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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 13. पुदुचैरी प्रवास व स्वदेशी का संबोधन पाना पीछे     आगे

स्वप्नों का एक नगर है वहाँ , जहाँ परियाँ खेलती कूदती हैं। एक देश सपनों का भारत के नाम से वहाँ रहने वाले और आस-पास के सब प्रसन्न रहें।

1908 में भारती को समझा बुझा कर पुदुचैरी (आज का पाँडिचेरी) भेजा गया। फ्रेंच सरकार के कब्जे में होने से अँग्रेज सरकार वहाँ उनका कुछ नहीं कर पाएँगी। पर पुदुचैरी पहुँच कर उन्होंने जो मानसिक संताप झेला वो भारतीजी के अनुसार अँग्रेजों की जेल से अधिक कष्टकारी ही था। वहाँ लोग उन्हें भगोड़ा और डरपोक मान रहे थे जो गिरफ्तारी के डर से भाग कर वहाँ छुप गया है। उनको कोई न घर में प्रवेश देने को तैयार था ना ही सार्वजनिक स्थान पर उनके साथ बैठने को। भारतीजी को समझ नहीं आ रहा था कि तमिल भाषी लोग जो उनके नाम से परिचित थे दूर क्यों भाग रहे हैं। भारती को डरपोक मानने वाले वास्तव में वही डरपोक थे।

जब भारती पुदुचैरी जा रहे थे तब पत्नी चेल्लमा गर्भावस्था के आखिरी चरण में थी। उसका दूसरा शिशु जन्म लेने वाला था। 'स्वदेशमित्रन' में कार्य करते हुए उनकी प्रथम पुत्री तंगम (अर्थात स्वर्ण) का जन्म हुआ था। भारतीजी को पत्नी के स्वास्थ्य की चिंता हो रही थी। उस समय उनके साले साहब के.आर. अप्पादुरै ने भारतीजी को दिलासा और हौसला देते हुए कहा - 'आप परिवार की चिंता मुझे सौंपकर जाइए। मेरे लिए मेरी बहन उसके बच्चे भारस्वरूप नहीं होंगे। देश और उसकी जनता को आपकी अधिक आवश्यकता है।'

अप्पादुरै पोस्टमास्टर की नौकरी कर रहे थे। देश सेवा के लिए उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी। बहन चेन्नमा को अपने गाँव कडैयम ले गए। वहीं उनकी दूसरी पुत्री का जन्म हुआ। उस समय भारतीजी शाकुंतल का अध्ययन कर रहे थे सो पुत्री का नाम शकुंतला रखा। जब बच्ची छ माह की हो गई तो चेल्लमा भी बच्चों को लेकर पुदुचैरी पहुँच गई।

पुदुचैरी में भारतीजी के साथ जो बर्ताव हो रहा था, उसी समय उनके दोस्त म. श्रीनिवासचारी पुदुचैरी पहुँच गए। देशभक्तों का ये विचार था कि 'इंडिया' पत्रिका को वही से निकाला जाए। इस विचार पर अमल करते हुए सारा साजो सामान वहाँ पहुँचा दिया गया। एक किराए का मकान लेकर वहीं से पत्रिका का प्रकाशन पुनः प्रारंभ किया। भारती नई सोच के प्रगतिशील विचारों के, अपने समय से आगे की सोच रखने वाले कवि-लेखक थे। सो 'इंडिया' पत्रिका के लेख आदि सरकार की आँखों में आने ही थे। खास कर उनकी एक कविता ने तो सरकार की आँखों में उनको बहुत बड़ा अपराधी बना दिया। प्रसिद्ध कविता है :-

एन्रू तणीयूम इंद स्वतंत्र दाकम

एन्रू मडीयूम एगंल अडिमैयीन 'मोकम'?

अर्थात - कब कम होगी ये स्वतंत्रता की प्यास

कब मिटेगा गुलामी का संत्रास?

असल में 'मोकम' का मतलब 'मोह' होता है। भारतीजी की बात का भावार्थ था कि हम दासता के जीवन को भी साधारण रूप से सामान्य मान कर गुजार रहे हैं। इस तरह हमें गुलामी से भी एक तरह का मोह हो गया है जबकि वो एक कलंक और संत्रास का जीवन है। भारतीजी की सोच और वाणी से सरकार सरकार कुछ भयभीत होने लगी। उनकी नई सोच प्रणाली और भयमुक्त होकर मन की बात को खुल कर बोलने से जहाँ अँग्रेज सरकार उनसे रुष्ट थी वहीं जनता भी नाराज थी। भारतीजी की कलम जो आग उगलती थी उससे उत्तेजित होकर ब्रिटिश पुलिस जनता को भी परेशान करती थी। यहाँ तक कि 'इंडिया' पत्रिका को पढ़ना तो सब चाहते थे पर छुप-छुप कर। भारती इस बात को हास्य स्वरूप कहते - 'मेरी पत्रिका से सब प्रेमिका की तरह छुप-छुप कर मिलना चाहते हैं' या 'पत्रिका को एक रहस्यमयी आदर मिलता है।'

'इंडिया' पत्रिका को कितने तरह के दबावों के, कष्टों के बीच जारी रखा गया था ये भारतीजी और उनके साथी ही बता सकते हैं। ऊपर से आर्थिक संकट तो सबसे बड़ा, महासंकट था ही। अँग्रेजी सरकार के मातहत जो भारतीय सरकारी कर्मचारी थे सदा पत्रिका के प्रकाशन में अड़ंगा लगाने की तरकीबें सोचते रहते। डाकखाने से पत्रिका को भेजने में देरी करना और अधिकांश समय भेजना ही नहीं, यूँ ही पड़े रहने देना। मनी ऑर्डर कूपनों से पता प्राप्त कर पुलिस ग्राहक के घर पहुँच जाती। उसको धमकाती कि पत्रिका लोगे तो गिरफ्तार कर लेंगे। मनी ऑर्डर से जो पैसे पत्रिका को पहुँचने चाहिए वो पहुँचते ही नहीं। इन हालातों में पत्रिका का निरंतर प्रकाशन असंभव हो गया। पत्रिका के कर्मचारी और भारती कंगाल ही रहे। भारतीजी जैसे उत्साह और जोश से भरे व्यक्ति का साहस भी जवाब दे गया। सो 'इंडिया' पत्रिका का प्रकाशन बंद करना पड़ा। क्योंकि भावना और जोश के सहारे तो पत्रिका चल नहीं सकती।

न जाने क्यों हमारे देश में देशभक्ति का जज्बा गरीबों या साधनहीन में ही अधिक होता है। उस समय भी भारतीजी और उनके साथी जेल या फाँसी या किसी भी सजा के लिए मानसिक रूप से तैयार ही थे। जोश और भावनाएँ ही एक तरह से इन देशभक्तों के लिए उत्साह का स्रोत होता था।

पत्रिका के बंद होने से कुछ पहले ही भारतीजी का ठिकाना बदल दिया गया। जिससे उनका कार्य अबाध गति से चलता रहे। उनके मन में कभी भी ऊँची-नीची जात के फर्क का ख्याल था ही नहीं। वे एक चेट्टियार के यहाँ रहने लगे। वो इतने अच्छे व्यक्ति थे और भारतीजी से प्रभावित भी। उन्होंने कभी भी मकान किराया का पैसा माँगा ही नहीं। भारतीजी के आर्थिक संकट को वे जानते समझते थे। भारतीजी संगीत रसिक भी थे और स्वर लगाकर अच्छे से गाते भी थे। चेट्टियार उनके गाने को चुपचाप सुनते और फिर वहाँ से चले जाते। वो घर और खास कर घर का वो हिस्सा जहाँ भारतीजी रह रहे थे, कई प्रकार की गतिविधियों का अड्डा बन गया था। वहाँ संगीत, विचार विनिमय, अन्नदान, ज्ञानोपदेश मंच और इन सबके द्वारा स्वतंत्रता की भावना को बढ़ावा और उसके लिए युक्तियों की खोज। इन सारी बातों के लिए मानों वो जगह मंच या प्रेक्षागृह का कार्य संपादन कर रही थी।

सन 1909 में द. अफ्रीका में भारतीयों के साथ हुए अमानवीय व्यवहार के विरोध में बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी ने आवाज उठाई, सत्याग्रह किया। तभी भारतीजी गांधीजी की महत्ता पहचान गए थे। 'इंडिया' पत्रिका में उनके कदम की सराहना करते हुए लेख भी लिखा। द. अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों की सहायतार्थ निधि इकट्ठी की और अपनी तरफ से भी रकम मिला कर द. अफ्रीका भेजा।

वहाँ गांधीजी को गिरफ्तार किया गया जिसकी निंदा करते हुए 'इंडिया' के 18 दिसंबर 1909 अंक में एक कार्टून छापा। गांधीजी को गाय का रूप देकर, द. अफ्रीका के उद्योगपतियों को शेर का रूप दिया।

बाद में तो उन्होंने गांधीजी की महानता पर गीत बना कर गाए। पर 1909 में ही उनकी महत्ता को पहचान लेना भारतीजी की दूरदर्शिता को ही बताता है। स्वामी विवेकानंद अपने अंतिम समय में बहुत परेशान थे कि भारत के भविष्य का क्या होगा? पर भारतीजी को गांधीजी पर पूरा-पूरा भरोसा हो गया था। तभी उन्होंने भविष्यवाणी कर दी थी कि पूरी दुनिया गांधीजी के बताए मार्ग पर चलना चाहेगी। उनके साथियों को उनकी दूरदर्शिता और बुद्धिमानी पर आश्चर्य होता था।

जब 'इंडिया' पत्रिका का प्रकाशन चेन्नै में रोका गया, तब 'विजया' नाम से एक दैनिक का प्रकाशन प्रारंभ किया गया। 'विजया' के तीक्ष्ण अग्रलेख और अन्य सामग्री से सरकार ने अड़ंगे लगाने प्रारंभ कर दिए थे। सो बाद में 'विजया' को भी पुदुचैरी से प्रकाशित किया जाने लगा। सन 1909 के कृष्णजयंती से इसका प्रकाशन शुरू हो गया था। बाद में 'इंडिया' के बंद होते समय 'विजया' भी समाप्त हो गई। उस समय भारतीजी और उनके मित्र जोश खरोश में थे और जनता के मन में स्वतंत्रता प्राप्ति की ललक बढ़ा कर उन्हें इसमें प्रत्यक्ष हिस्सा लेने के लिए बाध्य कर रहे थे। इसके लिए अनेकों अन्य पत्रिकाएँ भी निकालने की योजना बनाई गई थी। जिनमें से एक 'चित्रावली' नामक पत्रिका थी, जिसमें कार्टून और चित्रों के माध्यम से सरकार से लड़ाई लड़ी जा रही थी। बच्चों के मन में देश प्रेम, बलिदान, चरित्र निर्माण के अन्य गुणों को विकसित करने हेतु 'बाल भारत' पत्रिका भी निकाली गई।

'चित्रावली' में तमिल और अँग्रेजी दोनों भाषाओं के संकेत थे। पर इसका कोई सबूत बाद में नहीं मिला। अगर सबूत मिल जाता तो यह भारत की प्रथम संपूर्ण कार्टून पत्रिका होती। सारी ही पत्रिकाएँ सन 1910 के अंत तक एक-एक करके बंद करवा दी गईं।

सन 1909 सितंबर में श्रीकृष्ण जयंती को भारतीजी ने अपनी स्वयं की पत्रिका 'कर्मयोगी' प्रारंभ करने की तैयारी की थी। पर वो संभव नहीं हुआ और सन 1910 पोंगल से ही प्रारंभ हो पाया। 'कर्मयोगी' कला और साहित्य की उच्चस्तरीय मासिक पत्रिका थी। धर्म, कला, उद्योग, शास्त्र, राजनीति आदि का भी स्तरीय, संतुलित समावेश था। भारतीजी की स्पष्ट, दूरदर्शी शैली की छाप साफ समझ आ जाती थी।

पिछले अनुभवों में जहाँ संपादक का कार्य करते हुए भी उनका नाम नहीं जाता था वे कुछ हतोत्साह थे। 'कर्मयोगी' में वो जैसा चाह रहे थे उसी तरह से कर पा रहे थे। उनके हाथ बँधे हुए नहीं थे और संपादक की जगह उन्हीं का नाम था - सी. सुब्रमण्यम भारती। गरिमापूर्ण रूप से गर्वित होने के लिए इससे अच्छा मौका और क्या हो सकता था। उनको पैसे और अन्य भौतिक वस्तुओं की चाह ही कहाँ थी?

पत्रिका का मुखपृष्ठ अनायास ही किसी का भी ध्यान खींच सकता था। श्रीकृष्ण रणभूमि में रथ के सारथी बने हुए अर्जुन को गीतोपदेश दे रहे हैं। पीछे सेना का एक बड़ा भाग भी दिख रहा है। इस मुखपृष्ठ के लिए उन्होंने पतरे और लकड़ियों की सहायता से प्रारूप बनाया था। ऐसा नवीन, विहंगम मुखपृष्ठ और उसी अनुसार अंदर की गहन चिंतन भरी सामग्री, जिसे लोगों ने अत्यधिक पसंद किया।

भारतीजी की 'इंडिया' का प्रकाशन बंद होने के बाद की बात है। सन 1910 में कोलकाता से बाबू अरविंद घोष पुदुचैरी पहुँच गए। अरविंद घोष के पुदुचैरी में पदार्पण और गुप्त प्रवास की योजना और तैयारी म. श्रीनिवासचार्य तथा भारतीजी ने की थी।

हालाँकि इसका सूत्रपात कुछ पहले ही हो चुका था। उस समय अरविंद घोष देश के प्रमुख नेताओं में से थे। बंगाल के माणिक टोला 'बम कांड' में उनको व उनके अनेक साथियों को गिरफ्तार किया था। कोर्ट में सबूत के अभाव में उन्हें बरी कर दिया गया था। इस बीच उन्होंने जो थोड़ा समय सलाखों के पीछे काटा उसने एक तरह से उनके ज्ञानचक्षु खोल दिए। अपने साथियों और अन्य देशभक्तों को जेल में देख कर मानों उन्हें कृष्ण के दर्शन हुए। उनका मन योग और साधना में रमने लगा। जेल से बरी होते ही उन्होंने अँग्रेजी में एक साप्ताहिक पत्रिका प्रारंभ की जिसका नाम रखा 'कर्मयोगिन'। उनकी योग साधना भी बराबर चलती रहती थी जिसे सरकार और पुलिस ढोंग मानती थी और लगातार परेशान करती थी।

इसी समय स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी में हिस्सेदारों को जोड़ने के लिए श्रीनिवासचार्य के छोटे भाई पार्थसारथी उत्तर भारत की ओर गए। तभी भारतवर्ष की पूर्व दिशा में स्थित कोलकाता भी गए और अरविंद घोष से मिले। कंपनी की बातों के अलावा दक्षिण भारत की राजनैतिक गतिविधियों की जानकारी भी दी। ये भी बताया कि भारतीजी की 'इंडिया' पत्रिका बिना किसी अड़चन के पुदुचैरी से अबाध गति से प्रकाशित हो रही है। यही युक्ति अरविंद घोष को ठीक लगी।

सन 1910 मार्च महीने में एक बंगाली युवक अरविंदजी का एक पत्र लेकर पार्थसारथी के पास पहुँचा। पत्र में किस दिनांक को आएँगे ये लिखा था और फ्रेंच जहाज में आएँगे ये भी लिखा था। उन्हें जहाज से लेकर जाना और पुदुचैरी में छुप कर रहने की व्यवस्था करवाने की बात लिखी थी। इस पत्र को श्रीनिवासचार्य ने भारती को दिखाया। इन दोनों ने उनको शंकर चेट्टियार के घर तीसरी मंजिल पर सुरक्षित स्थान पर ठहराया। उनके वहाँ आ जाने के दो महीने बाद ही ब्रिटिश पुलिस को उनका सुराग मिला।

अरविंद घोष को पुदुचैरी आए छ महीने हुए थे तब एक दाढ़ी वाले मुसलमान सज्जन भी पुदुचैरी पहुँच गए। उन्होंने अपने आगमन को पुलिस से छुपाया भी नहीं। ये थे तिरूच्चि के श्री व.वे.सू. अय्यर। बैरिस्टर की शिक्षा के लिए लंदन गए थे। लंदन में उनको टी.एस.एस. राजन, विनायक दामोदर सावरकर आदि का साथ मिला। जिससे वो भी अँग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह में शामिल हो गए। इनके दल के मदनलाल धींगरा नामक पंजाबी युवक ने करसन वेली नामक अँग्रेजी अधिकारी को लंदन में मार दिया था। इस हादसे के कारण सावरकर को भी कैद कर लिया था। व.वे.सू. अय्यर छुप गए और बाद में दाढ़ी वाले सरदारजी बन कर, अपना नाम वीर विक्रम सिंह बता कर निकले। बाद में कैरों में पाँच वक्त की नमाज पढ़ने वाले मुसलमान की तरह अभिनय किया। दक्षिण अमेरिका के ब्राजील देश को जाने का बहाना कर टर्की से कोलंबो (आज का श्रीलंका) आकर पुदुचैरी पहुँचे थे।

भारती, श्रीनिवासचार्य, अय्यर और अरविंद के बीच शाम के समय लगभग चार बजे से चर्चा और वार्तालाप का दौर प्रारंभ होता जो रात तक चलता। कला, साहित्य, राजनीति, दर्शन कोई भी क्षेत्र उनसे नहीं छूटता।

अरविंदजी से पहचान बढ़ जाने पर भारती भी वेद ऋषि के गीतों में रुचि लेने लगे। उनका तमिल में अनुवाद भी किया। 'वेद ऋषि' की कविताएँ तथा 'पतंजलि योग सूत्रम्' दोनों का अनुवाद स्वामी विवेकानंद ने अँग्रेजी में किया था। भारती ने तमिल में किया।

भारती जब से पुदुचैरी आए लगभग तभी से पुलिस सी.आई.डी की एक टुकड़ी वहाँ डेरा डाले रहती थी। खान बहादुर जी.एस. अब्दुल करीम गुरूवप्प रंगचारी अय्यंगार नायडू इस विभाग के अधिकारीगण थे। नायडू को तो भारती चेन्नै से जानते थे। संयोग से फ्रेंच सरकार का डाक विभाग ब्रिटिश शासन के अंतर्गत था। भारती और उनके साथियों की तथा पत्रिकाओं की डाक और मनीऑर्डर आदि से पते प्राप्त करना कठिन नहीं था। पत्रिका के ग्राहकों को भी चेन्नै और दूसरे स्थानों पर धौंस दी जाती थी। फिर भी 'इंडिया' पत्रिका अच्छे से चल रही थी। तभी 'इंडिया' में एक समाचार प्रकाशित हुआ - 'चेन्नै में बना विमान' जिसने सनसनी फैला दी। असल में टांजील्स होटल के फ्रेंच मालिक ने तमिल कर्मचारियों की मदद से सिंपसन कंपनी की फैक्ट्री में यह विमान बनवाया। जिन्होंने मेहनत की, अपनी सेवाएँ दी वे तमिल भाषी लोग थे, जिसका भारती को बेहद गर्व था। राइट बंधुओं ने जो विमान बना कर उड़ाया था उसे मात्र छ वर्ष ही हुए थे। चेन्नै में बने विमान ने भी उड़ान का सफल परीक्षण किया। भारतीजी चाहते थे कि भारतवर्ष की प्रतिभा को भी सब जानें। इसीलिए इस खबर को उन्होंने प्रमुखता से छापा।

इसी बीच उनको फ्रेंच आधिपत्य वाले इलाके से निकाल कर ब्रिटिश इंडिया इलाके में लाने के षड्यंत्र और प्रयास लगातार हो रहे थे। तिरूनेलवेली के तत्कालीन कलेक्टर एश ने एटैयापुरम् के राजा (जमींदार) को अपने साथ मिलाते हुए भारती के खिलाफ एक साजिश की। भारती के नाना को पुदुचैरी भेजकर भारती को वापिस लाने का काम था। साथ ही ये भी बताना था कि उनको राजा के यहाँ नौकरी भी मिलेगी। भारती के नाना रामस्वामी अय्यर, नानी तथा मामा सांबशिवम पुदुचैरी पहुँच गए और भारती को आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता में डाल दिया। पर उनके आने का उद्देश्यों जानकर वे दुखी हो गए। उन्होंने जमींदार की नीच मनोवृत्ति की भर्त्सना की और चेतावनी भी दे डाली कि उसकी मनोकामना पूरी नहीं होगी।

पर अपने नाना-नानी को पाकर बहुत खुश हुए और हँसी से दोहरे होते हुए बोले - 'इस अँग्रेज एश ने मुझ पर जो करुणा की, मुझे अपने नाना-नानी से मिलवा दिया, इसके लिए उसका सम्मान किस तरह करूँ!'

हर घटना पर उनका मन स्वतःस्फूर्त कविताएँ रचने लगता था। इस घटना पर उन्होंने कविताएँ बनाईं, जिनमें भारतमाता के प्रति उनका स्नेह और कर्तव्य झलकता है। पुदुचैरी की जनता इन लोगों को स्वदेशी कह के संबोधन करती थी।


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