hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 20. बच्चों के साथ भारती पीछे     आगे

मनुष्य-मनुष्य के बीच धर्म या जाति का कोई अलगाव नहीं है। ऐसा अंतर करना पाप है। ऐसा नहीं है कि जो शिक्षित और बुद्धिमान है वो ऊँची जात के ही हों। (भारती का बच्चों को उद्बोधन)

बाल लेखन या बच्चों के लिए लिखने की प्रथा अभी कुछ वर्षों से ही प्रारंभ हुई है। कुछ बाल-पत्रिकाओं ने चार-पाँच दशक पूर्व अपनी पहचान बनाई भी थी। पर बाल-साहित्य के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार एक दशक से ही प्रारंभ हुआ। आज से एक शताब्दी पूर्व भारतीजी ने बालकों को एक स्वतंत्र इकाई मान कर लेखन किया था। बच्चों की मानसिकता के अनुकूल सरल, सरस भाषा में आचार-विचार-व्यवहार व चरित्र-निर्माण पर जोर देते हुए कविताएँ, कहानियाँ तथा आलेख लिखे। आज भी इन रचनाओं की सामयिकता बनी हुई है। कुछ वर्षों पूर्व केंद्रीय विद्यालयों में सर्वभाषा प्रार्थना व गीतों को स्कूलों में सिखाया गया था। इनमें तमिल के श्री सुब्रमण्यमन भारती का 'ओडी विलैयाडु पापा, नी चुम्म इरूक्का आकादु पापा' को चुना।

पापा का अर्थ होता बालक-बालिका। बच्चों दौड़ों, खेलों-कूदों यूँ ही बैठे मत रहा करो। घरों में बच्चों को अधिक से अधिक देर तक के लिए पढ़ाई करने बैठा दिया जाता है। पर कविवर भारतीजी का कहना था कि लड़के-लड़कियों दोनों को ही शाम को कुछ समय भाग-दौड़ के खेल खेलना चाहिए। वो स्वयं दुबले-पतले थे इसका उन्हें दुख था। शारीरिक तंदुरुस्ती के लिए व्यायाम और खेल को बहुत महत्वपूर्ण मानते थे। साथ ही बच्चों के मनोभावों को समझ कर उसके अनुसार व्यवहार करने की बात भी करते। बचपन से ही बच्चों में परिश्रम की महत्ता और उससे होने वाले लाभ के बारे में धीरे-धीरे समझाएँ। परिश्रम से कोई बीमार नहीं पड़ता वरन शरीर उसका आदि होते जाता है और वो बीमार भी कम पड़ता है। उसकी शारीरिक ताकत और व्याधियों से लड़ने की शक्ति बढ़ जाती है।

भारतीजी को इस बात का दुख था कि हमारे देश में वीर पैदा नहीं होते हैं। कुछ पैदाइशी वीर या जन्मजात वीर होते भी हैं तो बचपन में उनकी ऐसी परवरिश करते हैं कि वीरता समाप्त हो जाती है। वीरों की तथा वीरता की कमी का दूसरा कारण बताते थे, संवेदना की कमी से दूसरों की परेशानी से कोई सरोकार ना रखना। यही सोचना कि हमें क्या करना है! बच्चों को सिखाया जाता है कि दुष्टों से दूर रहो। इसे बच्चे मान भी लेंगे, पर उनके मन में डर पैदा होता है तो ये तरीका ठीक नहीं है। बच्चों को खाने-पीने, रोज के कार्य करवाने में किसी का डर बता कर दबाव में काम नहीं होना चाहिए। उन्होंने बच्चों के लिए लिखी कविता में अपने भावों को सुंदर तरीके से उजागर किया है। दुष्टों और गलत कार्य करने वालों से डरना नहीं चाहिए, विरोध करना चाहिए। हमारे देश में वीरों को सही सम्मान नहीं मिलता है ये उनका ऐसा दुख था जिससे वो मायूस हो जाते थे।

कवि भारती सदा ही नई सोच, नई बाते, नए प्रयोग के हिमायती थे। बच्चों को सदा कहते कि कुएँ के मेंढक की तरह मत जियो। नए विचार, नई सोच पर विचार करो और उदार बन कर उन्हें अपनाओ। यहाँ तक कि वेदों तक को नया बनाने का कहते जो कि बहुत ही बड़ा क्रांतिकारी कदम हो। वैसे उनका आशय ये होता कि सड़ी-गली पुरानी मान्यताओं को छोड़, युग और समय के अनुसार नवीनता को अपनाओ। उनके इन विचारों की कविता हो या लेख हो मात्र एक जात या धर्म के बच्चों के लिए नहीं होता। देश ही नहीं दुनियाभर के बच्चों के लिए उनका संदेश सही, सटीक और व्यावहारिक होता।

जीवन के अनुभवों को भी वो शिक्षा की तरह लेते थे। अनुभव खराब होते तो उसे सीख की तरह लेते। अच्छे अनुभवों का आनंद लेते थे वो भी पूरी मस्ती में व सबके साथ। बच्चों को भी वे यही सीख देते कि अनुभवों से शिक्षा लो और किसी भी हालत में आशा मत छोड़ो। निराशा मन में पालने से ही इनसान हारता है। उनके हिसाब से जीवन का अनुभव एक सर्वकला पाठशाला है।

बच्चों में निडरता को वो सद्गुण मानते थे, चाहे वो बालक हो या बालिका। उनका कथन था कि निडरता वहीं होती है जहाँ सच्चाई, ईमानदारी और साहस होगा। सभी बच्चों में चारित्रिक दृढ़ता के लिए वो इन गुणों को आवश्यक मानते थे। पुदुचेरी में परिवार के साथ रहते हुए एक बार बड़ी बेटी तंगम को भी अरविंद जी के यहाँ ले गए। अरविंद ने तंगम से कई प्रश्न पूछे, जिसका जवाब तंगम या तो संक्षिप्त या सिर हिला कर देती रही। भारती व्यथित हो गए कि वो तो समस्त बच्चों की निडरता की बात करते है और स्वयं उनकी पुत्री साधारण प्रश्नों के उत्तर देने में संकोच और शर्म अनुभव कर रही है। उन्हें गुस्सा भी आया और उन्होंने खीजते हुए पूछा - 'अरविंद जी के हाथ में अस्त्र-शस्त्र थे ना?'

तंगम आश्चर्य से बोली - 'नहीं तो'

'फिर डर क्यों रही थी? भारत देश में ऐसी नारियाँ पैदा हुई है जो शेरों से भी नहीं डरी। भारत की नारियों को वही वीरता फिर प्राप्त करनी पड़ेगी और गुलामी की जंजीरों को तोड़ना होगा।'

एक बार पुदुचैरी के समुद्र तट पर अमावस्या स्नान पर भारी भीड़ थी। ज्वार-भाटा का समय होने से लहरें बहुत ऊँची और वेग से आ रही थी। तंगम वहाँ नहाने या पानी में जाने से ही घबरा रही थी। भारती ने ही उसे हौसला दिला कर कहा - 'सागर कितना भी उमड़े पर डरने की आवश्यकता नहीं है। यदि विवेक से काम लिया जाएँ तो कभी किसी भी बात या घटना से डरने की आवश्यकता नहीं है।' वे स्वस्फूर्त कवि और गीतकार थे - सो तुरंत गाने लगे -

अच्चम ईलै, अच्चम ईल्लै (अर्थात - डर नहीं है, डर नहीं है...)


>>पीछे>> >>आगे>>