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कविता

इंतजार
आभा बोधिसत्व


इस लोक में
संबंधों के अँधेरे में जब-जब पड़ी मैं
तब-तब उजाले के लिए साधी चुप्पी
जो बहुत कुछ कहती है
अँधेरा हटाने के लिए... बात
फूल जब-जब मुरझाए मैंने पानी दिया
वे खिल गए फूल कर
खुश-खुश गुप्पा
इस तरह से जब-जब
मुश्किलों ने घेरा बिना हल निकले
मैंने पत्थरों से बात की
वे सुन रहे थे... हल
मेरा कर्म इंतजार

 


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