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जीवनी

सुब्रह्मण्यम भारती : व्यक्तित्व और कृतित्व
मंगला रामचंद्रन

अनुक्रम 22. समूचा लेखन व व्यक्तित्व के विभिन्न आयाम पीछे     आगे

बुद्धि को शक्ति और स्थिरता दो , बोली को मिठास दो। सोच को स्पष्टता दो , आवश्यकतानुसार हर वस्तु दो तथा सत्य को विजयी बनाओ।

श्रेष्ठ कवि एवं गायक के रूप में - भारती एक स्वतःस्फूर्त कवि थे। उन्हें कागज-पेन या इस तरह के दूसरे तामझाम की जरूरत ही नहीं थी। शब्दों की और मिजाज (मूड) की तलाश की कोई दरकार नहीं थी। जहाँ उनका मन किया कविता गाने लगते। सृष्टि में समाए अनगिनत बातों, लोगों, घटनाओं पर काले मेघ से बरसती वृष्टि की तरह शुरू हो जाते। उन्हें नवरसों के नायकन कहा जाता है तो एक दम सही है। प्रकृति, ज्ञान, वीरता, भावनाओं को उड़ेल कर मन को छूने वाली देवी-देवताओं के ऊपर रचनाएँ खास कर देवियों पर (नारी रूप) उनकी अनगिनत रचनाएँ स्वस्फूर्त रूप से मूर्त हुई। इसके अलावा बच्चों, किशोर-किशोंरियों, छात्रों तथा बड़ों के लिए जा रचनाएँ उनके श्रीमुख से जब-तब झरी, इनकी भी संख्या अनगिनत है। भारती को स्मरण करते हैं तो गुलामी की जंजीर को तोड़ने और तंद्रा से जगाने का प्रयास करती ढेरों जोशभरी रचनाएँ भी हैं। सदा निर्धनता की मार सहते हुए भी श्रृंगार रस की कविताओं की रचनाएँ भी की तो हास्य-व्यंग्य की भी।

अब तक पुदुचैरी के अपने प्रवास में एक तरह के वातावरण और चेहरों से वे उकता चुके थे। स्वयं में जड़ता महसूस करने लगे थे। यायावरी तबीयत के भारती को चाहिए था खुले में, आसमान के नीचे, हरियाली के बीच घूमना-फिरना। उनके मित्र उनके इस तरह के स्वभाव को अच्छे से जानते थे। तभी उनके एक साथी कण्णन ने उन्हें एक तरह से निमंत्रण ही दिया। उनके आवास से काफी दूरी पर त्यागराज पिल्लै तालाब था। कण्णन ने प्रातःकाल वहाँ स्नान कर के आने का कार्यक्रम बनाया और भारती से कहा - 'तालाब दूर है इसलिए हमें सुबह चार बजे यहाँ से निकल पड़ना होगा।'

भारती जैसे उत्साही, जोखिम उठाने को सदा तैयार व्यक्ति को और क्या चाहिए। उन्होंने कण्णन से कहा - 'आप जब भी आकर आवाज देंगे मैं उठ जाऊँगा।'

तय हुए समय पर अगले दिन दोनों मित्र तालाब की ओर चल पड़े। रास्ते के दोनों ओर छोटे-बड़े खेत, नारियल के बाग-बगीचे, शीतल-मंद पवन के साथ ही पक्षियों का कलरव। समस्त वातावरण ने उन्हें सम्मोहित कर दिया। दो-तीन दिन बाद भारती स्वयं कण्णन के यहाँ भोर होते-होते चले गए। वहाँ द्वार खटखटाने पर मित्र की माँ ने दरवाजा खोला और उन्हें अंदर ले गई। कण्णन ने भारती का परिचय अपनी माँ से करवाया। माँ ने कहा - 'तुमने कहा था ना कि भारती बहुत अच्छा गाते हैं तो फिर उन्हें 'सुप्रभात' गाने को कहो।'

भारती ने पूछा - 'सुप्रभात का क्या मतलब है?'

उनके दोस्त की माँ ने अवहेलना से हँसते हुए कहा - 'यही हैं तुम्हारे भारती जिसे ये नहीं मालूम सुप्रभात क्या होता है।'

दोनों तालाब की ओर निकल पड़े और रास्ते में मित्र ने भारती को समझाया कि 'दक्षिण भारतीय भाषाओं में भोर में ईश्वर को सुरों और शब्दों के योग से जगाने की परिपाटी को सुप्रभात गायन कहा जाता है।'

'बस इतनी सी बात' - भारती ने सरल मुस्कान के साथ कहा। कुछ ही दिनों में उन्होंने भारत माता को जगाने के लिए एक सुप्रभात तैयार किया। राग में तैयार कर मित्र की माँ को भी सुना दिया। इस गीत का शीर्षक है 'भारत माता सुप्रभातम्'। साथ ही 'प्रभात समय' पर एक मधुर गीत भी बनाया। जिसमें प्रातः का (शुभ) मंगल प्राकृतिक वातावरण व उसमें मिठास घोलते पक्षियों व अन्य बातों जैसे मंदिर के घंटियों, बहती हवा तथा पानी का नाद आदि का चित्रण है। भारती जैसे वाचाल महानुभाव ने गीतों की रचना के लिए चालीस दिन (40 दिन) का मौन व्रत रखा। उनकी इच्छा थी कि इन दिनों में वे बहुत बड़ी संख्या में गीत और कविता की रचना करें व उन्हें राग में बैठा कर तैयार कर दें। पर मात्र छयासठ (66) रचना ही तैयार हो पाई, जो वैसे देखा जाएँ तो अल्प मात्रा नहीं कही जा सकती। इसका बाद में 'भारती छयासठ' के नाम से प्रकाशन हुआ। भले ही भारती के हिसाब से ये रचनाएँ कम थी पर सभी उत्कृष्ट रचनाएँ थीं।

भारतीजी की अधिकांश पुस्तकें पुदुचैरी के प्रवास में ही लिखी गई थी। यहीं पर उन्होंने 'पाँचाली शपतम' अर्थात 'द्रौपदी की प्रतिज्ञा' का निर्माण किया था जो बहुत प्रसिद्ध हुई। पुदुचैरी के दस वर्ष के प्रवास में उन्होंने फ्रेंच सिखी। प्रसिद्ध संत त्यागराज अय्यर की रचनाओं को गाने के लिए तेलुगू सीखा। कोई गलत और अपस्वर में गाता तो उन्हें सहन नहीं होता था।

संगीत में जिस तरह संत त्यागराज राम भक्ति में लीन होकर राम कीर्तन की रचना करते थे, उसी तरह भारतीजी देश की स्वतंत्रता का आह्वान करते हुए, जनता में देशभक्ति का जज्बा एवं जोश पैदा करने वाले गीत रचते और लय और राग के सुनाते। उनकी एक रचना 'एंड्रू तणियुम इंद स्वतंत्र दाकम' अर्थात 'स्वतंत्रता की ये प्यास कब बुझेगी' लोगों की जुबान पर राग और लय के साथ तुरंत चढ़ गया था।

भारती के एक दूसरे साथी कृष्णस्वामी चेट्टियार का पुदुचैरी के पास मुत्तियाल पेठ में बहुत सुंदर बगीचा था। इस बगीचे में भारती अकेले घंटों टहलते रहते। कभी हरियाली को निहारते कभी पंछियों को उड़ान भरते देखते और कभी पक्षियों का गीत सुनते। अस्त होते सूर्य के वर्णजाल में डूबे, ईश्वर के विचित्र और मन को लुभाते इंद्रजाल को अनुभव करते हुए कह उठते - 'ओह ईश्वर, तुमने मनुष्य के लिए प्रकृति में कितनी खुशियाँ, कितना आनंद संजो कर रखा है।' इन सबके बीच वो अपने दुखों को एकदम ही भूल जाते।

जब उनके मन में प्रसव वेदना की तरह वेदना होती और मुँह ही मुँह में सा रे ग मा... गाने लगते तो पास वाला समझ जाता कि नवगीत की रचना हो रही है। ऐसे समय में उन्हें यह भय होता कि उनकी वेदना को ना समझ कर कोई उनका मजाक न बनाए। ऐसे में उनकी परेशानी को समझने वाले किसी दोस्त को लेकर कृष्णस्वामी चेट्टियार के बगीचे में चले जाते या किसी खेत खलिहान में। प्राकृतिक वातावरण के प्रति दीवानगी इस हद तक थी कि आस-पास का सब कुछ भूल कर ऊँचे स्वरों में खुल कर गाने लगते। मानो वाग्देवी उनकी जीभ की नोक पर ही विराजती हों।

कृष्णस्वामी के बागीचे में नारियल के पेड़ों का एक अच्छा खासा हिस्सा भी था। 22 नवंबर 1916 को पुदुचैरी में ऐसा चक्रवात आया कि पुदुचेरी और उसके आस-पास के सारे पेड़ धराशायी हो गए थे। पर इस तूफान और बवंडर में भी इस बागीचे के सारे नारियल के पेड़ वैसे ही खड़े रहे और उनका बाल भी बाँका नहीं हुआ। कहा जाने लगा कि भारती को उस इलाके से स्नेह था इसीलिए वो बच गया।

इस तूफान और झंझावात पर भारती ने उस दिन के हालात पर कविताओं की रचना की। वो जिस घर में रह रहे थे उस घर के पिछले कमरे की दीवार भी उस चक्रवात की बलि चढ़ गई। ईश कृपा से परिवार का कोई भी सदस्य इसमें घायल नहीं हुआ।

पुदुचेरी में समुद्र तट चेन्नै के समुद्र तट से छोटा जरूर है पर आकर्षक है। यहाँ बंदरगाह नहीं है और जो जहाज आते उनका सामान उतारने के लिए एक 'बियर' बना हुआ था। अर्थात पानी में ही कुछ दूरी पर लोहे का एक सेतु था। जहाज से नौकाओं में सामान लाद कर लाते और 'बियर' पर उतार देते। उन दिनों में इस सेतु पर लोग टहला करते थे। इस पुल से पुदुचेरी शहर बहुत सुंदर लगता था। भारती और उनके साथी अक्सर इस सेतु पर टहला करते थे और चर्चा चलती थी। उस पुल के सामने ही गांधीजी की प्रतिमा लगी हुई है और आस-पास पत्थर की बेंचें भी। भारती और उनके मित्रबंधु वही रेत पर बैठ कर अनेक प्रकार की चर्चा और योजना बनाने में रत रहते। इसी आधार पर उन्होंने अपने कुछ आलेख भी लिखे। अब यह सेतु जंग लग कर काल के प्रवाह में समाप्त हो गया।

समुद्र तट पर नहाना भारती का प्रिय शगल था। खास कर रविवार को भारती अपने साथी व.वे.सू. अय्यर, श्रीनिवासचारी आदि तथा इनके व अपने बच्चों के साथ नहाने जाते। अय्यर अच्छे तैराक भी थे पर भारती को तैरना नहीं आता था। एक दिन भारती अपनी दोनों बेटियों को स्नान करवा रहे थे, जैसे ही ऊँची लहर आती बच्चे डर कर किनारे की तरफ भागने लगते। भारती उनको पकड़ कर फिर समुद्र के पानी में ले जाते। भारती की आवाज उनके दुबले-पतले शरीर के मुकाबले में घंटा-नाद की तरह तेज थी। इन तमाशबीनों में से एक ने जाकर पुलिस को शिकायत की कि एक दाढ़ी मूँछ वाला व्यक्ति बच्चों को पानी में डुबाने की कोशिश कर रहा है। पुलिस का सिपाही आकर भारती को डाँटने लगा। उसे असलियत समझाने में भारती को कुछ तकलीफ अवश्य हुई। पर बात को समझने के बाद सिपाही ने भारती से क्षमा भी माँगी।

साधारणतया लोग समुद्र तट पर टहलने या बैठने सुबह या शाम आया करते हैं। पर भारती तो एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के स्वामी थे, वो समय बोध से अधिक 'मिजाज बोध' पर निर्भर थे और उसी पर चलते थे। कभी तपती दुपहरी में वहाँ चले जाते, कभी शाम को जाकर वहाँ बैठ जाते तो रात हो जाती। कभी-कभी तो रात भर वही रह जाते। अपनी सोच, अपनी कल्पना को विस्तार देने के अलावा अपनी निर्धनता को भुलाने की चेष्टा करना भी एक कारण था। गीत बना कर, राग में गाना बजाना और उसी में प्रसन्न रहने में समुद्र तट ने उनकी बहुत मदद की।

म. श्रीनिवासाचारी की बड़ी बेटी यदुगिरी ने अपनी पुस्तक 'भारती संस्मरण' में एक घटना का उल्लेख किया है। यदुगिरी भारती की पुत्री से कुछ वर्ष बड़ी थी और भारती ने उसे अपनी मानस पुत्री और शिष्या माना था। यदुगिरी अपनी छोटी बहन और पिता के साथ समुद्रतट पर सैर कर रही थी। प्रातःकाल की शीतल बयार के साथ रमणीय वातावरण था। ऐसे में प्रभात राग में, कहीं दूर से किसी की मधुर आवाज में, एक गीत सुनाई दिया। तीनों ही गीत के आवाज की दिशा में चलने लगे। थोड़ी दूर जाने पर देखा, एक कटे पेड़ के ठूँठ पर भारती हाथ जोड़े बैठे हुए थे। बाल भास्कर को निहारते हुए भाव विभोर होकर जिस तरह स्तुति गान कर रहे थे उससे सुनने वाले का दिल द्रवित हो जाता।

जब पता चला, भारती पहली शाम से समुद्र तट पर आए हुए थे तो उनसे पूछा गया कि 'रात भर अपने घर में सब परेशान नहीं हुए होंगे?' उन्हें क्या, बड़ी सादगी से बोले 'मैं तो कल्पित प्रदेश में उड़ रहा था और आनंद के सागर में गोते लगा रहा था।' उन्हें इसकी चिंता ही कहाँ थी कि उनके लिए कौन परेशान हुआ होगा या नहीं।

वैसे भारती को शास्त्रीय संगीत से अधिक आकर्षित करता था लोकगायन। धान रोपते, कूटते, काटते, कपड़े पटक कर धोते रजाक, सँपेरे की बीन का संगीत या इसी तरह का लयबद्ध गीत उन्हें अत्यंत प्रिय था। बाकी लोग उन अनगढ़ शब्दों को ठीक से पकड़ नहीं पाते पर भारती के कान उन शब्दों को सही ग्रहण करते, उनका अर्थ बताते हुए विश्लेषण भी करते।

वैसे तो घर की आर्थिक स्थिति हमेशा से ही डाँवाडोल ही रहा करती थी। देखने वालों को लगता कि भारती इससे बेखबर हैं। जबकि वास्तविकता ये होती थी कि वो वाग्देवी के ऐसे पूत थे जिन्हें निर्धनता और तंगी प्राकृतिक रूप से मिली हुई थी। पर उससे रचना कर्म में कोई बाधा नहीं आती थी। रचनाकर्म के मध्य वो एक तरह से अपने दुख दर्द, परेशानियाँ भूल जाते थे। उनके मन में वातावरण के अनुकूल गीत प्रस्फुटित होते और मानों स्वयंमेव श्रीमुख से राग और ताल के साथ झरते जाते। इसका एक सशक्त उदाहरण जिसकी पुनरावृत्ति भी अवश्य ही हुई होगी, प्रस्तुत है।

पत्नी चेल्लमा को खाना बनाना था, चूल्हे पर अदहन (भात पकाने का पानी) गरम हो रहा था। चेल्लमा चावल में से कंकर बीन रही थी। उन दिनों आज की तरह बिने-चुने साफ अनाज और दालें नहीं मिला करते थे। चावल बीनते हुए बीच में रसोई घर में किसी काम से गई और जब लौट कर आई तो देखती हैं कि सूपे में से एक बड़ा हिस्सा चावल का खाली हो गया। जमीन पर चावल बिखरा पड़ा है और ढेरों गोरैया चोंच में उन्हें भरते हुए फुदक रही हैं। उस दिन प्रातः ही दूधवाले ने दूध का बकाया चुकाने का तकाजा किया था और दूध बंद करने की धमकी दी थी। बच्चों के लिए खास कर, चेल्लमा चिंतित थी। ऐसे में भारती का गोरैया भोज करवाना उन्हें बहुत अखरा, नागवार लगा तो इसमें आश्चर्य की बात ही नहीं थी। चेल्लमा रोने-रोने को हो आई और भारती से उनके व्यवहार के लिए कैफियत माँगने लगी।

'बच्चों के खाने का समय होने वाला है, आप ही बताइए उन्हें भात खिलाना है या नहीं?'

चेल्लमा को एक ओर कारण से भी रोना आ रहा था। प्रतिदिन की तरह उसने भारती द्वारा 'स्वदेशमित्रन' पत्रिका में भेजे जाने वाले लेख को लिखने की सारी तैयारी कर रखी थी। दवात में स्याही, कलम व अन्य आवश्यक साजो सामान भी रख दिया था। पर समय निकला जा रहा था और भारती चिड़ियों का खेल देखने में व्यस्त थे, बल्कि मस्त थे। पत्रिका से जो थोड़ा-बहुत धन मिलता वही परिवार चलाने का जरिया था। जब उन्होंने अपने मन की बात भारती को बताई तो एक संतुष्ट फकीर की तरह बोले - 'देखो ये पक्षी कितने प्रसन्न हैं, लगता है नाच-गा रहे हों। हम मनुष्य ऐसे क्यों नहीं रह पाते।'

चेल्लमा कुछ बोली तो नहीं पर उदास ही थी। किसी तरह कुछ खाना पका कर बाहर के कमरे में आई तो देखा भारतीजी एक नई कविता गा रहे हैं और छोटी बच्ची शकुंतला नाच रही है। चिड़िया अभी तक चावल चुग रही है और बड़ी बेटी तंगम शांति से बैठी हुई है। चेल्लमा ने सोचा कि सभी इतने आनंदित हैं तो मैं क्यों इनकी प्रसन्नता में रुकावट बनूँ और वो भी शांति से बैठ गई। जब भारतीजी और शकुंतला का नाच गाना समाप्त हुआ तब जाकर बच्ची ने कहा - 'अप्पा, भूख लग रही है, खाना खा लेते हैं।' उस दिन पत्रिका में प्रकाशित होने के लिए एक कविता (गीत) जा पाई जिसे भारतीजी ने पक्षियों को आजादी से फुदकते हुए भोज करने और आनंदित हो सामूहिक कलरव करने पर लिखा था।

गद्य के स्थान पर प्रकाशन के लिए पद्य के जाने पर चेल्लमा उतनी संतुष्ट नहीं थी। उसके लिए तो स्तंभ लेखन से हुई आमदनी से परिवार चलाना था। भारती उसकी असंतुष्टता को समझ गए और बोले - 'आज तुम्हें ये गीत और पद्य मामूली से लग रहे हैं, पर आने वाली पीढ़ी इन्हें हाथों-हाथ लेगी और गाएगी-गुनगुनाएगी।' वास्तव में यही हो रहा है।

भारती की पद्य रचना के संदर्भ में एक और बात भी याद आती है तो उन दिनों उनके साथ घटी। चेन्नै की किसी पत्रिका ने पद्य प्रतियोगिता आयोजित की थी और उसमें कुछ पुरस्कार राशि भी रखी थी। भारती के साथियों के उकसाने पर उन्होंने एक अर्थपूर्ण सुंदर रचना भेजी। सबको पूरा विश्वास था कि भारती को ही प्रथम पुरस्कार मिलेगा। पर उन्हें तृतीय पुरस्कार मिला, जबकि प्रथम दोनों पुरस्कार की रचनाएँ भारती की रचना के सामने कहीं नहीं ठहरती थी। बाद में उन दोनों रचनाओं का तो कोई अता पता ही नहीं रहा जबकि भारती की रचना कालजयी हो गई।

भारतीजी ने शास्त्रोक्त रूप से संगीत का अध्ययन नहीं किया था पर शारदा के वर प्रसाद की तरह उनके मन में पद्य रचना के साथ रागों का समन्वय भी हो जाता था। आवाज भी स्पष्ट, मधुर व गहराई लिए होता। उनके लिए हर वो संगीत जो कानों को अच्छा लगे मधुर होता। उसमें फिर भारतीय-पाश्चात्य का या किसी ओर तरह का भेद भाव नहीं होता। उन दिनों पुदुचेरी में समुद्र तट पर प्रत्येक बृहस्पति को एक खास स्थान पर फ्रेंच बैंड बजाया जाता था। खड़े-खड़े लगभग एक घंटे का कार्यक्रम होता था। फ्रेंच बच्चे वहीं आस-पास उछल-कूद करते हुए खेलते रहते। भारती को भीड़ या लोगों का जमावड़ा उतना पसंद नहीं था। सो वो कुछ दूरी पर रेत में अपने परिवार व यदुगिरी के साथ बैठ जाते। उनकी बेटियाँ उनसे पाश्चात्य संगीत की खासियत व देशीय संगीत से उसकी भिन्नता आदि पर प्रश्न पूछती रहती।

बच्चों ने कहा - 'कल सरस्वती-पूजा है, आप बैंड वाली धुन पर सरस्वती पर एक रचना तैयार करिए न!'

भारती ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा - 'करूँगा।'

बैंड में धुन बदली तो यदुगिरी बोली - 'इस धुन पर लक्ष्मी की स्तुति गाए तो अच्छा लगेगा।' इस पर भारतीजी ने कहा - 'ये भी तैयार हो जाएगा।'

कुछ देर बाद चेल्लमा बोली - 'सुना है कि काशी, कलकत्ता (आज का कोलकाता या प. बंग) में इन दिनों में काली या दुर्गा की पूजा होती है। हम भी, इन शक्ति की देवी की पूजा-स्तुति करें तो शायद सारे कष्टों से मुक्ति पा लें।'

भारती प्रसन्न होकर बोले - 'ये बिल्कुल सही रहेगा। पहली धुन सरस्वती स्तुति, दूसरी लक्ष्मी और तीसरी दुर्गा के लिए होगी।'

अगले दिन उन्होंने तीनों स्तुतियाँ तीन धुनों में गाकर सुना दिया। यह दृष्टांत भारतीजी के स्वस्फूर्त पद्य कर्म के अलावा प्रकृति प्रदत्त संगीत के ज्ञान की ओर भी इंगित करता है।

संगीत का शौक तो इतना अधिक था कि सन 1918 में जब कडैयम (गाँव) में रहने गए तो कर्नाटक संगीत को संपूर्ण पद्धति के साथ सीखने के लिए गुरु तलाश कर लिया था। तामिलों में मारकझी महीने में (दिसंबर 15 से जनवरी 14 याने पोंगल तक) अलसुबह भजन मंडली भजन गाते बजाते मोहल्ले की हर गली में निकलती है। भारती इसमें सिर्फ गाते ही नहीं थे वरन बहुत से भजन उन्होंने स्वयं लिखे।

सन 1910 के बाद भारती का लेखन पत्रों में स्तंभ लेखन तक ही सीमित नहीं रह गया। खास कर सन 1912 का समय उनके लिए विशेष हो गया था। इस एक वर्ष में उन्होंने पुस्तक प्रकाशन के हिसाब से कई पाँडुलिपियाँ लिख कर संपूर्ण की। ये सारी कृतियाँ प्रकाशन के पश्चात बहुत प्रसिद्ध हुई। भगवत गीता का तमिल अनुवाद, कण्णन पाटु (कृष्णगीत), कुयील पाटु (कोयल गीत) व कालजयी रचना पाँचाली शपथम का पहला भाग पुदुचेरी में 1912 में प्रकाशित हो गया था पर दूसरा भाग भारती के निधन के पश्चात सन 1924 में प्रकाशित हुई। 'कोयल वाला गीत' की प्रेरणा बागीचे के जिस हिस्से से उन्हें मिली और जो बाद में उनकी प्रमुख, प्रसिद्ध कृति बन गई, सन 1923 में ही प्रकाशित हो पाई। कृष्ण गीत भी सन 1917 में ही प्रकाशित हुई। इसे प्रकाशन में लाने वाले महानुभाव चू. नेलैयप्पर ने भूमिका में भारतीजी के बारे में लिखा - 'श्रीमान भारती महापंडित, मेधावी, जीवन मुक्तर, मेरे देश के तपस्वी और तमिलनाडु के रवींद्रनाथ... आदि-आदि।'

उसी समय नलैयप्पर ने एक तरह से भविष्यवाणी कर दी थी कि मेरे बाद सैकड़ों वर्षों बाद भी भारती की रचनाओं को स्त्री-पुरुष और बच्चों द्वारा गाते बजाते देख पा रहा हूँ। साथ ही उनके सुंदर और स्पष्ट अक्षर तथा बिना काटा पीटी के लिखी कविता और लेखों से उनके विचारों की स्पष्टता भी दिखती है। उनके असंख्य लेखों के संग्रह में तत्व बोध, सामाजिक सरोकार, कला एवं साहित्य, मातृशक्ति आदि विविध आयामी पहलू हैं। उनकी नजरों से कोई पक्ष छूटा नहीं। सारे लेख उनकी प्रगतिशील, निष्पक्ष विचारधारा, जो समाज को जागरूक करते हुए प्रगतिगामी हैं। ये सारे आलेख इतने वर्षों बाद भी सामयिक लगते हैं। उस समय तो वो समय से बहुत आगे के लगते थे, जिस कारण उस समय का श्रेष्ठि वर्ग उनसे सहमत नहीं हो पाता था। निरंतर बनी रहने वाली निर्धनता के बावजूद उनके जोश खरोश में कभी कमी नहीं आई। बल्कि ये लगता था कि साधनहीनता ही शायद उनको लिखने की प्रेरणा देता था। ये इसलिए लिख रही हूँ कि उनका हास्य बोध और स्पष्ट सोचने-समझने का माद्दा इन बातों से कभी कम नहीं हुआ।

मात्र आलेख ही नहीं उन्होंने कहानियाँ भी लिखी। खास कर एक लंबी कहानी का उल्लेख सदा होता आ रहा है - 'चिन्न शंकरन कदै' अर्थात 'छोटे शंकर की कहानी', हास्य रस से सराबोर इस लंबी कथा को उन्होंने अपने मित्रों को सुनाया और सब पेट पकड़ कर हँसते रहे। पर दुर्भाग्यवश उसकी पाँडुलिपि गायब हो गई। दोस्तों के बहुत जोर देने पर उन्होंने दुबारा लिखना प्रारंभ किया। 'ज्ञान भानु' पत्रिका में किश्तों में प्रकाशित भी होने लगी थी। पर न जाने क्यों छ अध्याय लिखने के बाद उनका मन उससे उचट गया। असल में ये कथा काफी कुछ उनकी आत्मकथा सी लगती है। शायद इसीलिए पुलिस ने भारतीजी के घर काम करने वाले एक लड़के से मँगवा कर जब्त कर ली थी। 'ज्ञान भानु' में जब किश्तों में प्रकाशित होती रही तब भी किसी और उपनाम से लिखते रहे थे। कई उपनामों से विभिन्न पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रही थी।

पुदुचेरी में रहते हुए ही उन्होंने पचास अध्याय की एक वृहत रचना 'भारत-जन सभा' नाम से लिखी। उक्त पुस्तक 'स्वदेशमित्रन' पत्रिका में किश्तों में प्रकाशित हुई।

वनस्पति शास्त्र के वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु की लिखी पुस्तक का तमिल में अनुवाद किया जो एक छोटी पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुई।

कविवर रवींद्रनाथ टैगोर की कहानियों को अँग्रेजी से तमिल में अनुवाद किया। भारतीजी का उद्देश्य था कि दूसरी भाषा की श्रेष्ठ रचनाओं को तमिल भाषी पढ़ें और आनंद व ज्ञान अर्जित करें।

भारतीजी की हास्य शैली का एक सशक्त उदाहरण है उनकी कहानी जो तमिल और अँग्रेजी दोनों में लिखी गई। वो कहानी है 'ए फॉक्स विथ दी गोल्डन टेल'। उस समय अरविंद घोष अपने आश्रम में रहने लगे थे। भारतीजी नियमित रूप से उनसे मिलने तथा वार्तालाप व चर्चा के लिए जाया करते थे। उस दिन वो अपनी इसी कहानी को सुना रहे थे। अरविंदजी खुल कर हँस रहे थे साथ ही आश्रम के अन्य विद्वानों आदि को बुलवा कर सुनने को कहा। इस कहानी की पुस्तक की अँग्रेजी प्रति की पाँच सौ प्रतियों के लिए चेन्नै से तुरंत ऑर्डर आया। पर भारतीजी को खास प्रसन्नता नहीं हुई।

वो कहने लगे - 'अपना हृदय निचोड़ कर अपनी मातृभाषा में 'पाँचाली शपथम्' लिखा, उससे अधिक महिमा इस विदेशी भाषा की कहानी को क्यों मिल रही है? शायद ये भी हमारी गुलाम मानसिकता है!

अपनी मातृभाषा तमिल पर उन्हें एक माँ की तरह भक्ति एवं स्नेह था। तमिल की उन्नति के लिए आजीवन प्रयत्नशील रहे। छोटे बच्चों के लिए शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या देशीय भाष को चुनने का कहते। विदेशी भाषा अँग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाने के सख्त खिलाफ थे। उनकी दिली इच्छा थी कि बचपन से बच्चे अपने माता-पिता, परिवार, मातृभाषा, राष्ट्रभाषा के प्रति आदर और स्नेह करना सीख लें। तमिल काव्य की सुदीर्घ परंपराओं से परिचित थे तथा लोक साहित्य और लोकगीत परंपराओं के प्रति आकृष्ट भी थे। उसे आत्मसात करते हुए उन्होंने नए काव्य का सृजन किया था। भारती ने वचन कविता अर्थात गद्य कविता को प्रारंभ कर वर्तमान 'तमिल नई कविता' के लिए मार्ग प्रशस्त किया। भारती के पैदाइश के समय तमिल भाषा तथा तमिलजनों की अवस्था अच्छी नहीं कही जा सकती थी। तमिल भाषा को पुर्नजीवित कर एक तरह से उन्होंने तमिलजन को तंद्रा से जगा कर आत्मविश्वास और आस्था के पौधे को पल्लवित किया। हम सब पर उनका ये बहुत बड़ा उपकार है।

उन्हें मातृभाषा या राष्ट्रभाषा से ही प्रेम था ऐसा नहीं है। उन्होंने संत त्यागराज के भजन गाने के लिए तेलुगू सीखा तो कभी फ्रेंच या जर्मन। किसी भी कार्य में उतरने से पहले उसकी प्रारंभिक आवश्यकताओं को पुख्ता करने को कहते।

अपनी व अन्य प्रसिद्ध तमिल रचनाओं का उन्होंन बहुत सुंदर अँग्रेजी अनुवाद किया था। अरविंद घोष की अँग्रेजी पत्रिका 'आर्य' में प्रकाशित हुई। 'आर्य' में ही 'ए फॉक्स विथ दी गोल्डन टेल' भी प्रकाशित हुई थी। इसके अलावा एनी बेसंट की 'न्यू इंडिया' तथा 'कॉमन वील' पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुई। आगे चल कर सन 1937 में पुस्तकाकार रूप में इसका प्रकाशन हुआ। सन 1937 में ही उनके आलेखों का एक संग्रह भी प्रकाशित हुआ।

प्रगतिशील व समाज सुधारक के रूप में - भारतीजी के व्यक्तित्व का सबसे प्रमुख गुण था उनके कथनी-करनी में समानता। समाज या लोगों को प्रभावित करने के लिए कुछ कहना और फिर स्वयं के लाभ या स्वार्थ के लिए उसका उल्टा करना जैसा कि साधारणतया लोग करते रहे हैं, उन्होंने कभी नहीं किया। दो टूक कहने-सुनने और घुमा फिरा कर बोलने की आदत न होने से वही बोलते थे जो उन्हें सही और सत्य लगता।

वर्तमान में भी हमारे देश में जाति-प्रथा की पैरवी करने वालों की कमी नहीं है। आज से सौ वर्षों पूर्व ब्राह्मण परिवार के भारतीजी ने इसका उल्लंघन किया। ये उनके विशाल और उदार मन ही नहीं साहस को भी बताता है। उन दिनों ऊँची जाति के लोग नीची जाति के लोगों की परछाई से भी दूर रहते थे। पर भारतीजी उनके घर भी जाते थे और उनके साथ खाना भी खाते थे और उनके साथ पूजा-पाठ में हिस्सा भी ले लेते थे। पुदुचेरी में रहते हुए घर के काम-काज में हाथ बाँटने वाली अम्मांकण्णु के घर में दत्तात्रेय की मूर्ति और कुछ शस्त्र बहुत अरसे तक पूजा के आले में रखे हुए थे। भारती ने इनकी पूजा की थी इसलिए।

नीची जाति के या हरिजन साथियों के साथ उठना-बैठना, खाना-पीना उनके लिए साधारण बात थी। जाति या धर्म से परे, ऐसे युवा लोगों में उनकी दोस्ती रा. कनकलिंगम (जिनका उपनयन संस्कार बाकायदा होम-हवन के साथ भारतीजी ने किया था), वेणु नायकर और भी अनेक ऐसे लोग और नाम हैं जिन्हें उनका स्नेह और साथ मिला था। इन लोगों के मंदिर की देवी पर उन्होंने गीत की रचना भी की। जब कोई उनका मित्र बन गया तो बस उससे मित्रता का ही व्यवहार करते थे। एक बार सन 1912 में 'जातिवाद' पर उन्हें किसी क्लब में बोलना था। इस भाषण का आयोजन रा. कनकलिंगम ने किया था। भारती ने वही कहा जो वो मानते थे। अर्थात, जिस तरह अँग्रेजों को भारत से भगाना है, उसी तरह जाति प्रथा जैसी कुप्रथा को समूल उखाड़ फेंकना है। उनका भाषण सदैव की तरह जोशीला, दिल से निकला हुआ और श्रवणकर्ताओं को प्रभावित करने वाला था। पर कनकलिंगम पर बिना अनुमति के भाषण की व्यवस्था करने पर तीन रुपये का दंड लगा।

भारतीजी का कहना था कि 'इन दो बातों के अलावा देश की प्रगति के लिए स्त्री-शिक्षा और उनकी स्वतंत्रता पर भी हमें ध्यान देना होगा।'

कनकलिंगम और उनके जैसे युवा तो भारती को गुरु मानने लगे। उन्होंने एक पुस्तक 'भारती एन गुरुनादर' (भारती मेरे गुरुवर) शीर्षक से लिखी जो सन 1947 में प्रकाशित हुई।

जाति प्रथा के विरोध में उन्होंने बच्चों की कविता में भी उल्लेख किया है। जिसका भावार्थ कुछ यूँ है। 'जाति प्रथा को मानना अभिमान की बात नहीं है। पशु-पक्षियों में ऐसा कोई भेदभाव नहीं है। मनुष्य क्यों ऊँची या नीची - जाति का भेदभाव पालता है। इन सब बातों से ऊपर उठ कर देखें तो हम सब मात्र भारतवासी हैं'

भारतीजी उदार और विशाल हृदय के ऐसे देशभक्त थे, जिनके लिए देश का हित सर्वोपरी था। भारत माँ की आजादी के लिए वो जूनून की हद तक भावुक थे। उनकी देश-भक्ति और आजादी की प्यास वाली रचनाओं ने बच्चों, जवान, प्रौढ़ और महिलाओं में भी जोश भर दिया था।

भारतीजी के बारे में बार-बार ये कहा जाता है कि कथनी-करनी एक समान। हर सुधार का प्रारंभ घर से ही करते। उनकी बड़ी पुत्री तंगम का विवाह उस समय के हिसाब से दस-बारह वर्ष की उम्र में करने की बात चली। पर भारतीजी ने इस बात को सिरे से खारिज कर दिया। वो बाल-विवाह ही नहीं अवयस्क बच्चों की शादी के भी खिलाफ थे। लड़कियों की शिक्षा के प्रश्न पर भी उनकी सटीक राय थी। वर्तमान में जो उक्ति कही जाती है वो उन्होंने उस समय कही थी जब लोग प्रचलन-रीति-रिवाज के नाम पर आँखें मूँद कर चलते थे। उन्होंने कहा था - 'बालिकाओं की शिक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं देकर हम अपना ही नुकसान कर रहे हैं। उनको अँधेरे में और परदों में रख कर हम चाहते हैं शकुंतला के पुत्र वीर भरत की तरह हमारे भी वीर और प्रतापी संतान हों। नारी के स्वतंत्र सोचने-समझने की शक्ति को बचपन से निरुद्ध कर एक असंभव प्राप्ति की लालसा करना कतई सही नहीं है।'

अपनी छोटी बेटी शकुंतला की शिक्षा के लिए उन्हें भटकना पड़ा। उस समय अपने ससुराल के गाँव कडैयम में थे। आर्थिक स्थिति तो सदैव की तरह कंगाली ही थी, सो घर पर शिक्षक रख कर पढ़ा नहीं सकते थे। गाँव में लड़कियों की शिक्षा का कोई प्रावधान ही नहीं था। लड़कों के स्कूल में शकुंतला को भर्ती करने से मना कर दिया कि वो नियम विरुद्ध हो जाएगा। पर भारतीजी इस बात को आसानी से छोड़ने वाले तो थे नहीं। उन्होंने बाकायदा नारी के लिए शिक्षा की आवश्यकता पर जोर देता एक छोटा-मोटा भाषण सुना दिया। यही नहीं एक अच्छी पहल करने की प्रेरणा देते हुए उन्हें राजी कर लिया। छात्रों के स्कूल में पहली छात्रा के रूप में शकुंतला को दाखिला मिल गया। शकुंतला अपनी बड़ी बहन तंगम की अपेक्षा पिताजी के साथ अधिक रही। उन्होंने 'मेरे पिताश्री भारती' नाम से एक पुस्तक लिखी जो भारतीजी की एक सौ पच्चीसवीं सालगिरह पर प्रकाशित हुई थी।

ईश्वर पर उनकी निष्ठा और आस्था अडिग थी। खास कर पराशक्ति देवी पर। निर्धनता और दुखों की पराकाष्ठा के समय वे देवी से कहते अवश्य थे कि इस तरह तकलीफों में लगातार झोंकने से तो मुझे नास्तिक बना दोगी। पर अंत तक देवी के परमभक्त ही बने रहे। भारती चाहते थे कि 'पराशक्ति ऐसी शक्ति दे कि मैं सदैव, सतत कविताएँ रचता रहूँ। उधारी चुका कर, परिवार को बिना परेशानी के शांति भरा जीवन जीने मिले। मैं सदैव उसकी प्रशंसा और स्तुति में नए और अद्भुत गीत बनाता रहूँ।

कई मौकों पर लोगों को आपस में कटु बातें करते या लड़ते झगड़ते देख कर उनका मन बहुत उदास हो जाता। वो स्वयं असुविधाजनक स्थितियों में भी संतुलित भाषा का ही प्रयोग करते थे। कटु या कड़वे बोलों से किसी का दिल नहीं दुखाते थे। वो कहते भी थे कि धनाभाव से भले ही पहने हुए वस्त्रों में आडंबर न हो। हो सकता है उनकी स्वच्छता में भी कुछ मलीनता महसूस की जा सकती हो। पर मीठे और समझदार व्यवहार से अपने अंतरतम को तो पवित्र और साफ रख सकते हैं।

भारतीजी को दानवीर कर्ण कह कर कुछ व्यंग्य, कुछ मजाक में कहा जाता था। ये भी कह सकते हैं - 'घर में नहीं है दाने, नानी चली भुनाने'। जैसा कि वो बीनते-चुनते चावल में से मुट्ठी भर-भर कर चिड़ियों को चुगा देते। वैसे तो उनका हाथ अधिकांश समय खाली ही रहता था, पर थोड़े पैसे हाथ में आ भी जाएँ तो उसे किसी को दान या जरूरत के लिए बिना किसी हिचकिचाहट के दे देते। उनके साथी कुछ धन कठिनाई के दिनों के लिए बचा कर रखा करते थे। भारती ने उनसे कुछ नहीं सीखा, बस अपनी फक्कड़ मस्त मौला-मनमौजी लहजे में ही जीते रहे। एक बार उनको सम्मान में रेशमी धोती और अंगवस्त्रम ओढ़ाया गया। रिक्षे पर घर लौटते हुए, मात्र एक पतले तौलिए में लिपटे रिक्शेवाले को देख उन्हें दया आ गई। दुबला-पतला, हड्डी का ढाँचा बना हुआ उसे दीन-हीन तो कोई भी समझ जाता। पर भारती ने उससे बातें की, उसकी घर की अवस्था व अन्य कुछ पूछ-ताछ की। बस फिर क्या था सम्मान में मिले रेशमी धोती को उस पर ओढ़ा दिया। वो बेचारा डर कर बोला - एक तो रेशमी ऊपर से नया, लोग सोचेंगे मैं चोरी करके लाया हूँ। इससें तो अच्छा होगा कि आप घर के कुछ पुराने कपड़ों में से निकाल कर दे दें। कपड़ों की जरूरत तो मुझे भी है और घर के लोगों को भी है।'

'जब घर में होंगे तब ले जाना पर अभी तो ये तुम्हारा हो गया मैं वापिस नहीं लूँगा।' कह कर चल दिए। बाद में हँसते-मजाक करते हुए अपने मित्रों को किस्सा सुनाते हुए बोले - 'मैने एक गरीब रिक्शा चालक का सम्मान किया।'

उनके मन में ये भी खटका नहीं होता कि जिस किसी ने भी उनका सम्मान किया वो उसे गलत अर्थ में ले सकता है। बाद में तो सभी उनके स्वभाव को समझने लगे।

एक बार घर पर वो अकेले थे। एक भिखारिन चिंदियों में लिपटी, अपने बच्चे और स्वयं के ओढ़ने को वस्त्र माँग रही थी। उन्होंने वहीं रस्सी पर सूख रहे कपड़ों में से निकाल कर दे दिया। चेल्लमा उनकी ऐसी दरियादिली से कई बार संकट में पड़ चुकी थी और उनको समझा भी चुकी थी। चेल्लमाँ की बातों का उनके पास जवाब ये होता - 'इन पक्षियों को देख रही हो, कितनी प्रसन्नता से दाना भी चुगती है और दाने खत्म हो जाने पर चहचहाती हुई कलरव करती हुई आपस में खेलती रहती हैं। हम इनसान ऐसे क्यों नहीं रह पाते?'

इसके बाद चेल्लमाँ के पास कहने को कुछ बचता ही कहाँ था? सिवाय इस सोच में पड़ने के कि अगले दिन बच्चों का खाना कहाँ से आएगा।

झूठ से नफरत - भारतीजी को सबसे अधिक बुरा लगता था झूठ बोलने से। वो कहते थे झूठ बोलना कायरता की निशानी है। बचपन से ही बच्चों को साहसी बनाने की शिक्षा व प्रेरणा मिलनी चाहिए। जिससे वो अपनी गलती को स्वीकार करने का साहस रख सके। एक गलती को छुपाने के लिए बोला गया एक झूठ धीरे-धीरे आदत में बदल जाता है और अनेक झूठ बुलवाते जाता है। घर में अपनी बच्चियों को भी यह सिखाया। एक बार पुदुचेरी में दोनों बहनें शाम को समुद्र तट पर घूमने-खेलने जा रही थी। भारतीजी ने अपनी रचना डाक में डालने के लिए रखी थी और बच्चों से जाते-जाते ले जाने को कहा था। दोनों ही भूल गई। घर लौटते समय उन्हें याद आया। दोनों ने तय किया कि सुबह जल्दी उठ कर डाक निकलने से पहले डाल आएँगे, अभी तो पिताजी से कह देंगे कि डाल दिया। घर आने पर भारतीजी ने ही दरवाजा खोला। पिताजी को देखते ही उनके विचार बदल गए। बोलने लगी - 'पिताजी, हमें क्षमा कर दीजिए, हम आपका लिफाफा ले जाना भूल गए। पर कल भोर होते ही जाकर पोस्ट कर देंगे जिससे समय से निकल जाएँ। भारतीजी के घर एक अनबोला सा नियम था कि अपनी भूल स्वीकार कर जब कोई माफी माँगता हो तो बड़े-छोटे कोई भी हों, क्षमा स्वीकार हो जाती है। सो बच्चियों को माफी भी मिल गई और वे झूठ बोलने से भी बच गई। बच्चों पर बड़ों के व्यवहार व आदर्श का जो प्रभाव पड़ता है उसके लिए बड़ों का भी व्यवहार अच्छा होना उतना ही जरूरी है। इस बात को भारतीजी ने अपने आचरण से ही समझा दिया।

भारती को अपने सिर पर कम बाल होने का दुख था। बीच का सिर बालविहीन था, मात्र दोनों तरफ ही बाल थे। इसे छुपाने के लिए सदैव सिर पर पगड़ी रहा करती थी। साथ ही मूँछें रखने का भी शौक था, जबकि उन दिनों ब्राह्मण परिवार में दाढ़ी-मूँछ नहीं रखा जाता था। सन 1918 में जब प्रथम महायुद्ध अंत के दौर में था, भारती के साले अप्पादुरै पुदुचेरी आए। भारतीजी अब तक पुदुचेरी के वास से ऊब चुके थे और वहाँ से निकलने को तड़फड़ा रहे थे। इससे संबंधित बैठक में भाग लेने ही पहुँचे थे। डाकघर की अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर आए थे। उन्हें भारतीजी पर अपार श्रद्धा और स्नेह था। भारतीजी के मन में उस जगह को छोड़ कर जाने के लिए कई तरह के विचार और कल्पनाएँ आया करती थीं।

एक दिन बिना कुछ बताए वहाँ से मन्नारकुड़ी के पास एक गाँव नागै पहुँच गए। अपनी पगड़ी उतार ली और मूँछ साफ कर ली। सी.आई.डी. पुलिस भी उनको पहचान नहीं पाई। उनकी पत्नी चेल्लमा और अन्य लोग उनके अज्ञातवास से परेशान थे और समझ ही नहीं पा रहे थे कि क्या किया जा सकता है। करीब पंद्रह दिन बाद म. श्रीनिवासचार्य के घर अपने नए वेश में पहुँच गए। उनकी बेटी यदुगिरी जो भारतीजी की मानस पुत्री व शिष्या थी तथा करीबी भी थी, वो भी उन्हें पहचान नहीं सकी। भारतीजी यही चाहते भी थे, उनका परीक्षण सफल रहा।


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