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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 1. तत्कालीन दक्षिण भारत पीछे     आगे

मेरा हृदय दुख से विदीर्ण हो जाता है जब मैं अस्थिरता में जीते लोगों को देखता हूँ। जो गरीबी , भूख और अनेक कारणों से मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। उन्हें बचाने का कोई उपाय भी नहीं है।

तब ब्रिटिश साम्राज्य का पूरे भारत पर एकछत्र राज्य हो गया था। दक्षिण भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। दक्षिण भारत के कट्टबोम्मन का नाम अपने शौर्यता-वीरता तथा बलिदान के लिए जाना जाता है। पर अँग्रेजों ने ही नहीं देश के बड़े-बड़े अँग्रेजी ज्ञाताओं ने भी उस समय उसे मात्र सिपाहियों का छोटा-मोटा विद्रोह माना। इसमें हिंदू-मुस्लिम ने भाईचारे की मिसाल कायम करते हुए संयुक्त रूप से विद्रोह किया। विद्रोह की इस शुरुआत के बाद दक्षिण भारत में भी राष्ट्रीय प्रेम और देशभक्ति का जज्बा जाग उठा था। पर अँग्रेज अपनी नीति के तहत सदा ही विद्रोहों को आरंभिक अवस्था में ही धराशायी करते गए। इस तरह महारानी विक्टोरिया भारत का राज सँभालते हुए सर्वेसर्वा हो गई। ब्रिटिश पार्लियामेंट ने भारत का भाग्य विधाता बन कर पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। इतना ही नहीं भारत के स्वतंत्रता-संग्राम को रोकने व उसके जोश और जोर को कम करने के लिए कई प्रयास करते रहे। उन्हीं प्रयासों में से एक था भारत के लोगों को अँग्रेजी भाषा का ज्ञान देकर उन्हें सभ्य और शिक्षित बनाना। वो इसे 'जंगली को मानव बनाना' मानते थे। भारतीय भी कुछ हद तक अँग्रेजों की चाल में आ गए थे। तभी तो आजादी के बाद भी भारत में उनकी भाषा बची भी रही और सम्मान भी पाती रही।

उस समय गाँव का माहौल था और लोग शहरी वातावरण से दूर थे। ग्रामीण सुरम्य वातावरण में बैलों की जोड़ियों के गले में बाँधी घंटियों की रुनझुन के साथ, सजी हुई बैलगाड़ी में सवारी करना, यात्रा करना शान माना जाता था। व्यक्ति की बीमारी हो, गरीबी हो सबके लिए भाग्य को दोषी माना जाता, तकदीर का या माथे का लेखा माना जाता। पद और पदवी के लिए अँग्रेजों को अनगिनत सलाम ठोंकने का रिवाज था। अपनी संस्कृति और संस्कार को छोड़ विदेश में अध्ययन व अँग्रेजों की नकल का भी जमाना था। ब्रिटिश महारानी या साम्राज्ञी का राज्य ही मानों रामराज्य हो और उनके अधीन रहना ही मानों देशभक्ति हो, इस तरह की मनोधारणा फैलती जा रही थी। भारत जैसे प्राचीन इतिहास, सभ्यता वाले राष्ट्र में अँग्रेजों की अधीनता में देशवासी अपने संस्कार और संस्कृति को छोड़ने पर आमादा हो रहे थे। पर भारतीय संस्कृति की महत्ता को प्रमुख रूप से रेखांकित करते हुए आधुनिक विचारों से लैस कुछ महानुभाव हुए। जिनमें प्रमुख हैं राजा राममोहन राय, केशवचंद्र सेन, रामकृष्ण परमहंस तथा विवेकानंद जिन्होंने भारत की धनी-सांस्कृतिक धरोहर को अक्षुण्ण रखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। लोगों में धर्म और संस्कृति के अलावा देश प्रेम की भावना को भी जगाया और पल्लवित किया।

ऐसे काल में दक्षिण भारत में तिरूनेलवेल्ली जिले के चीवलबेरी गाँव में सुंदरराजन रहते थे। यही सज्जन चिन्नस्वामी अय्यर नाम से जाने जाते थे। ये पढ़े-लिखे विद्वान थे जिन्हें विज्ञान और गणित से जबरदस्त मोह था। यहाँ तक कि विदेशों से आई मशीनों को भी सुधार लेते थे। इनका विवाह एटैयापुरम गाँव की लक्ष्मी नामक कन्या से हुआ। एटैयापुरम मदुरै से लगभग सौ कि.मी. दूर है। यहाँ के जमींदार को राजा की पदवी मिली हुई थी। राजा राम वेंकटेश्वर एट्टप नायकर, उस समय एटैयापुरम के राजा थे। इनके चाचा जो दादा महाराजा कहलाए, राजा की संतान न होने से इनके बाद राजा बने। दोनों ही राजाओं को कला व साहित्य से बहुत लगाव था। इनके दरबार में सुबह से रात तक विद्वत्जनों का आना-जाना, विद्वत-सभा, गोष्ठी, संगीत सभा आदि का आयोजन होता रहता था। यहाँ तेलुगू, तमिल, संस्कृत तथा संगीत के विद्वानों का जमावड़ा होता रहता। विद्वानों का सत्कार, आदर-सम्मान होता रहता व ईनाम आदि मिलते रहते।

विद्वान चिन्नस्वामी अय्यर को लगा कि उनके ज्ञान का सही मूल्यांकन एटैयापुरम में हो सकता है। सो उन्होंने अपने पुरखों की जन्मभूमि छोड़ एटैयापुरम आने का मन बना लिया। एटैयापुरम आकर इन्होंने अच्छा ही किया। तमिल के विद्वान, अँग्रेजी भाषा को स्वयं सीख कर उसमें भी प्रवीण हो गए थे। साथ ही विदेशी गणित व यंत्र विज्ञान का भी ज्ञान था। इस तरह राजा के दरबार में विद्वानों के सरताज बन गए। राजा और दूसरे विद्वजन उनका आदर करते थे। एटैयापुरम जैसे छोटे गाँव में उन्होंने सन 1890 में ही जीनिंग मशीन लगाकर छोटी सी फैक्ट्री खोली। उस वक्त के हिसाब से ये बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। ऐसे महान विद्वान के घर प्रथम पुत्र के रूप में सुब्रमण्यम का जन्म हुआ।


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