेश्वर। मैंने कमलेश्वर को कहानियों में पढ़ा तो था। लेकिन उनकी पत्रकारिता में किसी प्रतिभा या दखल से मैं वाकिफ नहीं था। हम दोनों किसी ऐसे व्यक्ति को भी नहीं जानते थे जो उन्हें जानता हो सकता हो। कोटनाला ने सुझाया और कहीं मिले न मिले, सोवियत एम्बेसी से उनका पता मिल सकता है। मैं आया दिल्ली। कमलेश्वर का पता मिल गया और वे स्वयं भी। उन्होंने कोई बीसेक सवाल पूछे। मुझे वापस भेज दिया - ये कहके कि या तो ये स्टोरी छपेगी या फिर इतना तो होगा कि इंदिरा जी 15 अक्टूबर को पंतनगर नहीं जाएँगी।

'गंगा' में अक्टूबर 1984 के अंक में वह स्टोरी छप गई। कमलेश्वर इसके सम्पादक थे। जिस अखबार के लिए तब मैं काम करता था उसकी या अपनी लाज बचाने को वह खबर मैंने अपने बदले हुए नाम से दी थी। जैसा कि होता है मासिक पत्रिकाओं के साथ, आठ या दस तारीख के आस पास पत्रिका बाज़ार में आई। इन्दिरा जी का पंतनगर जाना कैंसिल हो गया। यह अलग बात है कि उसी महीने उनकी दिल्ली में हत्या हो गई। इसके बाद तो 'गंगा' की वह स्टोरी बहुत बड़ी हो गई। कुछ अखबारों ने अपने सम्पादकीय कालमों तक में उसका जिक्र करके चौकन्ना न होने की बात लिखी। मुझे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते खुफिया एजेंसियों के लोग आए। एक दिन कमलेश्वर जी का बुलावा आया।

शकरपुर में 'गंगा' का दफ्तर हुआ करता था एक छोटी-सी बिल्डिंग के फर्स्ट फ्लोर पर। मैं दोपहर में ही पहुँच गया था। उन दिनों कमलेश्वर जी 'क्लासिक' सिगरेट पिया करते थे। अपना काम-धाम निबटाते, कोई पचासेक सिगरेटों में से अधिकांश को ऐश ट्रे में ही निबट जाने देते कमलेश्वर जी कोई पौने नौ बजे उठे। गाडी उठाई। और आईटीओ के नीचे लगा ली। वे बहुत देर तक बहुत कुछ बताते रहे। मुझसे उन्होंने बस एक सवाल पूछा, 'क्या तुमने जो लिखा उस पj कायम हो?' मैंने कहा, जी बिलकुल। वे बोले, ठीक है जो होगा देखा जाएगा। मैं तुम्हारे साथ हूँ। घबराना मत। जिनके बारे में तुमने लिखा वे तुम्हारा पीछा कर सकते हैं। लेकिन डरना मत। उन्होंने बताया कि जिस उपकुलपति का मैंने जिक्र किया उसका बड़ा दबाव था। फिर भी स्टोरी छपी। और वह उनका रिश्तेदार था।

दो-तीन साल बाद मेरा 'जनसत्ता', चंडीगढ़ के लिए सलेक्शन हो गया। वहीं एक दिन फोन आया, मैं 'जागरण' जा रहा हूँ सम्पादक होकर। तुम्हें मेरे साथ काम करना है।
'जागरण' का दिल्ली संस्करण जब '90 में शुरू हुआ तो मुझे ब्यूरो प्रमुख की जिम्मेवारी दी। पंजाब तब भी आतंकवाद से जूझ रहा था। मुझसे कहा गया कि हम जिम्मेवार पत्रकारिता करेंगे। खून-खराबे की खबरों को तरजीह नहीं देने का निर्णय था। पंजाब, हिमाचल और हरियाणा में साथी पत्रकार मुझे ही चुनने थे। दिल्ली 'जागरण' के प्रबंध निदेशक सुनील गुप्ता ही सारे आपरेशन देखते थे। मुझे बाद में पता चला कि कमलेश्वर जी का सम्पादक के रूप में चयन उन्हीं का फैसला था।

इस बीच एक घटना घटी। हमारे चंडीगढ़ दफ्तर में एक महिला थीं। मेरे आने के पहले से। वे बिजनेस देखती थीं। वही ब्रांच मैनेजर भी थीं। आफिस में वे घंटे-दो घंटे ही रहती थीं। दोपहर बाद अगर वे काम से कहीं जाती थीं तो अकसर फिर अगले दिन दफ्तर लौटती थीं। हम उन दिनों फोन के बिना काम कर रहे थे। टेलीप्रिंटर से ही खबरें जाती थीं और उसी से दफ्तरी सन्देश भी। कभी जब पल्स गड़बड़ हो जाती थी तो उसे चार किलोमीटर दूर जाके लाना पड़ता था। हम एक शो रूम की दूसरी मंजिल पर थे। एक शाम खबरें जा रही थीं कि बिजली चली गई। अँधेरा था और गर्मी भी। मैं अपने टीपी आपरेटर इन्दर के साथ नीचे चला आया। रात के साढ़े दस बज गए। बिजली आती नहीं दिख रही थी। आ भी जाती तो इधर का एडिशन वैसे भी पकड़ नहीं पाते। मैंने इन्दर से कहा कि वह ऊपर जाके दफ्तर बंद कर आए। उसे रात में ठीक से दिखाई नहीं देता था और उसका घर भी वहाँ से कोई दस-बारह किलोमीटर होगा। मेरी पत्नी मायके गई हुई थीं। मैंने कहा, चल इन्दर आज मेरे घर पर ही रह लेना। हमने खिचड़ी बनाई। देसी घी डाला। पेट भर खाया। सो गए। सुबह इन्दर अपने घर चला गया। मैं अपनी रिपोर्टिंग वगैरह पर। इन्दर वैसे भी एक बजे आया करता था। वो एक बजे पहुँच गया था। दो बजे मैं पहुँचा तो टीपी पर दिल्ली से एक सन्देश मिला। सन्देश क्या, आदेश था। एमडी साहब ने फौरन तलब किया था। अगले दिन मैं गया। एमडी साहब का दफ्तर ऊपर था। कमलेश्वर जी का नीचे। मैं पहुँचा तो कमलेश्वर जी तब तक आए नहीं थे। मैं सीधे ऊपर गया। एमडी साहब किसी मीटिंग में थे। आधा घंटा इंतजार किया। उनकी सेक्रेटरी ने कहा, इसके बाद वाली मीटिंग के लोग भी आए हुए हैं। उसने मुझे यह भी बताया कि मैनेजर मैडम की कोई शिकायत आई है मेरे बारे में। इसमें लिखा था कि मैं गैरजिम्मेदार हूँ। दफ्तर की लाइटें, कूलर सब चलते छोड़ कर घर चला गया।

मैं उससे यह कह के नीचे चला आया कि जब वे खाली हों तो बुला लें। मैं जैसे ही नीचे डेस्क पे अपने सहयोगियों के पास बैठा तो किसी खबर के सिलसिले में कमलेश्वर जी ने मुझसे सलाह लेने की राय दी। डेस्क वालों ने कहा कि मैं तो इधर ही हूँ। उनने बुलवाया और मेरे आने का कारण पूछा। मैंने बताया कि एमडी साहब ने बुलाया है। उन्होंने वजह पूछी तो वजह भी बता दी। पूछा, बात हुई? मैंने कहा, मीटिंग में हैं। बोले, ऐसी-तैसी मीटिंग की। फोन उठाया और सीधे दो टूक पूछा, आपने बुलाया जगमोहन को? मुझे बताए बगैर। होगी वह मैनेजर लेकिन जगमोहन वहाँ उसके अंडर काम नहीं करते हैं। मैं जगमोहन से वापस जाने को कह रहा हूँ। आइन्दा उसकी जरूरत हो तो मुझे बताइएगा, और फोन रख दिया। उन्होंने चाय मँगाई। पिलाई। हाल-चाल पूछा और रवाना कर दिया। मुझे याद नहीं आता तब तक मैंने सुनील गुप्ता को कभी देखा हो।

सरदारी लाल कपूर उन दिनों पंजाब के मुख्य सचिव हुआ करते थे। एक बार उनके घर पर कोई छोटी-सी कांफ्रेंस थी। यूँ ही पूछ लिया उन्होंने कि मेरे सम्पादक कौन हैं। मैंने बताया तो उछल पड़े। फौरन फोन लगाया और उन्हें चार दिन के लिए स्टेट गेस्ट के तौर पर आमंत्रित कर डाला। बताया उन्होंने कि वे सूचना प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे और कमलेश्वर जी दूरदर्शन के हेड। तब के सम्बन्ध थे। कमलेश्वर जी आए तो हम लोग भारत-पाक सीमा पर भी गए। हमें अधिकारियों ने 'नो मैन्स लैंड' तक जाने दिया। कुछ वीआईपी उधर भी थे बिलकुल गेट से सटे हुए। बीच में वही कोई पंद्रह बीस फुट का फासला।

उधर जो दस-बारह पाकिस्तानी थे उनमें आठ या नौ बुर्काफरोश महिलाएँ थीं। अचानक अधेड़-सी उम्र की एक महिला ने आवाज दी। पूछा, क्या आप कमलेश्वर साहब हैं? मैंने कहा, जी। उस महिला ने नकाब उलट दिया। सलाम किया और बोलीं कि कैसे उन्हें उनका लाहौर आना याद है और यह भी कि (उनकी लिखी) 'आंधी' उन्होंने अभी दो दिन पहले फिर देखी है। कमलेश्वर जी ने उनका शुक्रिया अदा किया। हम लौट रहे थे तो वे पाकिस्तान की यादों में खोये थे। जैसे सियासत पर साहित्य के आधिपत्य से भावसिक्त मैं यह महसूस करता हुआ कि लेखन और विचार की कोई सीमा नहीं हो सकती। हम रास्ते में जालंधर रुकते-रुकाते 'पंजाब केसरी' के विजय चोपड़ा जी और 'अजीत' के मालिक बरजिंदर सिंह हमदर्द जी से मिलते-मिलाते चंडीगढ़ पहुँचे। वहाँ रात पंजाब भवन में तब के दैनिक ट्रिब्यून के सम्पादक विजय सहगल और बाद में पंजाब के एडवोकेट जनरल हुए आरएस चीमा जैसे दोस्तों के साथ एक गोष्ठी-सी थी। यहाँ उन्होंने एक किस्सा सुनाया। बोले, उन्हें जब दूरदर्शन देखने का बुलावा और इंदिरा जी से एक बार मिल लेने का सुझाव आया तो उन्होंने खुद इंदिरा जी मण्डली के एक सदस्य से सलाह ली। पूछा कि मैं अपने खयालात का आदमी। ज्वाइन करूँ न करूँ? उसने बताया कि इन्दिरा जी साफगो हैं या नहीं, सफाई पसंद तो हैं। जब भी मौका मिलता है, खुरपी लेके गमलों के आस-पास आ बैठती हैं। जिस पौधे की जड़ें अभी लगी न हों तो दुबारा लगा के ऊपर से पानी डाल देती हैं। और जिसकी जड़ लग गई हो उसे उठा कर पीछे फेंक देती हैं। कमलेश्वर बोले, इसके बावजूद मैं मिलने गया। बताया कि 'आँधी' मैंने लिखी। यह भी बोला कि सोच और कर्म से प्रगतिवादी हूँ। अभिव्यक्ति की स्वतत्रता के साथ समझौता नहीं कर पाऊँगा। इन्दिरा जी ने इसके बावजूद उन्हें दूरदर्शन की कमान सौंपी। और फिर जब भी छोड़ा कमलेश्वर जी ने खुद छोड़ा।

जल्दी ही रथ यात्रा आ गई और उसके साथ 'जागरण' के प्रसार क्षेत्र में हिंसा भी। वे अकसर बताते कि कानपुर से हिंसा की खबरों को बढ़ा-चढ़ा कर छापने का दबाव था। इसके लिए वे देर रात तक खुद निगरानी रखते कि कहीं डेस्क दबाव में आकर कभी 50 घायलों की संख्या में एक शून्य और बढ़ा न दे। वे एक सम्पादक और बुद्धिजीवी के रूप में आहत थे। लेकिन खासकर 'जागरण' के यूपी वाले मालिकान उसमें अखबार के प्रसार की संभावनाएँ देख रहे थे। और फिर वही हुआ, जिसका डर था। उन्होंने अखबार छोड़ने का फैसला कर लिया। उनके साथ सारी टीम गई। दिल्ली में आ के उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस की। इसमें कहा कि कलम उठाते हुए उन्हें अपने हाथ रोज खून से सने हुए लगते थे। जाते हुए वे सुनील गुप्ता को एक चिट्ठी देकर गए। इसमें लिखा कि उन्हें उनसे कोई शिकायत कभी नहीं रही। इसमें उनका आशीर्वाद और शुभकामनाएँ भी थीं। लेकिन विचार के स्तर पर जो अंतर कमलेश्वर और नरेन्द्र मोहन में था। वह नरेन्द्र मोहन और सुनील गुप्ता में भी रहा। एक दिन सुनील गुप्ता भी 'जागरण' से जुदा हो गए। लेकिन हम तीनों एक बार फिर मिले।

कमलेश्वर जी 'जागरण' के बाद साहित्य रचना में जुट गए। उन्हें लगता था कि अखबार की वजह से वे लिख नहीं पा रहे हैं। 'जागरण' में सम्पादक के रूप में जो वे लिख भी पा रहे थे, नरेन्द्र मोहन जी को पच नहीं रहा था। वे गए और फिर कुछ ही दिन बाद सुनील गुप्ता को भी निबटा दिया गया। मुझे प्रतिष्ठान ने बुला कर सुनील गुप्ता के खिलाफ ऊल जुलूल आरोपों वाले एक स्टाम्प पेपर पर साइन करने को बोला गया। मैंने वह नहीं किया। इस बीच कुछ ही अरसा पहले विज्ञापन विभाग में आई एक लड़की में नरेन्द्र मोहन जी को अपार संभावनाएँ नजर आने लगीं थीं। मुझे ट्रांसफर कर दिया गया और फिर बर्खास्त। वह लड़की छह महीने के भीतर बिजनेस एग्जीक्यूटिव से रिपोर्टर होते हुए ब्यूरो चीफ बना दी गई। मैं टीवी में चला गया।

यहाँ मुझसे एक गलती हुई। आपसी संबंधों को तरजीह देते हुए मैं वापस प्रिंट में आया और 'अजीत' ज्वाइन कर लिया। इसी में था कि 2000 में सुनील गुप्ता ने बुलाया। वे तब जैन टीवी में सीईओ हो गए थे। मैंने चंडीगढ़ में इधर के राज्यों के लिए ब्यूरो बनाया और सँभाला। बीच में मुझे दिल्ली बुला कर सामयिक विषयों के लाइव कार्यक्रम घटनाचक्र की जिम्मेवारी सौंप दी गई। एक समय आया कि जैन टीवी को कोई कायदे का सम्पादक नहीं मिल रहा था। मैंने एक दिन कमलेश्वर जी का नाम सुझाया तो सुनील बाग-बाग हो गए। कमलेश्वर जी आसानी से मान नहीं रहे थे। उन्हें लगता था कि एक भाजपाई के चैनल में उन जैसे विचारों वाले व्यक्ति का जाना ठीक नहीं होगा। 'जागरण' का अनुभव था ही। लेकिन सुनील गुप्ता पे उन्हें भरोसा था। या कहें कि उन्हें वे मना नहीं कर सके।

उनके आते ही जैन टीवी में बुद्धिजीवियों और उनके फोनों, संदेशों का आना-जाना होने लगा। लेकिन सुनील जी या मेरे प्रति उनके अगाध स्नेह के चलते एक वैचारिक भूल उनसे यहाँ भी हुई। या कह सकते हैं कि सुनील जी को यह मालूम नहीं था कि जैन टीवी इतने बड़े व्यक्तित्व को अपने अस्तित्व पर मँडराते खतरे के बावजूद सँभाल कर रख नहीं पाएगा। उनके जैन टीवी में आते ही भाजपा का एक राष्ट्रीय अधिवेशन आ गया गुजरात में और, जहाँ तक मेरी जानकारी है, स्वयं डॉ. जैन की इच्छा से, कमलेश्वर जी खुद गए वहाँ। अब एक वामपंथी विचारधारा का बुद्धिजीवी जितना झेल सकता था, उतना झेला कमलेश्वर ने। जब बस हो गई तो उनके भीतर का लेखक, पत्रकार जागा और उनने जैसी बेबाकी के साथ बाद में गुजरात को गुजरात बनाके रही पार्टी के साथ जो करना चाहिए था, कर दिया। तब (भी और अब भी भाजपा के पदाधिकारी) डॉ जैन खुद उसे बर्दाश्त कर भी लेते। लेकिन भाजपा भला क्यों यह सहन करती? उनके गुजरात से लौटने के बाद तर्क, वितर्क, कुतर्क कुछ इस हद तक हो गया कि कमलेश्वर जी ने आना छोड़ दिया - यह कहके कि अपना जमीर वे किसी के यहाँ गिरवी नहीं रख सकते। उनके बाद आलोक तोमर आये। वे भी नहीं टिके। कमलेश्वर जी फिर लेखन में रम गए। 'कितने पाकिस्तान' उनके उसी दौर की रचना है। 'कितने पाकिस्तान' पूरा हुआ तो मुझे बुलाया उन्होंने। एक प्रति दी पढ़ने के लिए। पढ़ने के बाद मैंने चंडीगढ़ की स्टेट लायब्रेरी को दान कर दी।

कीमतों की कद्र न करने वाले भावों के बाजार की हलकी-सी बयार में ही बह जाया करते हैं। जैन टीवी भी अपनी परिणति को प्राप्त हो गया। कमलेश्वर जी के जाने के बाद फिर ज्यादा दिन नहीं पड़े कि सुनील गुप्ता भी जाते रहे। कमलेश्वर जी बीच में मुंबई चले गए। गुलजार के लिए लिखी 'आंधी' और 'मौसम' के हिट हो चुकने के बावजूद उनके लिए लिखना उन्हें चुभता रहता रहता था। वे कहते थे गुलजार जैसे बड़े फिल्मकार को उनकी कहानियों का क्रेडिट नहीं लेना चाहिए था। सुनील जी कोका कोला में चले गए। और मैं अपने एक पुराने मित्र विनोद मेहता के आग्रह पर टोटल टीवी में। बहुत जल्दी टोटल पंजाब में एक प्रतिनिधि चैनल के रूप में उभर आया था। खासकर डेरा सच्चा सौदा और अकाल तख्त के विवाद को हमने प्रशंसकों की सराहना के बीच बखूबी प्रस्तुत किया। 2007 के चुनाव आ गए। मैं आठ-दस लोगों की टीम और ओबी वैन लेके पंजाब के चुनावी दौरे पर निकला ही था। रात पटियाला में खा-पी के कोई दस बजे टीवी देखा और उस पर कमलेश्वर जी के न रहने की खबर देखी तो लगा कि जैसे कोई धर्मपिता चला गया हो।

मैं अभागा यह भी न कर सका। मैं इस धर्मसंकट में था कि यों अधबीच सारी टीम को छोड़के निकल गया तो अगले दस दिन के शेड्यूल का क्या होगा। दिल्ली से आये लोग भी मेरे बिना क्या करेंगे। उन बेचारों को इतनी पंजाबी भी नहीं आती थी कि अगले स्टेशन का पता भी पूछ सकें। और अंतिम दर्शन भी न करूँ तो सारी उम्र अपराध बोध से जियूँ कैसे? मैं कुछ देर सोचता और रात भर रोता रहा। मेरे लिए मेरी आत्मा और निष्ठा उस दिन मर गई थी जिस दिन मैंने उनके अंतिम दर्शन तक न कर पाने की अपनी पेशेवर मजबूरी के आगे अपने को बेबस मान लिया था। वे मेरे लिए न तब मरे थे। न आज ही वैचारिक रूप से मुझसे जुदा हैं। कलम जब तक हाथ में है, कमलेश्वर का सोच और विचारधारा तो इसमें से बहेगी। लेकिन आजन्म एक अपराध बोध के साथ।

क्षमा करना बाबा, मैं शिष्य होने का धर्म नहीं निभा सका। आपकी राख मेरे मस्तक पर होती तो मैं गुरु ऋण से मुक्त होता। अब तो सीने में है तो आजीवन आत्मग्लानि है!


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हिंदी समय में जगमोहन फुटेला की रचनाएँ